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हथेली से रेत की तरह फिसल रहा है समय, COP26 और जी20 होंगी निर्णायक: विशेषज्ञ

ग्‍लासगो में अगले महीने आयोजित होने वाली सीओपी26 और दिसम्‍बर में इटली की मेजबानी में होने जा रही जी20 शिखर बैठकों को जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और क्‍लाइमेट फाइनेंसिंग से सम्‍बन्धित मुद्दों पर सही मायनों में सार्थक बातचीत के मंच के तौर पर यादगार बनाने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के मुद्दे पर अस्‍पष्‍टता, रणनीति की कमी और वादाखिलाफी का दौर पहले ही काफी लम्‍बा खिंच चुका है।

पैरिस समझौते की शिल्‍पकार और यूरोपियन क्‍लाइमेट फाउंडेशन की सीईओ लॉरेंस ट्यूबियाना, ग्‍लोबल ऑप्टिमिज्‍म की सह संस्‍थापक और यूएनएफसीसीसी की पूर्व एग्जिक्‍यूटिव सेक्रेट्री क्रिस्टियाना फिगरेस तथा क्‍लाइमेट वलनरेबल फोरम की सलाहकार फरहाना यामीन ने एक वेबिनार में सीओपी26 और जी20 की बैठकों में दुनिया के सबसे बड़े प्रदूषणकारी देशों से लगायी जा सकने वाली उम्‍मीदों और जलवायु वित्‍त, जलवायु न्‍याय तथा क्षेत्रीय सौदों से सम्‍बन्धित मुद्दों पर अपनीअपनी राय रखी।

क्रिस्टियाना ने कहा कि यह स्पष्ट है कि COP26 का पहला लक्ष्य वैश्विक तापमान में बढ़ोत्‍तरी को सीमित रखने की अधिकतम निर्धारित सीमा यानी डेढ़ डिग्री सेल्सियस को एक ‘टेंपरेचर सीलिंग’ के तौर पर संरक्षित करना होना चाहिये। मैं यहां पर इसे सीलिंग कहकर इसलिए संबोधित कर रही हूं क्योंकि हम अक्सर यह पढ़ते हैं कि यह तापमान संबंधी एक लक्ष्य है। वास्तव में लक्ष्य तो शून्‍य डिग्री सेल्सियस होना चाहिए लेकिन अब हम इससे आगे बढ़कर इसे टेंपरेचर सीलिंग के तौर पर जानना चाहेंगे।

उन्‍होंने कहा ‘‘मेरी नजर में COP26 में इस पर खास तौर पर चर्चा होगी। इसे मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला हम डेढ़ डिग्री सेल्सियस बढ़ोत्‍तरी के बहुत नजदीक पहुंच चुके हैं और इससे देशों की मंशा को लक्षित किया जा सकता है। हालांकि कुल मिलाकर इसके क्रियान्वयन की कोई मुकम्मल गारंटी नहीं है। दूसरा हिस्सा यह है कि क्योंकि हम जानते हैं कि इस बात की कोई गारंटी नहीं होने जा रही है कि हम डेढ़ डिग्री सेल्सियस की सीलिंग का संरक्षण कर पाएंगे। ऐसे में हम गाड़ी को 2023 तक पटरी पर कैसे लाएं। ब्राजील, मेक्सिको, ऑस्ट्रेलिया और रूस दुखद रूप से इस मामले में काफी पीछे हैं।’’

क्रिस्टियाना ने कहा कि हालांकि अंतिम समय पर उम्मीद की किरण नजर आ रही है। वह है चीन द्वारा उस कार्य योजना को सामने रखा जाना, जिसके जरिए वह 2060 तक नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करने का मंसूबा बना रहा है। यह बात सरकार के शीर्ष स्तर से बताई जा रही है। भारत के पास अक्षय ऊर्जा उत्पादन का अपना लक्ष्य हासिल करने की क्षमता है। नाइजीरिया, दक्षिण कोरिया और सऊदी अरब आगे जरूर आए हैं लेकिन उनमें से कोई भी ऐसे कदम नहीं उठा रहा है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सीलिंग से नीचे रखा जा सके।

उन्‍होंने कहा ‘‘मेरा मानना है कि सरकार जहां एक तरफ जलवायु परिवर्तन संबंधी तात्कालिकता और विज्ञान की उपेक्षा कर रही हैं, साथ ही साथ वे वास्तविक अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, कॉर्पोरेट और वित्तीय सेक्टर में व्याप्त परेशानियों के संपूर्ण महत्व को भी नहीं समझ रही हैं। क्योंकि क्योंकि अगर वे समझतीं तो साहसिक कदम उठाने में खुद को ज्यादा आरामदेह स्थिति में महसूस करतीं। दूसरा बिंदु यह है कि जब COP26 में लक्ष्य पर बात की जाएगी, उस वक्त न्यूनतम विश्वसनीयता का संरक्षण एक महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। वह 100 बिलियन का मामला होगा जिसका वादा बहुत पहले से किया गया है जो आज तक पूरा नहीं किया गया है।

