भगवान सरकारी बंगला किसी से न खाली करवाए… .!!

Posted On by & filed under व्यंग्य

तारकेश कुमार ओझा मैं जिस शहर में रहता हूं इसकी एक बड़ी खासियत यह है कि यहां बंगलों का ही अलग मोहल्ला है। शहर के लोग  इसे बंगला साइड कहते हैं। इस मोहल्ला या कॉलोनी को अंग्रेजों ने बसाया था। इसमें रहते भी तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी ही थे। कहते हैं कि ब्रिटिश युग में किसी… Read more »

      इच्छा मृत्यु की ओर बढ़ती कांग्रेस

Posted On by & filed under व्यंग्य

 विजय कुमार, कल शर्मा जी के घर गया, तो वे ‘इच्छा मृत्यु’ के बारे में एक लेख पढ़ रहे थे। पढ़ने के बाद उन्होंने वह अखबार मुझे पकड़ा दिया। उस लेख का सार इस प्रकार है।जीवन और मृत्यु के बारे में संतों, मनीषियों और विद्वानों ने बहुत कुछ कहा है। जीवन की तरह मृत्यु भी… Read more »

      हमें भी खिलाओ नहीं तो…

Posted On by & filed under व्यंग्य

  विजय कुमार आजकल दूरदर्शन ने क्रिकेट और फुटबॉल को हर घर में पहुंचा दिया है; पर हमारे बचपन में ऐसा नहीं था। तब गुल्ली-डंडा, पिट्ठू फोड़, कंचे और छुपम छुपाई जैसे खेल अधिक खेले जाते थे। खेल में झगड़ा भी होता ही है। भले ही वह थोड़ी देर के लिए हो। हमारे मित्र शर्मा जी… Read more »

लूट सके तो लूट

Posted On by & filed under व्यंग्य

  बचपन में हम लोग प्रायः अंत्याक्षरी खेला करते थे। इसकी शुरुआत कुछ ऐसे होती थी –   समय बिताने के लिए करना है कुछ काम शुरू करो अंत्याक्षरी लेकर हरि का नाम।   अंत्याक्षरी से कई लाभ थे। जहां एक ओर गर्मी में भीषण लू से बचत होती थी, वहां मनोरंजन और दिमागी कसरत… Read more »

जूते के प्रयोग की संभावनाएं

Posted On by & filed under व्यंग्य

यों तो जूता ऐसी चीज है, जिसके बिना काम नहीं चलता। चप्पल, सैंडल, खड़ाऊं आदि इसके ही बिरादर भाई और बहिन हैं। जूते के कई उपयोग हैं। घर के अंदर एक, बाहर दूसरा तो नहाने-धोने के लिए तीसरा। आजकल तो सब गडमगड हो गया है; पर 25-30 साल पहले तक क्या मजाल कोई बिना जूते-चप्पल… Read more »

 महाभियोग का फोग !

Posted On by & filed under व्यंग्य

देवेंन्द्रराज सुधार  लोकतंत्र में विपक्ष गलत कामों को रोकता है। वह सत्ता पक्ष की तानाशाही पर नकेल कसता है। शक्तियों के अविवेकपूर्ण उपयोग पर नजर गड़ाए रखता है। एक मजबूत विपक्ष नियमों और सिद्धांतों की बुनियाद पर सत्ता पक्ष के लोगों की नाक में दम करके रखता है। लेकिन यह घोर विडंबना है कि नाक… Read more »

जिया जले, जाँ जले !

Posted On by & filed under व्यंग्य

देवेंद्रराज सुथार अब तो न दिन को चैन आता है और न ही रात को नींद आती है। इस आलम में कुछ नहीं भाता है और न ही कोई ख्याल आता है। जिया जलता है। जाँ जलती है। नैनों तले धुआँ चलता है। रुक जाइए ! यदि आप मुझे प्रेमी समझने की भूल कर रहे… Read more »

मार्किट ददाति मोटिवेशन

Posted On by & filed under व्यंग्य

अमित शर्मा (CA) इस मीन (स्वार्थी) दुनिया में विटामिन की बहुत कमी पाई जाती है जिसके कारण बहुत सी बीमारियां बिना किसी क्लिक और एंटर के स्वतः ही डाऊनलोड हो जाती है।  विटामिन सी औऱ विटामिन डी के अलावा विटामिन एम अर्थात मोटिवेशन की कमी भी पिछले काफ़ी समय से सामाजिकता के रैंप पर कैटवॉक… Read more »

बेइज़्ज़ती सर्वत्र अर्जयेत

Posted On by & filed under व्यंग्य

अमित शर्मा (CA) पहले मैं इस भ्रम में जीता था कि हर इंसान अपना जीवन सम्मानित तरीके से व्यतीत करना चाहता हैं लेकिन कालांतर में मेरी इस सोच में अंतर तब आया जब मुझे स्वनेत्रो से बेइज़्ज़ती के साथ जीने-मरने की कसमें खाने वाली विभूतियों का दर्शन लाभ मिला। भारत की खोज, बड़े ही मौज… Read more »

माफी के मजे… !!

Posted On by & filed under व्यंग्य

तारकेश कुमार ओझा क्या पता महाभारत काल में धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन को अंधे का पुत्र अंधा… जैसा संबोधन कहने के बाद उत्पन्न कटुता को दूर करने के लिए द्रौपदी के पास सॉरी कहने का कोई विकल्प था या नहीं  या भीषण युद्ध छिड़ने के बाद रावण के पास आइ एम… एक्सट्रीमली सॉरी…. कहने का कोई… Read more »