हिंदी को बचाने-बढ़ानें में साहित्यकारों की भूमिका ?


सोशल मीडिया परिचर्चा प्रस्तुति – वरिष्ठ पत्रकार श्री राहुल देव
जवाहर कर्णावट – दिल्ली के पुस्तक मेले में  हिन्दी साहित्य  की विभिन्न विधाओं की पुस्तकों के थोक में विमोचन/लोकार्पण हो रहे हैं. इस बात की भी पड़ताल होनी चाहिए कि साहित्येतर  विषयों (ज्ञान-विज्ञान,प्रशासन,वाणिज्य,वित्त,विधि एवं न्याय आदि) पर कितनी नई पुस्तकों का विमोचन हुआ ?राहुलदेव –जवाहर, बहुत अच्छा प्रश्न उठाया आपने। मैं अभी थोड़ी देर पहले ही पुस्तक मेले से लौटा हूं। कल जाकर इसका पता लगाने की कोशिश करूंगा। लेकिन असली स्थिति तो तभी पता चलेगी जब हम हिंदी में प्रकाशित और लोकार्पित साहित्येतर विषयों की पुस्तकों और अन्य भाषाओं में, विशेषकर अंग्रेजी में, प्रकाशित ऐसी पुस्तकों की संख्या और अनुपात का अध्ययन करेंगे। शेष जानकारी मिलने के बाद। और सचमुच ही थोक के भाव लोकार्पण हो रहे हैं और पांच-पांच, दस दस लोगों के बीच चर्चाएं हो रही हैं। अद्भुत नजारा रहता है।
मैंने कुछ दिन पहले एक प्रश्न उठाया था कि हमारे साहित्यकार भाषा के प्रश्न पर उत्तेजित क्यों नहीं होते, पुस्तक मेले में ही एक गोष्ठी। उस पर ट्विटर पर जो अनंत विजय ने लिखा उस पर इस समूह में काफी चर्चा हुई। मैं चाहता हूं एक बार वह चर्चा आप लोगों के सामने भी रख दूं। वैसे उस ट्वीट को मैंने यहां भी डाला था।  आप लोग अनुमति दें तो कोशिश करूं यहां रखने की।  उससे इस इतने बड़े सवाल पर हमारे बड़े साहित्यकारों की दृष्टि क्या है इसकी झलक मिलेगी।
ममता कालिया –
बाजार,व्यापार और पत्रकार मिल कर बिगाड़ें जिसे, उसे अकेला रचनाकार कब तक खड़ा रखे।
डॉ मोतीलाल गुप्ता आदित्य ( टिप्पणी जोड़ रहा हूँ ।) –इस समय हिंदी में सबसे बड़ी संख्या तो रचनाकारों की ही है, शिक्षा, पत्रकारिता, राजभाषा सहित हर क्षेत्र में तो रचनाकार हैं ( कम हुए हैं तो पाठक और श्रोता) , फिर अकेले कैसे?  किसी भी संघर्ष में रचनाकारों की भूमिका प्रमुख होती है और होनी भी चाहिए ,लेकिन यहाँ तो वे अपनी भाषा के संघर्ष से ही पूरी तरह कटे हुए दिखाई देते हैं। भाषायी संघर्ष के कार्यक्रमों में कहीं, कम से मुंबई में तो मैंने किसी साहित्यकार को कभी साथ देते नहीं देखा। वे इसकी बात सुनना भी पसंद नहीं करते। शायद  इसलिए कि वह लाभ -पथ है और यह संघर्ष – पथ।  हिंदी के ज्यादातर पत्रकारों और शिक्षकों की बेरुखी भी ऐसी ही है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं,उल्लेख करना उचित नहीं।धीरेंद्र अस्थाना – 
बहुत सही कहा ममता जी ने, सलाम।
राहुलदेव-क्षमा कीजिएगा ममता जी, यह बात लंबी और बड़ी हो जाएगी। पर मैंने कन्नड़ के लिए बड़े और लंबे, लिख कर और सड़क पर उतर कर आंदोलन चलाने और नेतृत्व करने वाले भैरप्पा तथा यू आर अनंतमूर्ति का उदाहरण दिया था। उनके सामने भी बाजार, व्यापार, पत्रकार, सरकार थे।इस पर बैठकर लंबी बात करने की जरूरत हैमैं वर्षों से खुलेआम हर मंच पर हिंदी के इन तीन चार बड़े अखबारों दपर हिंदी की दैनिक हत्या करने का आरोप लगा रहा हूं। मैं भी पत्रकार ही हूं। साहित्यकार इतना न सही कम से कम लिखकर असहमति या विरोध भी जताते। वह भी नहीं हुआ है आज तक संगठित रूप से। कम से कम मेरी जानकारी में नहीं और वह अधूरी हो सकती है।…कब तक खड़े रहे…” मैं जानना चाहूंगा- कब खड़ा हुआ रचनाकार?  कब तक का सवाल खड़े होने के बाद का है।
ममता कालिया –  पत्रकार जब मर्ज़ी पाला बदल लेते हैं । पत्रकारिता में यह अनुमन्य है। साहित्यकार ने जब जब सर उठाया, अपनी चौखट से टकराया।
राहुलदेव –    