क्रिस्टियाना ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने को लेकर वादों और दावों के स्तर पर चीजें बहुत अच्छी हैं लेकिन कदमों में पर्याप्तता नहीं है। खासतौर पर हाथ से निकल रहे समय को देखते हुए मेरा मानना है कि पृथ्वी की तरफ एक धूमकेतु बढ़ रहा है, जिसमें मानवता को मिटा देने की क्षमता है। इसकी तात्कालिकता से जुड़ा विज्ञान बिल्कुल स्पष्ट है। इसलिए जाहिर है कि हमारे पास इस बात का समय नहीं है कि हम इससे लड़ने के तरीकों के विकल्पों में से अपनी पसंद का चुनाव करें। साफ तौर से कहे तो यह एक माकूल प्रतिक्रिया देने का वक्त है। बिल्कुल सही दिशा में अपनी पूरी क्षमता और संसाधनों के साथ काम किया जाए। वास्तविकता यह है इस वक्त से 2030 तक हमें जलवायु परिवर्तन को लेकर जिस तरह की मुस्तैदी भरी प्रतिक्रिया की जरूरत है उसे अभी तक सामने नहीं लाया गया है।

क्लाइमेट वल्नरेबल फोरम की सलाहकार फरहाना यामीन ने कहा- जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयास तो जरूर किए जा रहे हैं लेकिन उनका कुछ खास फायदा नहीं हो रहा है क्योंकि हमें इससे कहीं ज्यादा बड़े प्रयास करने की जरूरत है। क्लाइमेट वल्नरेबल फोरम यह मांग कर रहा है कि एक क्लाइमेट इमरजेंसी पैक्ट किया जाए ताकि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कार्यों में फिर से विश्वास का संचार किया जा सके। हमें यह देखना ही होगा कि हम इस वक्त कहां खड़े हैं। हमें आपात स्थिति वाला रवैया अपनाकर काम करना होगा ताकि वैश्विक तापमान में वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने की उम्मीदें जिंदा रह सकें।

उन्‍होंने कहा कि वर्ष 2009 में आयोजित COP15 में क्लाइमेट वल्नरेबल फोरम तथा कई देशों ने प्रदूषण को लेकर अधिक कड़े नियम बनाने को कहा था। वर्ष 2015 में पेरिस में हुई शिखर बैठक में इस मुद्दे को एक बार फिर उठाया गया। अब छह साल बाद भी इस पर वैज्ञानिक और राजनीतिक सिद्धांत तय नहीं हो सके। हमें यह पूछना चाहिए कि आखिर यह विलंब क्यों हुआ। हमें बड़ी खामियों और बड़ी लापरवाहियों पर गौर करके उनका समाधान निकालना होगा। न जाने कितनी बार वादे और कानूनी बाध्यताओं को तोड़ा गया। अब विश्वास को दोबारा बनाना पड़ेगा। हम डिलीवरी पैकेज के बारे में भी कोई बहुत अच्छी बातें नहीं सुनते हैं। वर्ष 2020 के बाद कोविड-19 महामारी के कारण इस पैकेज की डिलीवरी बंद हो गई। वर्ष 2025 तक 600 बिलियन डॉलर्स की जरूरत पड़ेगी। अब बातचीत के लिए 5 साल और खर्च करना बहुत भारी पड़ेगा।

लॉरेंस ट्यूबियाना ने कहा कि पिछले यूएन एसेसमेंट पर गौर करें तो दुनिया में प्रदूषणकारी तत्वों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। हम इससे कतई खुश नहीं हो सकते। दुनिया में हर जगह जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल छोड़ अक्षय ऊर्जा अपनाकर अर्थव्यवस्था को बदलना कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए ईमानदारी, गंभीरता और स्पष्टता पूर्व शर्तें हैं। मेरा मानना है कि हर कोई इस बात को समझ सकता है कि योजनाओं में जरा भी स्पष्टता नहीं है और लोग इस बात से भी थक चुके हैं कि संकल्पबद्धताएं और लक्ष्य किसी सुगठित कार्ययोजना से जुड़े नहीं हैं। इससे गंभीरता का मुद्दा अपनी जगह से हट जाता है।

उन्‍होंने कहा कि पूंजी बाजार तक पहुंच बनाने की देशों की क्षमता, हर जगह घूमने वाले सार्वजनिक वित्‍त की क्षमता को सभी निजी तथा सार्वजनिक संस्‍थाओं के बीच एक गंभीर तालमेल बनाने की आवश्यकता है। उम्मीद है कि ग्लास्गो में आयोजित होने जा रही सीओपी26 में ऐसा कोई तंत्र बनाया जा सकेगा। हमें 2025 का इंतजार नहीं करना चाहिए। देशों को हर अगले साल एक पुनरीक्षित योजना के साथ सामने आना चाहिए।

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