विषयो की फेहरिस्त बदलनी बाकी है



अनिल अनूप 

अपने अक्स से मुखातिब भाजपा के लिए ऊना का पन्ना सम्मेलन, राजनीतिक इतिहास की जिरह की तरह मौजूद रहा। इसमें पार्टी का संगठन और राष्ट्रीय अध्यक्ष की खनक मौजूद रही। हिमाचल के बड़े नेताओं का स्वागत और कार्यकर्ताओं की ताल पर जयराम सरकार का आह्वान देखा, तो सवालों की बैसाखी पहने कांगे्रस को भी इस समागम की दिशा लांघनी होगी। अपने पन्ने की हिफाजत में भाजपा का ऊना समारोह वोटर की चरागाह रही, तो सवालों की बेडि़यों से बाहर आगामी लोकसभा का सियासी चरित्र कांगे्रसी संगठन से उसका दांव पूछ रहा है। इसलिए जिस हद तक भाजपा का साम्राज्य बिछा है, उसके भीतर हिमाचली कांगे्रस के प्रदेशाध्यक्ष भी सरहद बना रहे हैं। यह मतदाता सूची का महज एक पन्ना या करीब तीस वोटरों को समेटने का युद्ध होता, तो भाजपा की स्वयंसिद्धि का जवाब कांगे्रस के पास न होता, लेकिन बदले हालत पर कुलदीप राठौर की अंगुलियां भी आगामी चुनाव के लिए उसी पन्ने पर समर्थक गिन रही हैं। क्या अब पन्नों की गहरी स्याही तक कांगे्रस भी कर्मठता से अपना रंग चुन लेगी या प्रदेशाध्यक्ष पार्टी की विचारधारा का अलख जगा देंगे। जो भी हो भाजपा के पन्नों पर लिखी गई इबारत को पढ़ते हुए कांगे्रस भी अपने शब्द संयोजन को परिमार्जित कर रही है। इन दोनों पार्टियों के पास हिमाचली राजनीति के पन्नों की अदला-बदली होती रही है, इसलिए संवेदना के राष्ट्रीय फलक और प्रादेशिक महत्त्वाकांक्षा के बीच चुनाव को चुनती जनता को समाधान चाहिए। पांच साल पहले राज्य ने अपने समाधान की गुजारिश में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री चुना तो इसके साथ पर्वतीय अस्मिता तथा प्रगति की महत्त्वाकांक्षा की कद काठी भी जुड़ गई। अब देखना यह है कि जिस प्रदेश ने अपना सौ फीसदी यानी चारों सीटें भाजपा को दीं, उसके सांसदों ने इसके बदले प्रदेश को क्या लौटाया। यह सपनों का खेल है, इसलिए हकीकत के दर्पण पर पन्ना प्रमुख सम्मेलन और इसकी छांव में चारों सांसदों का रिपोर्ट कार्ड दर्ज होगा। यहां पन्ना प्रमुख को अपने सांसद का हिसाब देने की चुनौती तब तक रहेगी, जब तक कांगे्रस प्रश्नों के अपने तरकश मजबूत बनाए रखेगी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का ऊना दौरा, पार्टी की आतंरिक शक्ति का प्रदर्शन है, तो इसके सामने कांगे्रस को अपना कुनबा खड़ा करना है। कुलदीप राठौर के सामने लोकसभा चुनाव तक का सफर आम कार्यकर्ता की परवरिश का तंबू सरीखा है, जबकि भाजपा अपनी पुरानी कमाई को यथावत सहेजने की कोशिश में है। इसलिए अमित शाह ने हिमाचली राग अलापते हुए नरेंद्र मोदी को प्रदेश का हिमायती पेश किया है। भाजपा के पन्नों पर वन रैंक, वन पेंशन का जिक्र एक तरह से अल्लाहद्दीन के चिराग की तरह हो गया है, जबकि पार्टी के आशियाने में केंद्रीय योजनाओं का राशन पानी भरा है। भाजपा अपनी योजनाओं के दम पर हिमाचली दिल पर भले ही हद से ज्यादा कब्जा कर ले, लेकिन परियोजनाओं की शृंखला में दस्तावेज शिकायत करते हैं। हिमाचल के संदर्भों में केंद्र की हिस्सेदारी का उल्लेख शाह ने बखूबी किया और पहली बार राष्ट्रीय सम्मान की पैमाइश में भी भाग्य चमका। भाषण की लालिमा में अगर प्रोत्साहन के सारे वादे देखे जाएं, तो हिमाचल के कदम वर्षों तक केंद्र के कर्जदार रहेंगे, लेकिन इन्हीं पन्नों के सुराख बजट से शिकायत करते रहे। बेशक शाह के सम्मेलन में कई सियासी पन्ने जुड़े और विस्तृत आकार में जनता दिखाई दी, लेकिन वोटर सूची में क्रांति का उद्घोष अभी सुनना बाकी है। सीधे मतदाता तक अपनी खबर भाजपा सुना रही है, तो कांगे्रस की तरफ जनता के कान भी कुछ तो संज्ञान लेंगे, बशर्ते राजनीतिक महाकुंभ में राठौर भी अपना ठौर पक्का करें। ऊना तक पहुंचे भाजपा के पन्ना प्रमुख अपनी कतार में कितना जोश भर पाए, इससे भी आगे कांग्रेस की ऊर्जा परखी जाएगी। अभी कांगे्रस मैदान पर इतनी तादाद में एकत्रित तथा अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं कर पाई है। जोर आजमाइश की महारत में भाजपा के मंगल गीत अपने कुनबे को रोमांचित करने में कोर कसर नहीं छोड़ रहे, लेकिन दूसरे छोर पर विपक्ष के अलावा जो विरोध भरा है, उसे शांत करने की जिरह दिखाई नहीं दे रही। मतदाता सूचियों से निकले पन्ना प्रमुख कितने प्रभावशाली ढंग से भाजपा की प्रस्तुति देंगे या विरोध को बटोर कर कांगे्रस अपने पन्नों में कितने नए नाम लिख पाती है, इसके लिए वक्त के साथ विषयों की फेहरिस्त अभी बदलनी बाकी है।



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