राष्ट्रीय विद्रोही दल

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– विजय कुमार,  शर्मा जी की बेचैनी इन दिनों चरम पर है। 2019 सिर पर है और चुनाव लड़ने के लिए अब तक राष्ट्रीय तो दूर, किसी राज्य या जिले स्तर की पार्टी ने उनसे संपर्क नहीं किया। उन जैसे समाजसेवी यदि संसद में नहीं जाएंगे, तो क्या होगा देश का ?शर्मा जी ने कई… Read more »

जेब कतरा -एक व्यंग –आर के रस्तोगी

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एक जेब कतरा जेब काटते पकड़ा गया कुछ पुलिस वालो के वह हत्थे चढ़ गया पुलिस वाले बोले,तू जेब काटता है क्यू जेब कतरा बोला,तुम रिश्वत मांगते हो क्यू पुलिस वाले बोले,हमारे थाने बिकते है सरे आम सारे देश मे नीलाम होते है हमे भी उपर वालो को देना पड़ता है बिना दिए अच्छा थाना… Read more »

     संयुक्त प्रधानमंत्री योजना

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  – विजय कुमार इन दिनों भारत में चातुर्मास चल रहे हैं। देवी-देवता निद्रा में हैं। चातुर्मास में साधु-संत भी अपना प्रवास स्थगित कर एक ही जगह रहते हैं। इस दौरान वे अपना अधिकांश समय अध्ययन, चिंतन, पूजा और प्रवचन में बिताते हैं। पर चातुर्मास में असुर क्या करते हैं, इस पर शास्त्र मौन हैं। शर्मा… Read more »

          राजनीतिक आंसुओं का रासायनिक विश्लेषण 

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  – विजय कुमार, आंसू का साहित्य में बड़ा महत्व है। भाषा कोई भी हो, पर आंसू की खुराक के बिना उसकी गाड़ी आगे नहीं बढ़ती। न जाने कितनी कविता, शेर, गजल, कहानी और उपन्यासों के केन्द्र में आंसू ही हैं। सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में – वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा… Read more »

दूसरों की कमाई , हमें क्यों बताते हो भाई ….!!

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तारकेश कुमार ओझा उस विवादास्पद अभिनेता पर बनी फिल्म की चर्चा चैनलों पर शुरू होते ही मुझे अंदाजा हो गया कि अगले दो एक – महीने हमें किसी न किसी बहाने से इस फिल्म और इससे जुड़े लोगों की घुट्टी लगातार पिलाई जाती रहेगी। हुआ भी काफी कुछ वैसा ही। कभी खांसी के सिरप तो… Read more »

भगवान सरकारी बंगला किसी से न खाली करवाए… .!!

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तारकेश कुमार ओझा मैं जिस शहर में रहता हूं इसकी एक बड़ी खासियत यह है कि यहां बंगलों का ही अलग मोहल्ला है। शहर के लोग  इसे बंगला साइड कहते हैं। इस मोहल्ला या कॉलोनी को अंग्रेजों ने बसाया था। इसमें रहते भी तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी ही थे। कहते हैं कि ब्रिटिश युग में किसी… Read more »

      इच्छा मृत्यु की ओर बढ़ती कांग्रेस

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 विजय कुमार, कल शर्मा जी के घर गया, तो वे ‘इच्छा मृत्यु’ के बारे में एक लेख पढ़ रहे थे। पढ़ने के बाद उन्होंने वह अखबार मुझे पकड़ा दिया। उस लेख का सार इस प्रकार है।जीवन और मृत्यु के बारे में संतों, मनीषियों और विद्वानों ने बहुत कुछ कहा है। जीवन की तरह मृत्यु भी… Read more »

      हमें भी खिलाओ नहीं तो…

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  विजय कुमार आजकल दूरदर्शन ने क्रिकेट और फुटबॉल को हर घर में पहुंचा दिया है; पर हमारे बचपन में ऐसा नहीं था। तब गुल्ली-डंडा, पिट्ठू फोड़, कंचे और छुपम छुपाई जैसे खेल अधिक खेले जाते थे। खेल में झगड़ा भी होता ही है। भले ही वह थोड़ी देर के लिए हो। हमारे मित्र शर्मा जी… Read more »

लूट सके तो लूट

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  बचपन में हम लोग प्रायः अंत्याक्षरी खेला करते थे। इसकी शुरुआत कुछ ऐसे होती थी –   समय बिताने के लिए करना है कुछ काम शुरू करो अंत्याक्षरी लेकर हरि का नाम।   अंत्याक्षरी से कई लाभ थे। जहां एक ओर गर्मी में भीषण लू से बचत होती थी, वहां मनोरंजन और दिमागी कसरत… Read more »

जूते के प्रयोग की संभावनाएं

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यों तो जूता ऐसी चीज है, जिसके बिना काम नहीं चलता। चप्पल, सैंडल, खड़ाऊं आदि इसके ही बिरादर भाई और बहिन हैं। जूते के कई उपयोग हैं। घर के अंदर एक, बाहर दूसरा तो नहाने-धोने के लिए तीसरा। आजकल तो सब गडमगड हो गया है; पर 25-30 साल पहले तक क्या मजाल कोई बिना जूते-चप्पल… Read more »