गजल

नेत्र जब नवजात का झाँका किया!

नेत्र जब नवजात का झाँका किया, शिशु जब था समय को समझा किया; पात्र की जब विविधता भाँपा किया, देश की जब भिन्नता आँका किया ! हर घड़ी जब प्रकृति कृति देखा किया, हर कड़ी की तरन्नुम ताका किया; आँख जब हर जीव की परखा किया, भाव की भव लहरियाँ तरजा किया ! रहा द्रष्टा पूर्व हर जग दरमियाँ, बाद में वह स्वयं को निरखा किया; देह मन अपना कभी वह तक लिया, विलग हो आभास मैं पन का किया ! महत से आकर अहं को छू लिया, चित्त को करवट बदलते लख लिया; पुरुष जो भीतर छिपा प्रकटा किया,…