एक गजल -सिगरेट की बदनसीबी

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खुद को जलाकर,दूसरो की जिन्दगी जलाती हूँ मैं बुझ जाती है माचिस,जलकर राख हो जाती हूँ मैं पीकर फेक देते है रास्ते में,इस कदर सब मुझको चलते फिरते हर मुसाफिर की ठोकरे  खाती हूँ मैं करते है वातावरण को दूषित पीकर जो मुझे लेते है लुत्फ़ जिन्दगी का बदनाम होती हूँ मैं  लिखी है वैधानिक… Read more »

एक गजल सच्चाई पर

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कोई टोपी कोई पगड़ी कोई इज्जत अपनी बेच देता है मिले अच्छी रिश्वत,जज भी आज न्याय बेच देता है वैश्या फिर भी अच्छी है उसकी हद है अपने कोठे तक पुलिस वाला तो बीच चौराहे पर अपनी वर्दी बेच देता है जला दी जाती है,अक्सर बिटिया सुसराल में बेरहमी से जिस बेटी के खातिर बाप… Read more »

कश्मीर समस्या समाधान पर एक गजल

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370 धारा क्या मिली कश्मीर को हिंदुस्तान से वह अपने आप को अलग समझने लगा हिंदुस्तान से कश्मीर पर ज्यादा खर्च करना अब मुनासिब नहीं दोस्तों गीत गाता है पाकिस्तान का,खाता है वह हिंदुस्तान से कश्मीर एक ऐसी बेवफा औरत है अपने आप में नैन मैटटके करने लगी है वह अब पाकिस्तान से कश्मीर छिनाल… Read more »

कमी है परवरिश में इसलिए मनद्वार ऐसे हैं,

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कमी है परवरिश में इसलिए मनद्वार ऐसे हैं, नई कलियाँ मसलते हैं, कई किरदार ऐसे हैं। नहीं जलते वहाँ चूल्हे, यहाँ पकवान हैं ताजा, हमारी भी सियासत के नए हथियार ऐसे हैं। हकीकत जान पाए ना, वहम से ही शिला तोड़ी, यहाँ अच्छे भले से लोग कुछ बीमार ऐसे हैं। सिसक होगी ज़रा सी बस… Read more »

आज फिर बेटी लूटी है मौत ने उसको छुआ,

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कुलदीप विद्यार्थी 4.गज़ल आज फिर बेटी लूटी है मौत ने उसको छुआ, मुल्क मेरा हो चला जैसे कि, अपराधी कुँआ, जाति के झगड़े कहीं तो हैं कहीं दंगे यहाँ, मुस्कुराते देश को जैसे लगी हो बददुआ, दूर से सब देखने वालों सभी से प्रार्थना, मौत के नजदीक है यह मुल्क सब कीजे दुआ, दंश जिसको… Read more »

जब मैं तुम्हारे संग हूँ !

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जब मैं तुम्हारे संग हूँ, तब भी मैं कहाँ तुम्हारे साथ हूँ; तुम्हारी संस्थागत सत्ता में रहते हुए भी, मैं विश्व व्यापी व्यवस्था का परिद्रष्टा हूँ ! मेरे प्राण की फुहार केवल तुम तक नहीं रहती, वह हर पल शून्य के गह्वर में विचर कर आती है; तुम्हारे ढिंग सोया भी, मैं उसकी गोद में… Read more »

वत्स ! क्या अब तुम वह नहीं, जो पहले थे !

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वत्स ! क्या अब तुम वह नहीं, जो पहले थे? निर्गुण की पहेली, अहसास की अठखेली; गुणों का धीरे धीरे प्रविष्ट होना सुमिष्ट लगना, पल पल की चादर में निखर सज सँवर कर आना ! महत- तत्व से जैसे प्रकट होता सगुण का आविर्भाव, हर सत्ता का रिश्ता रख आत्मीय अवलोकन; पूर्व जन्मों के भावों… Read more »

अभिलाषा

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आओ धरती को सजाएं,  हम एक उपवन की तरह, इसके हर अंश को महकाएं हम मधुबन की तरह, आओ धरती को सजाएं……….. एक धरती है जो बिन मांगे,  अपना सब देती, हमने छलनी किया सीना,  चुप कर सब सहती, रात-दिन सजदा करो,  चरणों में भगवन की तरह, आओ धरती को सजाएं…….. अपनी एक सांस भी… Read more »

आग बुझती जा रही है बस धुंआ सा रह गया

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आग बुझती जा रही है बस धुंआ सा रह गया राजनीती देख लगता, ये तमाशा रह गया,   जात में बंटते दिखे, धर्मों के ठेकेदार सब आदमी उनकी जिरह में बस ठगा सा रह गया,   एक बदली ने गिराई चंद बूंदे आस की, उस भरोसे की वजह से खेत प्यासा रह गया,   हर… Read more »

मेरे लफ़्ज तुझसे यकीं माँगें

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शालिनी तिवारी झुरमुट में दिखती परछाइयाँ घुँघुरू की मद्दिम आवाज लम्बे अर्से का अन्तराल तुझसे मिलने का इन्तजार चाँद की रोशन रातों में पल हरपल थमता जाए ऐसा लगता है मानो तुम मुझसे आलिंगन कर लोगी पर कुछ छण में परछाइयाँ नयनों से ओझल हो जायें दिन की घड़ी घड़ी में बस बस तेरी ही… Read more »