मैं अपनी बात कर सकता हूं दूसरे पत्रकारों की नहीं। और मैं एक अत्यंत सीमित प्रश्न पर बात कर रहा हूं। हिंदी की जमीन हर जगह, हर क्षेत्र में रोज सरकते- मिटते देखकर भी हिंदी के बड़े साहित्यकारों ने कोई सार्वजनिक, संगठित रूप से विरोध क्यों नहीं जताया? पत्रकारों ने भी नहीं जताया यह भी सही है। इसलिए यह सवाल उन पर भी पूरी तरह उतना ही वाजिब बनता है।

डॉ मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ (टिप्पणी जोड़ रहा हूँ।) –
आश्चर्यजनक है, लेकिन यह सत्य है कि इस समय हिंदी सहित भारतीय भाषाओं को बचाने और आगे बढ़ाने में अपेक्षाकृत कहीं बहुत बड़ी और बेहतर भूमिका उन लोगों की है जो न तो हिंदी के साहित्यकार हैं और न ही किसी भी रूप में हिंदी से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका चलाते हैं। इनमेंं समाजसेवी, डॉक्टर, वैज्ञानिक,इंजीनियर,  न्यायमूर्ति, वकील, न्यायिक संगठन, व्यापारी, कंपनी सैक्रेटरी, नेता और 

 धर्मगुरुओं सहित समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोग हैं।

 सूचनाप्रौद्योगिकीविदों की तो सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। 
 

अनाम –
कल शाम संगोष्ठी में मैं भी उपस्थित था और राहुल जी की प्रखर वाणी को मैंने भी सुना था । कार्यक्रम में मेरा भी हस्तक्षेप रहा। राहुल जी का कहना उचित है कि इस पर बैठकर लंबी बात करने की आवश्यकता है। मैं संगोष्ठी में राहुल जी की इस हूंकार से भी सहमत हूं कि हिंदी को लेकर रुदन नहीं होना चाहिए।अनन्त विजय – रुदन कौन कर रहा है।

प्रेम जन्मेजय – 
विवशता का रुदन नई पीढ़ी कर रही है। स्कूल में हिंदी पढ़ने वालों और पढ़ाने वालों को उपेक्षा, दंड आदि की मानसिक यातनाएं दी जाती हैं।

अनंत विजय – नई पीढ़ी तो बिल्कुल नहीं कर रही सर। वह तो अपना रास्ता निकाल आगे बढ़ चुकी है । पर बात हो रही है साहित्यकारों की । भाषा को लेकर निष्क्रियता की जिस और राहुल सर ध्यान दिला रहे हैं।

डॉ मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ ( टिप्पणी जोड़ रहा हूँ ।) –
सही कहा आपने, 
साहित्यकारों की भाषा को लेकर निष्क्रियतातो है ही, यह भी कि 

