भारत में न्यायिक प्रणाली, समस्याएं और सुधार 

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एडवोकेट डा. राधेश्याम द्विवेदी लोकतांत्रिक भारत सरकार की तीन स्वतंत्र शाखाएं हैं – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका। भारतीय न्यायिक प्रणाली अंग्रेजों ने औपनिवेशिक शासन के दौरान बनाई थी। इसको आम कानून व्यवस्था के रुप में जाना जाता है जिसमें न्यायाधीश अपने फैसलों, आदेशों और निर्णयों से कानून का विकास करते हैं। देश में कई स्तर… Read more »

देश में न्याय की उम्मीद जगाते हाल के फैसले

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अभी हाल ही में भारत में कोर्ट द्वारा जिस प्रकार से फैसले दिए जा रहे हैं वो देश में निश्चित ही एक सकारात्मक बदलाव का संकेत दे रहे हैं। 24 साल पुराने मुम्बई बम धमाकों के लिए अबु सलेम को आजीवन कारावास का फैसला हो या 16 महीने के भीतर ही बिहार के हाई प्रोफाइल… Read more »

विधि या कानून का लचीलापन

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डा. राधेश्याम द्विवेदी विधि या कानून किसी भी नियम संहिता को कह सकते हैं। विधि प्रायः भलीभांति लिखी हुई संसूचकों (इन्स्ट्रक्शन्स) के रूप में होती है। समाज को सम्यक ढंग से चलाने के लिये विधि अत्यन्त आवश्यक है।विधि मनुष्य का आचरण के वे सामान्य नियम होते है जो राज्य द्वारा स्वीकृत तथा लागू किये जाते… Read more »

दायित्व से भटके सांसद

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प्रमोद भार्गव देश के जिन सांसदों पर कानून बनाने से लेकर देश और युवाओं  को नई दिशा देने की जिम्मेबारी है, वही दायित्व से भटके नजर आ रहे हैं। हाल ही में भारतीय जनता पार्टी की संसदीय दल की बैठक में सदन में कई सांसद अनुपस्थित रहा। लोकतंत्र के लिए यह अच्छी बात नहीं है।… Read more »

राष्ट्रगीत के सम्मान में न्यायालय का निर्णय

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– लोकेन्द्र सिंह भारतीय संविधान में ‘वंदेमातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के समकक्ष राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने ‘वन्देमातरम्’ गीत को देश का राष्ट्रगीत घोषित करने का निर्णय लिया था। यह अलग बात है कि यह निर्णय आसानी से नहीं हुआ था। संविधान सभा में जब बहुमत की इच्छा की अनदेखी कर वंदेमातरम् को राष्ट्रगान के दर्जे से दरकिनार… Read more »

भारतीय पुलिस संस्कृति में भ्रष्टाचार की जड़ें

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भारतीय पुलिस में भ्रष्टाचार सर्वविदित और सुज्ञात  है| जो इस विभाग में ईमानदार दिखाई देते हैं वे भी लगभग ईमानदारी का नाटक ही कर रहे हैं और वे महाभ्रष्ट नहीं होने से ईमानदार दिखाई देते हैं|  भ्रष्ट  भी दो तरह के होते हैं – एक वे जो माँगते नहीं अपितु दान दक्षिणा स्वीकार करते है… Read more »

चुनाव आयोग की हकलाहट

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अपना चुनाव आयोग बड़ी दुविधा में फंस गया है। वह सर्वोच्च न्यायालय को यह नहीं बता पा रहा है कि जिन नेताओं को आपराधिक मामलों में दो साल से ज्यादा की सजा हो जाती है, उन्हें सिर्फ छह साल तक चुनाव नहीं लड़ने दिया जाए या पूरे जीवन भर का प्रतिबंध उन पर लगा दिया… Read more »

क्या आज भी उतना ही प्रासंगिक है संविधान ?

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समूचा देश पिछले एक वर्ष से 25 नवंबर के दिन अपना संविधान दिवस मनाता है । इसकी शुरूआत 2015 से हुई क्योंकि ये वर्ष संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर के जन्म के 125वें साल के रूप में मनाया गया था। आज संविधान को अंगीकृत किये हुए देश को 66 वर्ष का समय हो गया है… Read more »

कब मिलेगा न्याय

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संविधान की व्याख्या के अनुसार भारत सरकार के तीन प्रमुख अंगों मंे व्यवस्थापिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के अधीन विभिन्न मंत्रालय और विभाग कार्यरत हैं । चूॅंकि नैसर्गिक न्याय से बढकर कुछ नहीं, अतः न्यायपालिका की कार्यकारी और महती भूमिका का जनतंत्र पर प्रभावी होना बहुत जरूरी है । संविधान के अनुसार भले ही दस गुनाहगार… Read more »

पूर्वाग्रही राजनीति की भेंट चढ़ता संविधान का अनुच्‍छेद 48

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जानवर कई बार बिकते हैं। कई हाथों से गुजरते हैं। हर खरीदार उनसे बदसलूकी करता है। जानवरों को ठीक से खाना-पानी नहीं मिलता क्योंकि हर खरीदार को पता होता है कि इसे आखिर में कत्ल ही होना है। कई बार तो जानवरों को फिटकरी वाला पानी दिया जाता है, जिससे उनके गुर्दे फेल हो जाएं। इससे उनके शरीर में पानी जमा हो जाता है। इससे जानवर हट्टे-कट्टे दिखते हैं। इससे उनकी अच्छी कीमत मिलती है। उन्हें पैदल ही एक बाजार से दूसरे बाजार ले जाया जाता है।