व्यवस्था परिवर्तन की राह : मिशन तिरहुतीपुर डायरी-4

अपने स्थायी निवास और कैरियर के बारे में उपयुक्त निर्णय लेने के बाद अब समय था कि मैं पूरी तरह से एकाग्रचित्त होकर मिशन तिरहुतीपुर का काम शुरू करूं। लेकिन उस समय मई, 2020 में चारों ओर लाकडाउन लगा हुआ था। कहीं जाना संभव नहीं था। इसलिए मैंने दिल्ली एनसीआर के अपने फ्लैट में रहते हुए गोविन्दजी के विचारों को नए सिरे से समझने की कोशिश शुरू कर दी। उनके चिंतन में जो बात प्रमुखता से मुझे आकर्षित करती है, वह है ‘व्यवस्था परिवर्तन’। वर्ष 2014 में हमारी कंपनी ‘संवाद मीडिया’ ने उनकी एक किताब छापी थी जिसका नाम है, ‘व्यवस्था परिवर्तन की राह’।

कई लोग सत्ता और व्यवस्था को समानार्थी मान लेते हैं, जबकि ऐसा है नहीं। सत्ता की भूमिका उतनी ही है जितनी शरीर में उसके किसी एक अंग की। गोविन्दजी जब व्यवस्था की बात करते हैं तो उनका तात्पर्य उन सभी संस्थाओं, प्रणालियों एवं मान्यताओं के समुच्चय से होता है जिनके द्वारा हमारा व्यक्तिगत एवं सामूहिक, दोनों प्रकार का जीवन संचालित होता है। वे बताते हैं कि एक निश्चित काल और समय के संदर्भ में इस धरती पर कई व्यवस्थाएं एक साथ काम कर रही होती हैं। लेकिन इन तमाम व्यवस्थाओं के बीच एक ऐसी सार्वभौमिक व्यवस्था होती है जो सबको नियंत्रित करती है। हालांकि उसका स्वरूप और उसकी सीमा निरंतर परिवर्तनशील होती है। एक तरफ जहां वह अपनी घटक व्यवस्थाओं को प्रभावित करती है, वहीं वह उनसे प्रभावित भी होती रहती है।

आज हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जिस व्यवस्था का सिक्का चल रहा है, उसके मूल में ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति है। इसकी उत्पत्ति बेशक ब्रिटेन के कारखानों से हुई, लेकिन आज यह हर जगह फैल चुकी है। लाभोन्माद इसकी प्राणवायु है। समरूपीकरण, केन्द्रीकरण एवं बाजारीकरण की प्रवृत्ति के साथ यह स्वयं को अनगिनत रूपों में अभिव्यक्त करती है। हमारा विचार-व्यवहार, हमारी संस्थाएं, हमारी परंपराएं, हमारी जीवनशैली, कुछ भी इससे अछूती नहीं है। आधुनिक सूचना तंत्र वह अस्त्र है जिसके द्वारा यह पूरे विश्व को अपने वश में करती जा रही है। दुनिया भर की सरकारें जाने-अनजाने इसके सामने नतमस्तक हैं।

इस व्यवस्था की असलियत को बयान करता एक बहुत बढ़िया लेख बीबीसी हिंदी सेवा के पूर्व प्रमुख स्वर्गीय कैलाश बुधवार ने लिखा था। उनका वह लेख लंदन से प्रकाशित पत्रिका पुरवाई में छपा था, जिसमें मैं उन दिनों कार्यकारी संपादक की भूमिका में था। कैलाश जी ने अपने लेख में बताया था कि यह व्यवस्था किस प्रकार सारी मानव-जाति की चिरंतन प्रवाहित विचारधारा को एक कुएं में ढकेलकर उससे लाभ खींचने की नीयत रखती है। यह एक ऐसी दुनिया चाहती है जहां सब एक तरह से सोचेंगे, एक ही भाषा बोलेंगे, एक ही धुन के गीत गाएंगे, एक सा खाना पकाएंगे और अपने बच्चों को एक सी लोरियां सुनाएंगे।

समरूपीकरण के खतरे को स्पष्ट करते हुए बुधवार जी ने आगे लिखा था, “मुझे भय सताता है कि क्या हम और हमारे जैसे करोड़ों लोगों की आगे आने वाली पीढ़ियां वह सब कुछ खो देंगी जो संसार के हर कोने में मानवीय प्रतिभा ने हजारों वर्षों के प्रयत्न से संजोया है। क्या वह विविधता जो हमारी धरती को सजाए है, सपाट हो जाएगी, क्या ज्वालामुखी की अग्निवर्षा में सारे रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियां राख के मलबे में दब जाएंगी, क्या हम भी शेष पशु जगत की तरह एक ही नस्ल की शक्ल में बदलकर एक सा जीवन जीएंगे?”

