कुष्ठरोग पीडितों के साथ भेदभाव वाले कानूनों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका

कुष्ठरोग पीडितों के साथ भेदभाव वाले कानूनों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका
कुष्ठरोग पीडितों के साथ भेदभाव वाले कानूनों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका

उच्चतम न्यायालय ने अनेक केन्द्रीय और राज्य सरकार के अनेक पुराने कानूनों में कुष्ठरोग पीडितों के साथ किए जाने वाले भेदभाव के खिलाफ दायर याचिका पर आज सरकार से इस मुद्दे पर जवाब मांगा।

यह जनहित याचिका विधि सेन्टर फॉर लीगल पालिसी ने दायर की है। याचिका में केन्द्रीय और राज्यों के 119 कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुये अपनी इस दलील को न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया गया है कि कुष्ठरोग से प्रभावित व्यक्तियों के साथ इस तरह का भेदभाव किया जाता है जो उन्हें कलंकित करता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि इस तरह के कानून उन्हे लोक सेवाओं से वंचित करते हैं, पर्सनल कानूनों के अंतर्गत उन पर अयोग्यता थोपते हैं और सार्वजनिक पदों पर आसीन होने या उनके लिये खडे होने से प्रतिबंधित करते हैं।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड की तीन सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष यह याचिका आज जब सुनवाई के लिये आयी तो पीठ ने इस पर केन्द्र को नोटिस जारी किया। केन्द्र को आठ सप्ताह के भीतर नोटिस का जवाब देना है।

याचिका में अपने दावे के समर्थन में हिन्दू विवाह कानून, 1955 की धारा 13 को उद्धृत किया गया है जो कुष्ठरोग के किसी भी असाध्य स्वरूप के आधार पर पीडित पति या पत्नी को विवाह विच्छेद की अनुमति देती है।

याचिका में कहा गया है कि इसी तरह, मुस्लिम विवाह विच्छेद कानून 1939 की धारा दो, विशेष विवाह कानून, 1954 की धारा 27 भी कुष्ठ रोग से पीडित व्यक्ति के साथ भेदभाद करती है।

याचिका के अनुसार उडीसा नगर निगम कानून 2003 की धारा 70 (3)(बी) कुष्ठ रोग से पीडित व्यक्ति को इसी आधार पर निगम पार्षद का चुनाव लडने के अयोग्य बनाती है। राजस्थान पंचायती राज कानून, 1994 भी कुष्ठ रोग से पीडित व्यक्ति को पंचायती राज संस्था के पंच या किसी सदस्य के पद पर चुनाव लडने के अयोग्य बनाता है।

इस संस्था की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन ने कहा कि केन्द्रीय और राज्यों के कानूनों के ये प्रावधान कुष्ठरोग से पीडित व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं और इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन होता है। उन्होंने कहा कि विधि आयोग ने भी अपने 256वें प्रतिवेदन में कुष्ठ रोग से पीडित व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव खत्म करने की सिफारिश की थी।

( Source – PTI )

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