संजीव कुमार सिन्‍हा

Author:   संजीव कुमार सिन्‍हा

2 जनवरी, 1978 को पुपरी, बिहार में जन्म। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक कला और गुरू जंभेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में स्नातकोत्तर की डिग्रियां हासिल कीं। दर्जन भर पुस्तकों का संपादन। राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर नियमित लेखन। पेंटिंग का शौक। छात्र आंदोलन में एक दशक तक सक्रिय। जनांदोलनों में बराबर भागीदारी। संप्रति: संपादक, प्रवक्‍ता डॉट कॉम

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मजबूत लोकतंत्र के लिए छात्र संघ जरूरी

मजबूत लोकतंत्र के लिए छात्र संघ जरूरी

-संजीव कुमार सिन्हा इन दिनों देश के कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव हो रहे हैं। लेकिन अभी भी अधिकांश विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनावों पर रोक लगी है। ‘शिक्षण संस्थानों में छात्र संघ के चुनाव होने चाहिए या नहीं’ यह बहस बहुत पुरानी है और आज भी इस पर जोरदार बहस चलती [...]

एलेक्‍सा एक लाख क्लब में ‘प्रवक्‍ता’ शामिल

एलेक्‍सा एक लाख क्लब में ‘प्रवक्‍ता’ शामिल

‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ के सुधी पाठकों और लेखकों के लिए एक शुभ समाचार है। ‘प्रवक्‍ता’ एलेक्‍सा सुपरहिट एक लाख क्‍लब में कल शामिल हो गया। इसकी वर्तमान एलेक्‍सा रैंकिंग  99,424 है। गौरतलब है कि हिंदी की कुछ ही वेबसाइट एलेक्‍सा एक लाख क्‍लब में शामिल है। ‘प्रवक्‍ता’ को एक महीने में लगभग 3 लाख 60 हजार [...]

परिचर्चा : आम आदमी आज दाल-रोटी तक के लिए मोहताज

परिचर्चा : आम आदमी आज दाल-रोटी तक के लिए मोहताज

जबसे केंद्र में कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार सत्तासीन हुई है महंगाई लगातार बेलगाम होती जा रही है। कीमत थमने का नाम ही नहीं ले रही है। जीवनावश्‍यक वस्‍तुओं की कीमतों ने सभी रिकार्ड तोड़ते हुए गरीबों की कमर भी तोड दी है। आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। उसके सामने दो वक्त की रोटी [...]

संघ का सच

संघ का सच

-संजीव कुमार सिन्‍हा हम देखते हैं कि 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जहां आंतरिक कलह और परिवारवाद के कारण दिन-प्रतिदिन सिकुड़ती जा रही है, वहीं 1925 में दुनिया को लाल झंडे तले लाने के सपने के साथ शुरू हुआ भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन आज दर्जनों गुटों में बंट कर अंतिम सांसें ले रहा है। इनके [...]

परिचर्चा : क्या जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए?

परिचर्चा : क्या जाति आधारित जनगणना होनी चाहिए?

देश में ‘2011 की जनगणना’ का कार्य चल रहा है। पिछले दिनों विपक्ष सहित सत्तारूढ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के कई घटक दलों ने जनगणना में जाति को आधार बनाने की मांग की। केंद्र सरकार ने दवाब में आकर उनकी मांग को स्वीकार कर लिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकसभा में घोषणा की कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल [...]

परिचर्चा: ‘नक्‍सलवाद’ के बारे में आपका क्‍या कहना है…

परिचर्चा: ‘नक्‍सलवाद’ के बारे में आपका क्‍या कहना है…

एक तरफ दिल्ली में 7 फरवरी, 2010 को आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कहते हैं, ‘नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है।’ वहीं दूसरी ओर, 4 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के नक्सलवाद प्रभावित इलाकों-लालगढ़ और मिदनापुर के दौरे पर गए हमारे गृहमंत्री पी. चिदंबरम माओवाद विरोधी अभियान [...]

परिचर्चा : राज ठाकरे की राजनीति के बारे में आप क्‍या कहते हैं?

परिचर्चा : राज ठाकरे की राजनीति के बारे में आप क्‍या कहते हैं?

स्वस्थ बहस ही लोकतंत्र का प्राण होती है। ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम‘ पर हुए विचार-विमर्शों में हमने हमेशा आम आदमी की आवाजों को प्रमुख स्‍थान दिया है। हमने कहा है, ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ का मतलब ‘आवाज आपकी’। ‘प्रवक्‍ता’ पर हम एक नया स्‍तंभ ‘परिचर्चा‘ प्रारंभ कर रहे हैं। यहां आप समसामयिक प्रश्‍नों पर अपने विचार व्यक्त [...]

परिचर्चा : मार्क्‍सवाद और धर्म

परिचर्चा : मार्क्‍सवाद और धर्म

इन दिनों ‘मार्क्‍सवाद और धर्म के बीच संबंध’ पर बहस जोरों पर है। पिछले दिनों केरल से माकपा के पूर्व सासद डा. केएस मनोज ने अपनी आस्था व उपासना के अधिकार की रक्षा का प्रश्‍न उठाते हुए पार्टी से त्यागपत्र दे दिया। डा. केएस मनोज को 2004 में माकपा ने तब लोकसभा का टिकट दिया [...]

भारतीय नवजागरण के अग्रदूत : स्वामी विवेकानंद

भारतीय नवजागरण के अग्रदूत : स्वामी विवेकानंद

भारतीय नवजागरण का अग्रदूत यदि स्वामी विवेकानेद को कहा जाय, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने सदियों की गुलामी में जकड़े भारतवासी को मुक्ति का रास्ता सुझाया। जन-जन के मन में भारतीय होने के गर्व का बोध कराया। उन्होंने मानव समाज को अन्याय, शोषण और कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़े होने का साहस प्रदान किया [...]

परिचर्चा : हिंद स्वराज की प्रासंगिकता

परिचर्चा : हिंद स्वराज की प्रासंगिकता

हिंद स्वराज’ महात्मा गांधी की चर्चित कृति है। इसे प्रकाशित हुए 100 साल हो गए। यह एक बीज पुस्तक है। यह भारतीय व्यवस्था का वैकल्पिक मॉडल है। गांधीजी ने इस पुस्‍तक में अहिंसा, नैतिकता, स्वदेशी, स्वावलंबन, समता, सभ्यातागत विमर्शों पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने मशीनी सभ्यता की आलोचना करते हुए पश्चिमी देशों के [...]

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