राजनीति का कोढ़ : वंशवाद

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कल शर्मा जी मेरे घर आये, तो हाथ में मिठाई का डिब्बा था। उसका लेबल बता रहा था कि ये ‘नेहरू चौक’ वाले खानदानी ‘जवाहर हलवाई’ की दुकान से ली गयी है। डिब्बे में बस एक ही बरफी बची थी। उन्होंने वह मुझे देकर डिब्बा मेज पर रख दिया। – लो वर्मा, मुंह मीठा करो।… Read more »

   परबुद्ध सम्मेलन 

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मैं दोपहर बाद की चाय जरा फुरसत से पीता हूं। कल जब मैंने यह नेक काम शुरू किया ही था कि शर्मा जी का फोन आ गया। – वर्मा, पांच बजे जरा ठीक-ठाक कपड़े पहन कर तैयार रहना। दाढ़ी भी बना लेना। एक खास जगह चलना है। वहां से रात को खाना खाकर ही लौटेंगे।… Read more »

शपथ ग्रहण समारोह 

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इस शीर्षक से आप भ्रमित न हों। मेरा मतलब पिछले दिनों दिल्ली में हुए शपथ ग्रहण से नहीं है। उसमें कुछ मंत्रियों की कुर्सी ऊंची हुई, तो कुछ की नीची। कुछ की बदली, तो कुछ किस्मत के मारे उससे बेदखल ही कर दिये गये। एक पुरानी और प्रखर वक्ता ने जब अपने शरीर का भार… Read more »

क्यों पनपते हैं बाबाओं के डेरे ?

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कार्ल मार्क्स ने कहा था- धर्म अफीम के समान है . पर कोई व्यक्ति क्यों अफीम का प्रयोग करता है , कब शुरू करता है इसका सेवन और कब तक रहता है इसके नशे का आदि ? यदि यही प्रश्न हम धर्म , सम्प्रदाय , पंथ या डेरे से जोड़कर देखें , सोचें ; तो कहीं ना… Read more »

दो रोगों की एक दवाई

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बचपन में स्कूल में हमें गुरुजी ने एक सूत्र रटाया था, ‘‘सौ रोगों की एक दवाई, सफाई सफाई सफाई।’’ कुछ बड़े हुए, तो संसार और कारोबार में फंस गये। इससे परिवार और बैंक बैलेंस के साथ ही थोंद और तनाव भी बढ़ने लगा। फिर शुगर, रक्तचाप और नींद पर असर पड़ा। डॉक्टर के पास गये,… Read more »

चुनाव की तैयारी

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चुनाव लड़ना या लड़ाना कोई बुरी बात नहीं है। राजनीतिक दल यदि चुनाव न लड़ें, तो उनका दाना-पानी ही बंद हो जाए। चुनाव से चंदा मिलता है। अखबारों में फोटो छपता है। हींग लगे न फिटकरी, और रंग चोखा। बिना किसी खर्च के ऐसी प्रसिद्धि किसे बुरी लगती है ? इसलिए हारें या जीतें, पर… Read more »

हम सीख  रहे हैं…..

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कहते हैं सीखने की कोई उम्र नहीं होती।अब  70 हमारे पास मंडरा रहा है और हम सीखे जा रहे है, शायद कब्र तक पंहुचते पंहुचते भी सीखते रहे, सीखने से छुट्टी नहीं मिलने वाली,  सीखे जाओ किये जाओ यही हमारी नियति है। पचास साल हो गये पढ़ाई पूरी किये पर सीखना बन्द नहीं हुआ। हिन्दी… Read more »

 नमक का ढेला और गुड़ की लेप

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जग मोहन ठाकन लगातार छह माह से  इन्तजार करके आँखें थक चुकी थी कि शायद आज ही कोई लाइक आया जाए , कोई कमेंट आ जाए और तो और कोई पोक ही जाए तो भी सब्र कर लूँ  . पर सब के सब कंजूस हैं . सैंकड़ों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी , ज्यादातर ने तो… Read more »

  सस्ता घुटना बदल   

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भारत सरकार ने दिल के बाद अब घुटनों की सर्जरी भी सस्ती कर दी है। इससे उन लाखों बुजुर्गों को लाभ होगा, जो कई साल से घुटना बदलवाना चाहते थे; पर शर्मा जी को लग रहा है कि इसके पीछे सरकार का कोई छिपा एजेंडा जरूर है। कल जब मैं उनके साथ चाय पी रहा… Read more »

वो दाल-दाल, ये साग-साग   

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मैं साहित्यप्रेमी तो हूं, पर साहित्यकार नहीं। इसलिए किसी कहावत में संशोधन या तोड़फोड़ करने का मुझे कोई हक नहीं है; पर हमारे प्रिय शर्मा जी परसों अखबार में छपी एक पुरानी कहावत ‘तुम डाल-डाल, हम पात-पात’के नये संस्करण ‘वो दाल-दाल, ये साग-साग’के बारे में मुझसे चर्चा करने लगे। – वर्मा, ये दाल और साग… Read more »