सहारनपुर संघर्ष: जाति और राजनीति का सम्मिश्रण

सहारनपुर संघर्ष: जाति और राजनीति का सम्मिश्रण
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सहारनपुर का की सरकार की के लिये पहली बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है और यहां के दलित एवं ठाकुर समुदाय के नेता दावा करते हैं कि सहारनपुर के जातिगत संघषरें में राजनीति की एक अंत:धारा है जिसने मुस्लिमों को भी अपने दायरे में समेट लिया है।

करीब 600 दलितों और 900 ठाकुरों की आबादी वाले गांव शब्बीरपुर से हिंसक चक्र की शुरआत हुई थी।

इन संघषरें के दलित पीड़ितों का कहना है कि उंची जाति के ठाकुरों ने उन्हें गांव के रविदास मंदिर परिसर में बाबासाहिब अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित नहीं करने दी थी।

बाद में पांच मई को राजपूत राजा महाराणा प्रताप की जयंती के उपलक्ष्य में ठाकुरों के एक जुलूस पर एक दलित समूह ने आपत्ति जतायी तो इससे हिंसा फूट पड़ी। इसमें एक व्यक्ति को अपनी जान गंवानी पड़ी और 15 लोग घायल हो गये।

गांव के जाटव दलितों का कहना है कि जब तक ‘‘बहनजी’’ :मायावती: का शासन था तब तक ठाकुरों ने अपनी भावनाएं दबाये रखीं लेकिन अब चीजें बदल गयी हैं।

सहारनपुर जिला अस्पताल में अपने जख्मों का उपचार करा रहे 62 वर्षीय दाल सिंह कहते हैं, ‘‘ठाकुर समुदाय से आने वाले योगी आदित्यनाथ के सरकार की बागडोर संभालन पर उनकी जाति के लोग अपना दबदबा जता रहे हैं।’’ वह कहते हैं, ‘‘बसपा शासन के दौरान वे कहा करते थे, ‘दलितों को छुना तक नहीं। वे हाई वोल्टेज के तार है।’ अब वे कत्लेआम मचा रहे हैं। इस सरकार को आये बमुश्किल दो महीने ही हुए हैं, पांच साल तो लंबा वक्त है।’’

( Source – PTI )

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