व्यंग्य यत्र तत्र,सर्वत्र फूफा September 17, 2026 / September 17, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment फूफा Read more » fofa culture फूफा
व्यंग्य आखिर टेट परीक्षा का फाटक टूट गया September 1, 2026 / September 1, 2026 by प्रमोद दीक्षित मलय | Leave a Comment टेट परीक्षा Read more » टेट परीक्षा
व्यंग्य मेरे प्यारे जेन जी August 20, 2026 / August 20, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment मेरे प्यारे जेन जी Read more » मेरे प्यारे जेन जी
व्यंग्य विरोध जिंदाबाद ! July 29, 2026 / July 29, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment विरोध जिंदाबाद Read more » विरोध जिंदाबाद
व्यंग्य सन्डे हो या मंडे, रोज मारो अंडे ! July 15, 2026 / July 15, 2026 by प्रवक्ता ब्यूरो | Leave a Comment शकूर भाई ही नहीं उनके पूरे परिवार के चेहरे पर आजकल बड़ी रौनक है | कलकत्ता में इतने साल से हैं पर पूरे परिवार के चेहरे पर ऎसी चमक कभी नहीं दिखी थी | Read more » सन्डे हो या मंडे रोज मारो अंडे
व्यंग्य धर्म–समाज के ठेकेदारों, आपको शत-शत नमन! July 13, 2026 / July 13, 2026 by सुरेश गोयल धूप वाला | Leave a Comment इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनके कानों में भगवान ने शायद "आलोचना-रोधी फिल्टर" लगाकर भेजा होता है। सामने कोई कहे—"प्रधान जी, आपके जैसा ईमानदार कोई नहीं Read more » धर्म–समाज के ठेकेदार
व्यंग्य डिक्शनरी से ‘विपक्ष’ का विलोपन July 11, 2026 / July 11, 2026 by विवेक रंजन श्रीवास्तव | Leave a Comment 'विपक्ष' का विलोपन Read more » 'विपक्ष' का विलोपन
व्यंग्य हाँ, मैं छोटे दुकानदार के रूप में कॉकरोच हूँ May 29, 2026 / May 29, 2026 by डॉ. शैलेश शुक्ला | Leave a Comment री दुकान कोई व्यापारिक साम्राज्य नहीं, रोजमर्रा की साँस लेने की मशीन है। यहाँ साबुन भी बिकता है, बिस्कुट भी, बच्चों की टॉफी भी और मेरी नींद भी। ग्राहक आते हैं, सामान लेते हैं, मुस्कुराते हैं, चले जाते हैं। लेकिन उनके जाने के बाद जो बचता है, वह है बिजली का बिल, जीएसटी का डर, बाजार का दबाव और ऑनलाइन बिक्री का भूत Read more » छोटे दुकानदार के रूप में कॉकरोच
व्यंग्य हाँ, मैं सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच हूँ May 22, 2026 / May 22, 2026 by डॉ. शैलेश शुक्ला | Leave a Comment कॉकरोच अँधेरे में पनपता है। सरकारी बाबू अस्पष्टता में। जितना कम स्पष्ट नियम होगा, उतनी अधिक हमारी शक्ति होगी। यदि नियम सरल हो जाएँ तो जनता सीधे काम करवा लेगी। फिर हमारा महत्व कहाँ रहेगा? इसलिए व्यवस्था को इतना जटिल बना दो कि आदमी जन्म प्रमाणपत्र बनवाते-बनवाते दर्शनशास्त्री हो जाए। Read more » सरकारी बाबू के रूप में कॉकरोच
व्यंग्य “हम ही हैं राष्ट्र, हमसे ही है राष्ट्र” May 14, 2026 / May 14, 2026 by डॉ. शैलेश शुक्ला | Leave a Comment प्रशिक्षण के समय हमें सिखाया गया कि “आप राष्ट्र की रीढ़ हैं।” मैंने इस वाक्य को बहुत गंभीरता से लिया। फिर मैंने सोचा कि जब पूरी व्यवस्था मेरी पीठ पर टिकी है, तो थोड़ा भार व्यवस्था को भी उठाना चाहिए—जैसे मेरा घर, मेरी गाड़ी, मेरे फार्महाउस और मेरे निवेश। Read more » “हम ही हैं राष्ट्र हमसे ही है राष्ट्र
व्यंग्य जरूरी है उद्घाटन April 8, 2026 / April 8, 2026 by डा. विनोद बब्बर | Leave a Comment जरूरी है उद्घाटन Read more » जरूरी है उद्घाटन
व्यंग्य अप्रैल फ़ूल बनाया, बड़ा मज़ा आया ! March 30, 2026 / March 30, 2026 by डॉ घनश्याम बादल | Leave a Comment इतिहास के पन्नों में झांकें तो इस दिन की उत्पत्ति कई तरीके से पता चलती है। 16वीं शताब्दी के फ्रांस में जब कैलेंडर बदला और नववर्ष एक जनवरी को मनाया जाने लगा, लेकिन कुछ लोग एक अप्रैल को ही नया साल मानते रहे। उन्हें मज़ाक का पात्र बनाया गया और यहीं से “एप्रिल फूल” की परंपरा शुरू हुई। Read more » had a lot of fun! Made an April Fool अप्रैल फ़ूल