दिल्ली की सत्ता हथियाने को इस बार कुछ जल्दी ही कवायद शुरू हो गई है। शुरूआत पके व तपे नेता राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार की ओर से की गई है। श्री पवार को शुद्ध क्षेत्रीय क्षत्रप कहकर उनकी अहमियत को कम नहीं किया जा सकता। वो राष्ट्रीय राजनीति के मंझे खिलाड़ी रहे हंै। दुर्भाग्यवश वो चाहकर भी आज तक लाल किले पर तिरंगा फहराने का अवसर नहीं पा सके हैं।
श्री पवार की हर संभव कोशिश होगी कि सभी विपक्षीदल मिलकर २०२४ के लोकसभा चुनाव में इन्हे प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित करें और विजयी बनवाकर इनकी प्रधानमंत्री बनने की इच्छा पूरी करें।
समझा जाता है कि इसके लिये वो भावुक अपील भी कर सकते हैं-       ‘उनके लिये २०२४ का चुनाव आखिरी अवसर होगा पर यदि २०२४ में वो प्रधानमंत्री नहीं बन सके तो उनके जीवन की यह आस अधूरी ही रह जायेगी और आत्मा प्यासी रहकर भटकती रहेगी।Ó
राजनीतिक सूत्रों का कहना है कि श्री पवार ने मंगलवार की शाम विपक्षी दलों की अपने दिल्ली आवास पर जो बैठक बुलाई है उसमें जहां सभी प्रमुख विपक्षी दलों को बुलाया गया है वहीं कांगेे्रस को बैठक से परे रखा गया है। इसे न तो राजनीतिक हलकों में कोई गंभीर मुद्दा माना जा रहा है और न ही प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस इसे गंभीरता से लेती दिख रही है।
सूत्रों का कहना है कि श्री पवार किसी भी स्थिति में नये तीसरे मोर्चे में कांग्रेस को शामिल नहीं करेंगे। उन्हे अच्छी तरह पता है कि कांग्रेस आला कमान श्रीमती सोनिया गांधी सरकार बनाने का मौका आने पर सिवाय अपने इकलौते पुत्र राहुल गांधी के अलावा अन्य किसी नेता को प्रधानमंत्री नहीं बनने देगी।
ऐसी स्थिति से बचने के लिये ही श्री पवार शुरू से कांग्रेस से दूरी बनाकर चलना चाहते हैं। हालांकि वे चाहेगें कि कांग्रेस से रूठे नेताओं की फ ौज उनके मोर्चे को समर्थन दे। भले ही वे अलग पार्टी बनाकर ऐसा कर सकते हैं।
राजधानी के गलियारों में अहम सवाल यह उठाया जा रहा है कि माना कि श्री पवार अपने कथित तीसरे मोर्चे से कांग्रेस को अलग रखकर अपने लिये रास्ता साफ  रखने की योजना पर कार्य कर रहे हैं पर वे तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी को कैसे रोक पायेगें? क्या वो गठबंधन बनने के बाद उनसे प्रधानमंत्री के मुद्दे को सुलझाने की पहल करेंगी या वो चुनाव परिणाम आने तक इंतजार करेंगी।
चर्चा यह भी है कि यदि विपक्षीदलों की बैठक ‘राष्ट्रीय मंचÓ के बैनर तले बुलाई गई है जोकि टीएमसी के नेता बन चुके यशवंत सिन्हा का है तो क्या यह ममता बनर्जी की सहमति से हो रहा है और क्या प्रशांत किशोर श्री पवार से बार-बार मिल रहे हैं तो इसके पीछे भी ममता की ही कोई रणनीति है? क्या ये दोनो किरदार मौका आने पर ममता बनर्जी को ही प्रधानमंत्री पद का एक मात्र दावेदार सिद्ध करके श्री पवार का रास्ता रोक देंगें?
राजनीतिक विश£ेषकों का कहना है कि ममता बनर्जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा शरद पवार से कम नहीं है। यदि वे अतीत में कांग्रेस को लात मार चुकी है, राजग से भी किनारा कर चुकी हंै तो ये उनकी महत्वाकांक्षा का ही प्रमाण है।  ऐसे में २०२४ में यदि विपक्षीदलों को सरकार बनाने का अवसर मिलता है तो ममता बनर्जी किसी अन्य को प्रधानमंत्री पद पर पहुंचाने की बजाय स्वयं प्रधानमंत्री बनने को ही तरजीह देगी जो निश्चित नये घमासान का कारण बन सकता है।
राजनीतिक विश£ेषकों ने स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल का चुनाव दुबारा जीतकर ममता बनर्जी अति आत्मा विश्वास से लबरेज हैं। चुनाव से ही नहीं उसके पूर्व से ही वो केन्द्र सरकार से टकराव लेती रही हैं जो चुनाव जीतने के बाद भी जारी है। वो यदि विभिन्न मौकों पर सीधे प्रधानमंत्री को बार-बार चुनौती देती नजर आती हैं तो उसका एक ही मकसद है कि वो अपने को सबसे अधिक ताकतवर विपक्षी नेता सिद्ध करना चाहती हैं। यही नहीं ममता बनर्जी ने चुनाव के दौरान नारा दिया था कि बंगाल तो जीतेगें ही २०२४ में केन्द्र में भी सरकार बनायेगें।
जानकार सूत्रों का दावा है कि पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव जीतने के बाद अब ममता बनर्जी हर हाल में २०२४ के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की सभी संसदीय सीटे जीतना चाहेगी। और यदि वो ऐसा करने में         सफ ल होती हैं तो वो प्रधानमंत्री पद की अपनी उम्मीदवारी घोषित करने में शायद ही देर लगाये। और यदि ऐसा होता है जो कि होना तय है तो एक बार पुन: प्रधानमंत्री पद का सर्वमान्य चेहरा तय करना विपक्षी दलों के किसी भी मोर्चे के लिये टेढ़ी खीर ही होगी। 

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