नई पीढ़ी तो बिल्कुल रुदन नहीं कर रही। कुछ नहीं कर रही। अगर आज अंग्रेजी का साम्राज्यवाद हमारी भाषाओं को लील रहा है तो उसका मुकाबला करने के बजाए, शरणागत हो रही है । अगर नई पीढ़ी जाग जाती तो बात ही क्या थी। पर क्या हमने या हमारे साहित्यकारों ने नई पीढ़ी को जगाने का कोई प्रयास किया ,  अपनी पराजय  स्वीकारने को आगे बढ़ना कैसे कह सकते हैं ?सही सवाल . इन दिनों कविता और कहानी लेखन ख़ूब हो रहा है लेकिन विविध विषयों पर हिंदी में मौलिक लेख देखने को नहीं मिलते . शायद इसके शुरुआत डाक्टर वैदिक ने विदेश नीति पर अबसे कोई चालीस पचास साल पूर्व की थी लेकिन उनके भी अब इस विषय पर धारदार लेख नहीं दिखते . जब भारती जी धर्मयुग में थे , राहुल जी जनसत्ता बम्बई में थे तो इन महानुभावों ने हम जैसे अंग्रेज़ी में लिखने वालों से हिंदी में  कम्प्यूटर और अन्य तकनीकी विषयों पर लेख लिखाने  की शुरुआत की  थी  अब हिंदी पत्रिकाएँ तो एक एक करके बंद हो गयीं और अख़बार भी प्रायोजित फ़ीचर या  फिर ख़ास क़िस्म की राजनैतिक विचार धारा के पोषण के अलावा कुछ ख़ास नहीं कर रहे हैं . बात ज़रा कड़वी है लेकिन दवाई कड़वी ही होती है
प्रदीप 
गुप्ता ( बाद में मिली टिप्पणी जोड़ रहा हूँ ।) –सही सवाल . इन दिनों कविता और कहानी लेखन ख़ूब हो रहा है लेकिन विविध विषयों पर हिंदी में मौलिक लेख देखने को नहीं मिलते . शायद इसके शुरुआत डाक्टर वैदिक ने विदेश नीति पर अब से कोई चालीस पचास साल पूर्व की थी, लेकिन उनके भी अब इस विषय पर धारदार लेख नहीं दिखते ।  जब भारती जी धर्मयुग में थे , राहुल जी जनसत्ता बम्बई में थे तो इन महानुभावों ने हम जैसे अंग्रेज़ी में लिखने वालों से हिंदी में  कम्प्यूटर और अन्य तकनीकी विषयों पर लेख लिखाने  की शुरुआत की  थी  अब हिंदी पत्रिकाएँ तो एक एक करके बंद हो गयीं और अख़बार भी प्रायोजित फ़ीचर या  फिर ख़ास क़िस्म की राजनैतिक विचार धारा के पोषण के अलावा कुछ ख़ास नहीं कर रहे हैं । बात ज़रा कड़वी है लेकिन दवाई कड़वी ही होती है।

उषा किरण खान –
सही कहा । एक और मुद्दा आप लोग ही उठाएं तो बात बने कि सी.बी.एस. ई. बोर्ड में प्लस टू में हिंदी अनिवार्य विषय इस सदी में नहीं है ।

अनिल विजय –
दसवीं तक है शायद ।

यह परिचर्चा यहीं समाप्त नहीं होती, परिचर्चा तो जारी है और जारी रहेगी निरंतर…। यहाँ नहीं भी तो आपके दिलो दिमाग में, यह चलती रहनी चाहिए।हर दिन , हर समय, हर मंच पर हर किसी से जहाँ कहीं भी संभव हो बात करें।हम अपनी भाषाएँ न बचा पाए तो बचाने को कुछ न बचेगा..।

2 thoughts on “हिंदी को बचाने-बढ़ानें में साहित्यकारों की भूमिका ?

