तकनीक का साइड इफेक्ट : डायरी-13 मिशन तिरहुतीपुर

दिल्ली में हमने जो खरीददारी की थी उसमें एक बोरी पोलीएस्टर ग्रैन्यूल्स, फाइबर ग्लास मेस और बब्बल रैप के बंडल, बच्चों के लिए ढेर सारे खिलौने और ऐसे ही कई दूसरी चीजें थीं। सबको हमने किसी तरह कार में ठूंसा और गांव जाने के लिए तैयार हो गए। 25 नवंबर को मेरा एकादशी का व्रत था, इसलिए उस दिन दिल्ली में ही रुकना पड़ा। अगले दिन व्रत का पारण कर मैं और कमल नयन गांव के लिए रवाना हो गए। लेकिन गांव पहुंचने के पहले हमें कुछ दिन कानुपर में रुककर कई चीजें देखनी-सीखनी थीं। वहां जानकार लोगों से पूछकर हमें कुछ उपकरण भी खरीदने थे।

कानपुर में सबसे पहले हमें एक फार्म पर पहुंचना था। हमारे मित्र सुरेश अग्निहोत्री जी ने बताया था कि ठीक गंगाजी के किनारे लगभग 20 एकड़ में फैला वह फार्म किसी तपोस्थली से कम नहीं है। बिठूर शहर से लगभग 7 किमी दूर स्थित उस फार्म के आस-पास कोई गांव भी नहीं है।

सुरेश जी के बताए फार्म पर कुछ नया सीखने की इच्छा लिए हम आगे बढ़ रहे थे। लेकिन हमें नहीं मालूम था कि उसके पहले ही हमें एक सीख मिलने वाली है। वास्तव में प्रकृति कई बार बहुत गहरी बात हमें सहज ही सिखा जाती है। अगर हम सचेत हैं तो वह बात हमें अच्छे से समझ आ जाती है और फिर पूरे जीवन उसका लाभ मिलता है।

फार्म पर हम पहली बार आ रहे थे, इसलिए सुरेश जी ने वहां का रास्ता मुझे बहुत अच्छे से समझाया था। उन्होंने जोर देकर कहा था कि हम वहां सूर्यास्त के पहले पहुंच जाएं क्योंकि रात में फार्म को ढूंढना मुश्किल हो सकता है। लेकिन मैंने उनकी बातों पर बहुत ध्यान नहीं दिया। मुझे उनसे ज्यादा गूगल पर भरोसा था। चूंकि मेरे पास फार्म के जीपीएस कोआर्डिनेट्स थे, इसलिए मुझे लगा कि उनके निर्देश को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है।

सूर्यास्त तक हमें फार्म पर पहुंचना था, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। जब हम आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे से उतर कर कानपुर की ओर जाने वाले नेशनल हाईवे-19 पर पहुंचे, तभी सूर्य देवता ने हमसे विदा ले ली। धीरे-धीरे अंधेरा बढ़ रहा था। लेकिन हमें कोई घबराहट नहीं थी। हम अपने फोन पर गूगल मैप की कमेंट्री सुनते हुए आगे बढ़ रहे थे। आस-पास कौन सी जगह है, इसकी हमें कोई परवाह नहीं थी। हमें तो अपने गंतव्य से मतलब था जिसकी जानकारी गूगल के माध्यम से लगातार मिल रही थी।

अचानक गूगल ने हमें एक सुनसान रास्ते की ओर मुड़ने के लिए कहा। एक पल के लिए मन आशंकित हो उठा। लगा कि किसी से पूछ लिया जाए, लेकिन वहां से फार्म की दूरी गूगल केवल 3 किमी बता रहा था, इसलिए हम ज्यादा परेशान नहीं हुए और गाड़ी को गूगल के बताए रास्ते पर हांक दिया।

अभी हम मुश्किल से एक किमी ही आगे बढ़े होंगे कि पक्की सड़क कच्चे रास्ते में बदल गई। मन में एक बार फिर विचार उठा कि किसी से पूछ लें, लेकिन अभी भी हमारा गूगल पर भरोसा बना हुआ था। हम आगे बढ़ते रहे। लेकिन जैसे-जैसे फार्म की दूरी घट रही थी, हमारा रास्ता खराब से और खराब होता जा रहा था। जब हम फार्म से मात्र 500 मीटर की दूरी पर थे, हमारी कार रुक गई। आगे ऐसा रास्ता था जिस पर केवल ट्रैक्टर ही चल सकता था। उस पर चलना सेंट्रो के बस की बात नहीं थी।