वह व्यवस्था जो सबको एक जैसा बनाने पर आमादा है, उसका नियंत्रण किसके पास है? अधिकतर लोग ब्रिटेन, अमेरिका एवं वहां के धनपशुओं को इसका नियंता मानते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि यह व्यवस्था अब किसी के नियंत्रण में नहीं है। यह भष्मासुर का रूप ले चुकी है। जो देश और संस्थान कभी इसे नियंत्रित करते थे, आज वे स्वयं इससे भयाक्रांत हैं। 16 सितंबर, 1992 की घटना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। Black Wednesday के नाम से कुख्यात इस दिन ब्रिटेन की सरकार दिवालिया होते-होते बची थी। जार्ज सोरोस को इसके लिए जिम्मेदार बताया जाता है, किंतु वास्तव में वह तो उस व्यवस्था का एक किरदार था जिसके कारण सब कुछ हुआ। इसी प्रकार 15 सितंबर, 2008 को जिस Lehman Brothers कांड ने अमेरिका की चूल हिला दी, वह भी इसी व्यवस्था की करामात थी।

इस व्यवस्था की विध्वंसक प्रवृत्ति से दुनिया का प्रत्येक समझदार व्यक्ति परेशान है। सभी अपने-अपने तरीके से इसे रोकने-बदलने अर्थात व्यवस्था परिवर्तन में लगे हैं। भारत में इस मुहिम को आगे बढ़ाने में गोविन्दाचार्य जी की भूमिका प्रमुख है। वे कहते हैं कि हमें इस व्यवस्था को छोड़ एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ना है जिसकी प्राणवायु धर्म (कर्तव्य) हो। विविधीकरण, विकेन्द्रीकरण और बाजारमुक्ति की प्रवृत्ति के साथ वह व्यवस्था प्रकृति केन्द्रित विकास के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त करे, ऐसी उनकी इच्छा है।

गोविन्दजी का कहना है कि जिन लोगों का उद्देश्य व्यवस्था परिवर्तन है, उन्हें राजसत्ता में शामिल नहीं होना चाहिए। सरकार में घुसकर व्यवस्था को बदलने का विचार वे सिरे से खारिज कर देते हैं। पिछले 17 वर्षों में उन्हें मैंने बार-बार यह दोहराते सुना है कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ने के लिए अलग किस्म के लड़ाके, अलग किस्म के औजार और बिल्कुल अलग तौर-तरीके इस्तेमाल करने पड़ेंगे, क्योंकि पारंपरिक तरीकों से इस व्यवस्था को एक खरोंच भी नहीं दी जा सकती।

दिल्ली में तीन-तीन सत्ता परिवर्तन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले गोविन्दाचार्य ने बड़े करीब से देखा है कि व्यवस्था परिवर्तन की गाड़ी सत्ता के गलियारों में घुसते ही कैसे पंचर हो जाती है। इसलिए वे चाहते हैं कि व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में जब अगली बार गाड़ी बढ़े तो वह सत्ता के गलियारों की ओर कूच करने की बचाए देश के लाखों गांवों और गली-मोहल्लों तक पहुंचने की कोशिश करे, क्योंकि व्यवस्था परिवर्तन वहीं से संभव है।

व्यवस्था परिवर्तन पर गोविन्दाचार्य जी के विचारों को समझने-बूझने की पक्रिया में मेरा मन मुझे एक नई संभावना की ओर ले गया। मैं अचानक सोचने लगा कि क्यों न मिशन तिरहुतीपुर को व्यवस्था परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु बना दिया जाए? क्यों न तिरहुतीपुर से एक ऐसी गंगोत्री निकाली जाए जो वर्तमान व्यवस्था के कलुष को धोते हुए एक नई व्यवस्था का सूत्रपात कर दे? कुछ आगे सोचूं, उसके पहले ही मन ने सवाल उठाया, क्या यह संभव है…?

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