कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्स फाउंडेशन द्वारा संचालित बाल मित्र ग्राम के पूर्व बाल मजदूर सुरजीत लोधी को मिला ब्रिटेन का प्रतिष्ठित डायना अवार्ड

 
कैलाश सत्‍यार्थी चिल्‍ड्रेन्स फाउंडेशन (केएससीएफ) द्वारा संचालित मध्‍य प्रदेश में विदिशा जिले के गंजबासौदा प्रखंड के शहवा बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) के पूर्व बाल मजदूर और वर्तमान में राष्‍ट्रीय बाल पंचायत के उपाध्‍यक्ष 17 वर्षीय सुरजीत लोधी को अपने गांव को नशामुक्‍त करने और कमजोर तबकों के बच्‍चों को शिक्षित करने के लिए 2021 के प्रतिष्ठित ब्रिटेन के डायना अवार्ड से सम्‍मानित किया गया है। डायना पुरस्कार वेल्स की दिवंगत राजकुमारी डायना की स्मृति में स्थापित किया गया है। यह पुरस्कार इसी नाम के चैरिटी द्वारा प्रदान किया जाता है और इसे दिवंगत राजकुमारी के दोनों बेटों ड्यूक ऑफ कैम्ब्रिज और ड्यूक ऑफ ससेक्स का समर्थन प्राप्त है।
 
सुरजीत दुनिया के उन 25 बच्‍चों में शामिल हैं जिन्‍हें इस गौरवशाली अवार्ड से सम्‍मानित किया गया। सुरजीत के प्रमाणपत्र में इस बात का विशेष रूप से उल्‍लेख किया गया है कि दुनिया बदलने की दिशा में उसने नई पीढ़़ी को प्रेरित और गोलबंद करने का महत्वपूर्ण प्रयास  किया है। कोविड संकट की वजह से उन्हें यह अवार्ड वर्चुअल माध्यम द्वारा आयोजित एक समारोह में प्रदान किया गया। गौरतलब है कि सुरजीत केएससीएफ द्वारा संचालित बीएमजी की चुनी हुई बाल पंचायत के ऐसे तीसरे सदस्‍य हैं जिसे डायना अवार्ड से सम्‍मानित किया गया है। सुरजीत से पहले यह अवार्ड झारखंड की चम्‍पा कुमारी और नीरज मुर्मू को मिल चुका है।
 
सुरजीत लोधी का जन्‍म पिछड़ी जाति के एक गरीब परिवार में हुआ। सुरजीत के प्रयासों ने बच्चों और महिलाओं के जीवन में स्‍थाई परिवर्तन लाने का काम किया है। उसके गांव के अधिकांश बच्चे स्‍कूलों नहीं जाते थे और वे अपने माता-पिता के साथ काम करते थे। दूसरी ओर गांव के अधिकांश पुरुष शराब पर अपनी सारी कमाई खर्च कर डालते और नशे में पत्नी और बच्चों के साथ बुरा सलूक करते थे।
 
सुरजीत के प्रयासों और संघर्ष से 120 बच्चों को स्कूल में दाखिला कराया गया और उन्हें शिक्षा प्राप्त करने में सफलता मिली। सुरजीत के प्रयास से और बच्‍चों का भी स्‍कूलों में नामांकन जारी है। ग्राम पंचायत के सहयोग से सुरजीत ने बाल मित्र ग्राम के अन्य बच्चों के साथ मिलकर गांवों में शराब की अवैध रूप से चल रही 5 दुकानों को बंद करवा दिया। इस तरह से गांवों में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा और महिलाओं और बच्चों को शारीरिक और मानसिक हिंसा से मुक्ति भी मिली। 17 साल का सुरजीत जब 14 साल का था, तब गाली-गलौज और हिंसा का उसे रोजाना सामना करना पड़ता। उसके पिता अपनी सारी कमाई शराब पर खर्च कर देते। जिससे उसका परिवार आर्थिक रूप से असुरक्षित हो गया और सुरजीत को कम उम्र में स्कूल छोड़ना पड़ा और काम पर जाना पड़ा। उसके पिता अक्सर सुरजीत और उसकी मां की पिटाई कर देते थे। गौरतलब है कि सुरजीत की तरह उस इलाके के लगभग सभी बच्‍चों को अपने पिता की उपेक्षा और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता।
 
अपने साथ प्रतिदिन होने वाली हिंसा से निराश सुरजीत ने अपने पिता की शराब छुड़ाने का संकल्‍प लिया। सुरजीत के दृढ़ निश्‍चय और साहस ने रंग लाया और अगले कुछ दिनों में उसके पिता ने शराब नहीं पीने की कसम खाई। इस तरह सुरजीत का हौसला बुलंद हुआ। उसने केएससीएफ के बीएमजी और बाल पंचायत के सहयोग से विभिन्न गांवों में शराब विरोधी अभियानों के तहत जन-जागरुकता अभियान चलाया। समाज के 400 से ज्‍यादा लोगों ने उसका समर्थन किया। उसकी सफलता से प्रेरित होकर भिले और शहवा बीएमजी के बच्चों और महिलाओं ने मांग की कि पुरुषों द्वारा शराब के सेवन पर खर्च किए जाने वाले पैसों को बच्चों को शिक्षित करने और घर की माली हालत को सुधारने में खर्च किया जाए। गंजबासौदा के शंकर गढ़, लमन्या, बधार, शहवा और भिले में शराब की पांच दुकानों को बंद कराने के लिए सरकार और प्रशासन को आवेदन दिए गए। दो साल के लगातार संघर्ष और कड़ी मेहनत के बाद 2019 में शराब की पांच दुकानों को बंद कर दिया गया। वर्तमान में सुरजीत बाल पंचायत सदस्यों और महिला समूहों के समर्थन से शराब विरोधी अभियान का नेतृत्व कर रहा है। अवैध शराब की दुकान चलाने वाले दो लोगों पर उसने जुर्माना भी लगाया है।
 