उस समय रात के लगभग 10 बज रहे थे। आस-पास एक भी आदमी नहीं था, जिससे कुछ पूछा जा सके। मैंने कमल से कहा कि वे गूगल की मदद से फार्म तक पैदल पहुंचें और सुरेश जी को लेकर गाड़ी तक आएं। सौभाग्य से उस दिन सुरेश जी भी फार्म पर ही रुक कर हमारा इंतजार कर रहे थे। कमल जब चले गए, तभी मैंने देखा कि दो आदमी मेरी ओर आ रहे हैं। शुक्ल पक्ष की द्वादशी में गंगातट के उस निर्जन क्षेत्र में चंद्रमा की दुधिया रोशनी उस रात इतनी अच्छी थी कि उसमें सब कुछ साफ-साफ दिख रहा था। मैंने देखा कि जो व्यक्ति मेरी ओर आ रहे हैं, उनके हाथ में भाला और गंड़ासा है। एक क्षण के लिए मैं डर गया लेकिन जल्दी ही पता चला कि वे किसान हैं। रात में जंगली सुअरों से सुरक्षा के लिए हथियार लेकर चलते हैं। सुनसान रात में खेत के बीचोबीच कार देख उन्हें कौतुहल हुआ और क्या मामला है, यह जानने के लिए मेरे पास आ गए थे।

जब मैं किसानों से बात कर रहा था, उसी समय हवा में टार्च लहराते और जोर-जोर से पुकारते सुरेशजी आते दिखे। उन्होंने आते ही गाड़ी वापस घुमाने का निर्देश दिया। मैंने चुपचाप उनका अनुसरण किया। इस बार गूगल बाबा का मुंह बंद था। दुर्गम्य कच्चे रास्तों से उस बेचारी सेंट्रो को पुचकारते हुए मैं पक्की सड़क की ओर लौटने लगा। अंततः रात साढ़े दस बजे के आस-पास हम फार्म पर पहुंचे। शार्टकट के चक्कर में गूगल ने हमें फंसा दिया था। मैं मन ही मन सोचने लगा कि ग्रामीण परिवेश में तकनीक के साथ-साथ स्थानीय व्यक्ति के अनुभव को पर्याप्त आदर देना भी बहुत जरूरी है। तकनीक पर अंधविश्वास खतरे से खाली नहीं।

अगले दिन उठते ही फार्म पर लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। इसमें सुरेश जी भी शामिल थे। नीरस से नीरस बात को सरस बना देना उन्हें बखूबी आता है। हमारी बात खेती से शुरू हुई लेकिन धीरे-धीरे उसमें इंजीनियरिंग का असर बढ़ता गया। तमाम तरह के उपयोगी उपकरणों के बारे में भी चर्चा हुई। सबकी राय थी कि मुझे अभी नए उपकरण खरीदने से बचना चाहिए। फार्म के संचालक ने मुझसे कहा कि इन उपकरणों को यहीं फार्म पर चला कर देख लीजिए, तब निर्णय लीजिए।

27 और 28 नवंबर को मैं फार्म पर रखे अलग-अलग उपकरणों के बारे में जानता समझता रहा। बीच-बीच में प्राकृतिक खेती को लेकर वहां चल रहे प्रयोगों को भी सुनता और गुनता जा रहा था। खेती के मामले में मेरे पास बताने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन जब बात इंजीनियरिंग की चली तो मेरे पास भी सबसे साझा करने के लिए कई बातें थीं। फार्म के संचालक महोदय जो स्वयं इंजीनियर हैं, उनसे जिओडेसिक डोम की डिजाइन पर विस्तार से बात हुई। हमें लगा कि इस बारे में कुछ प्रयोग करने की जरूरत है, लेकिन समय कम था, इसलिए तय हुआ कि अगली बार कम से कम एक हफ्ते के लिए फार्म पर आऊं और फिर सभी आवश्यक प्रयोग कर के देखा जाए।

29 नवंबर की सुबह उठकर हमने फार्म पर बनने वाले स्पेशल काढ़े का आनंद लिया जिसे खास तरह के ‘राकेट स्टोव’ की आंच पर पकाया जाता है। फार्म पर चाय नहीं मिलती। अलाव में हाथ सेंकते और काढ़ा पीते-पीते बातचीत का एक और दौर चला। बातें बहुत सी थीं, लेकिन फिलहाल हमें निकलना था। स्नान-ध्यान के बाद मैंने और कमल ने फार्म पर ही उपजे आर्गेनिक पपीते का नास्ता किया और अपनी गाड़ी लेकर गांव के लिए चल दिए। कानपुर के इस फार्म पर हमने जो भी सीखा-समझा था, वह गांव में हमारे बहुत काम आने वाला था।

इस डायरी में फिलहाल इतना ही। आगे की बात डायरी के अगले अंक में, इसी दिन इसी समय, रविवार 12 बजे। तब तक के लिए नमस्कार।

विमल कुमार सिंह
संयोजक, मिशन तिरहुतीपुर

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