गजल

वत्स ! क्या अब तुम वह नहीं!

वत्स ! क्या अब तुम वह नहीं, जो पहले थे? निर्गुण की पहेली, अहसास की अठखेली; गुणों का धीरे धीरे प्रविष्ट होना सुमिष्ट लगना, पल पल की चादर में निखर सज सँवर कर आना! महत- तत्व से जैसे प्रकट होता सगुण का आविर्भाव, हर सत्ता का रिश्ता रख आत्मीय अवलोकन; पूर्व जन्मों के भावों का प्रष्फुरीकरण, वाल हास में लसी मधुरिमा का आलिंगन! अब वह कहाँ गया, माँ को शिशु समझ निहारना, चाहना दुग्ध माँगना निकट रख नेह करना; हर किसी की गोद आ आनन्द लेना, नानी नाना को नयनों से आत्मीय दुलार देना! व्यस्त होगये हो अब अपने खेलों में, हाथी घोड़ों गाड़ियों के खिलौनों में; यू-ट्यूव पर चलचित्र देखने में, माँ को ‘ना’ करने औ दौड़ाने में! अहं का यह अवतरण, चित्त का विचरण, है तो आत्म विस्तार का व्याप्तिकरण; पर ‘मधु’ के प्रभु की उसमें छिपी चितवन, कहती है, वे वे ही हैं, जो अतीत से अपने थे!...

नेत्र जब नवजात का झाँका किया!

नेत्र जब नवजात का झाँका किया, शिशु जब था समय को समझा किया; पात्र की जब विविधता भाँपा किया, देश की जब भिन्नता आँका किया ! हर घड़ी जब प्रकृति कृति देखा किया, हर कड़ी की तरन्नुम ताका किया; आँख जब हर जीव की परखा किया, भाव की भव लहरियाँ तरजा किया ! रहा द्रष्टा पूर्व हर जग दरमियाँ, बाद में वह स्वयं को निरखा किया; देह मन अपना कभी वह तक लिया, विलग हो आभास मैं पन का किया ! महत से आकर अहं को छू लिया, चित्त को करवट बदलते लख लिया; पुरुष जो भीतर छिपा प्रकटा किया, परम- पित की पात्रता खोजा किया ! प्रश्न जब प्रति घड़ी जिज्ञासु किया, निगम आगम का समाँ बाँधा किया; ‘मधु’ उसमें प्रभु अपना पा लिया, प्राण के अपरूप का दर्शन किया ! ...

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