सुरजीत को डायना अवार्ड मिलने पर केएससीएफ की कार्यकारी निदेशक (बीएमजी, प्रोग्राम) मलाथी नागासायी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, “मुझे गर्व है कि सुरजीत ने अपने गांव में महिलाओ के प्रति घरेलु हिंसा जैसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध लड़ाई छेड़ी, यह एक बहादुरी का काम था। इस बुराई का मुख्य कारण अत्यधिक शराब का सेवन था। सुरजीत ने अवैध शराब बंदी की मुहिम का नेतृत्व किया और पूर्व बाल मजदूरों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने की महत्वपूर्ण पहल भी की। उसके प्रयासों से 120 से ज्‍यादा बच्‍चे पढ़ने-लिखने लगे। सुरजीत ने अपने इलाके को नशामुक्‍त करके समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है। उसमें एक तेज-तर्रार नेता के भरपूर गुण हैं और वह हमारे बीएमजी के बच्चों के लिए आदर्श है।” 
 
डायना अवार्ड मिलने पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए सुरजीत कहते हैं, ‘‘इस सम्‍मान ने मेरी जिम्‍मेदारी को और बढ़ा दिया है। मैं अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अब उन बच्‍चों को भी स्‍कूल में दाखिला दिलाने का काम करूंगा, जिनकी पढ़ाई बाधित है। मैं नशामुक्ति अभियान को और तेज करूंगा, जो इलाके की समस्‍याओं की जड़ है। नोबेल शांति पुरस्‍कार विजेता श्री कैलाश सत्‍यार्थी मेरे मार्गदर्शक और आदर्श हैं। उन्‍हीं के विचारों की रोशनी में मैं बच्चों को शिक्षित और अधिकारसंपन्‍न बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा हूं।’’
 
बीएमजी बाल मित्र समाज बनाने की नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित श्री कैलाश सत्‍यार्थी की एक अभिनव पहल है। बीएमजी ऐसे गांवों को कहते हैं जहां के बच्‍चे बाल मजदूरी नहीं करते हों और वे सभी स्‍कूल जाते हों। वहां एक चुनी हुई बाल पंचायत होती है, जिसे ग्राम पंचायत मान्यता देती है। ग्राम पंचायत के निर्णयों में बच्चों का प्रतिनिधित्व होता है। बीएमजी में बच्‍चों को गुणवत्‍तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था के साथ-साथ उनमें नेतृत्‍व क्षमता के गुण भी विकसित किए जाते हैं। बीएमजी के बच्‍चे पंचायतों के सहयोग से गांव की समस्‍याओं का समाधान करते हुए उसके विकास में अपना सहयोग भी देते हैं।  
सुरजीत को 2018 में राष्‍ट्रीय बाल पंचायत का उपाध्‍यक्ष चुना गया। उसने शराब के कारण बच्चों और परिवारों को तबाह होते देखा और समस्या को खत्म करने के लिए एक दिन ग्राम पंचयात की बैठक में उसने निर्णयकर्ताओं से सवाल किया, “ऐसे माहौल में बच्चे कैसे सुरक्षित रह सकते हैं जहां घर की चारदीवारों में हिंसा और दुर्व्यवहार हो? मैं आपसे बच्चों को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई का आह्वान करता हूं।” सुरजीत सरपंच और पंचयात के सदस्यों को अपनी बात समझाने में सफल हुआ। बस फिर क्‍या था, सुरजीत और बाल पंचायत के सदस्यों ने यह सुनिश्चित किया कि गांव के स्कूल की चारदीवारी और शौचालय का निर्माण ग्राम पंचायत के सहयोग से हो। उल्‍लेखनीय है कि सुरजीत को अशोक यूथ वेंचर फेलोशिप भी मिल चुकी है।
 
कोरोना महामारी से संबंधित व्‍याप्‍त अंधविश्‍वासों और भ्रांतियों को भी अपने इलाके में सुरजीत ने दूर किया और 100 से ज्‍यादा लोगों का टीकाकरण कराया। उसने मार्च 2020 से लॉकडाउन अवधि के दौरान गांव के युवाओं को एकजुट किया, ताकि गरीबों और वंचितों को भोजन, मास्‍क और सैनिटाइजेशन की सुविधाएं मिले और टीकाकरण अभियान को बढ़ावा दिया जा सके।

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