  1. जब तक अभियांत्रिकी, मेडिकल, और वैधिक (कानूनी) पारिभाषिक शब्दावली हिन्दी/संस्कृत में,
    सहज उपलब्ध नहीं होगी; तब तक हिन्दी में पाठ्य पुस्तकें प्रकाशित ही नहीं हो सकती. बहुत ही थोडा शब्द रचना का काम हुआ है.
    है—————————————————
    मेरी टिप्पणी.
    (१) अभियांत्रिकी (तकनीकी), वैद्यकीय (मेडिकल), और वैधिक (कानूनी) इत्यादि ==> पारिभाषिक शब्दावलियों की कमी को पहले पाटना होगा.
    (२) यह मौलिक काम संस्कृत की शब्दरचना को और साथ साथ विशेष विषयों को (कुछ) जाननेवाले जब कर पाएंगे, पाठ्य पुस्तके लिखना आसान होगा.
    (३) मात्र त्रुटियाँ गिनाना और शिकायत करते रहने से कुछ होगा नहीं.
    (४) इस शृंखला की पहली कडी (क) पारिभाषिक शब्दावली है.
    (ख) दूसरी कडी विषय का तज्ञ लेखक जो हिन्दी में शब्दावली का उचित उपयोग कर पाठ्य पुस्तक लिखें
    (५) अभियांत्रिकी और वैद्यकीय क्षेत्रों के जानकारों के सामने यह चुनौती है.
    (६) यह काम समर्पित विद्वानों का है.
    (७) हमे ७० वर्षों के उपेक्षित क्षेत्र को परिपूरित करना होगा.
    (८) क्रिटिकल पाथ (निर्णायक पथ) पहले आयोजित करना होगा.
    (९) यह नारों का वा आज तक के शासन को दोष देने में समय गँवाने का विषय नहीं है.
    (१०) इस टिप्पणी कार ने इसी प्रवक्ता में ९० + आलेख भाषा के विविध अंगों पर लिखे हैं. समग्र ढाँचे पर विचार व्यक्त किए हैं.
    =======================================
    (११) सारे विद्वान अंग्रेज़ी के पीछे पडे हैं.
    (१२) क्यों ? क्योंकि वहां शीघ्र सफलता है.
    (१३) विषय के समस्त अंगों पर विचार किया हुआ यह भारत माता का विनम्र सेवक उपेक्षित क्यों है?
    (१४) क्योंकि अंग्रेजी के गुलाम और हिन्दी के द्वेष्टा सारा मंच अधिकार में किए हुए हैं.
    (१५) एवं दोनो (संस्कृत और अंग्रेज़ी) क्षेत्रों के और विशिष्ट विषय के जानकारों की बहुत बहुत कमी इस क्षेत्र की सबसे बडी त्रुटि है.
    (१६) आत्म श्लाघा ना समझे. पत्थर मार कर सभी की नीन्द उडाना चाहता हूँ. चिल्ला चिल्ला कर कहना चाहता हूँ.
    डॉ. मधुसूदन

  2. (१) अभियांत्रिकी (तकनीकी), वैद्यकीय (मेडिकल), और वैधिक (कानूनी) इत्यादि ==> पारिभाषिक शब्दावलियों की कमी को पहले पाटना होगा.
    (२) यह मौलिक काम संस्कृत की शब्दरचना को और साथ साथ विशेष विषयों को (कुछ) जाननेवाले जब कर पाएंगे, पाठ्य पुस्तके लिखना आसान होगा.
    (३) मात्र त्रुटियाँ गिनाना और शिकायत करते रहने से कुछ होगा नहीं.
    (४) इस शृंखला की पहली कडी (क) पारिभाषिक शब्दावली है.
    (ख) दूसरी कडी विषय का तज्ञ लेखक जो हिन्दी में शब्दावली का उचित उपयोग कर पाठ्य पुस्तक लिखें
    (५) अभियांत्रिकी और वैद्यकीय क्षेत्रों के जानकारों के सामने यह चुनौती है.
    (६) यह काम समर्पित विद्वानों का है.
    (७) हमे ७० वर्षों के उपेक्षित क्षेत्र को परिपूरित करना होगा.
    (८) क्रिटिकल पाथ (निर्णायक पथ) पहले आयोजित करना होगा.
    (९) यह नारों का वा आज तक के शासन को दोष देने में समय गँवाने का विषय नहीं है.
    (१०) इस टिप्पणी कार ने इसी प्रवक्ता में ९० + आलेख भाषा के विविध अंगों पर लिखे हैं. समग्र ढाँचे पर विचार व्यक्त किए हैं.
    =======================================
    (११) सारे विद्वान अंग्रेज़ी के पीछे पडे हैं.
    (१२) क्यों ? क्योंकि वहां शीघ्र सफलता है.
    (१३) विषय के समस्त अंगों पर विचार किया हुआ यह भारत माता का विनम्र सेवक उपेक्षित क्यों है?
    (१४) क्योंकि अंग्रेजी के गुलाम और हिन्दी के द्वेष्टा सारा मंच अधिकार में किए हुए हैं.
    (१५) एवं दोनो (संस्कृत और अंग्रेज़ी) क्षेत्रों के और विशिष्ट विषय के जानकारों की बहुत बहुत कमी इस क्षेत्र की सबसे बडी त्रुटि है.
    (१६) आत्म श्लाघा ना समझे. पत्थर मार कर सभी की नीन्द उडाना चाहता हूँ. चिल्ला चिल्ला कर कहना चाहता हूँ.

    क्रुतज्ञता पूर्वक
    डॉ. मधुसूदन (स्ट्रक्चरल इन्जिनियर -प्रोफ़ेसर युनिवर्सीटी ऑफ मॅसॅच्युसेट्स)

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