चलो, दिवाली आज मनाएं 

Posted On by & filed under कविता, साहित्‍य

हर  आँगन में उजियारा हो तिमिर मिटे संसार का। चलो, दिवाली आज मनाएं दीया जलाकर प्यार का।   सपने हो मन में  अनंत के हो अनंत की अभिलाषा। मन अनंत का ही भूखा हो मन अनंत का हो प्यासा। कोई भी उपयोग नहीं सूने वीणा के तार का । चलो, दिवाली आज मनाएं दीया जलाकर प्यार का।   इन दीयों से  दूर न… Read more »

‘वेबलेंथ’ का खेल

Posted On by & filed under कविता

भावों के विशाल पर्वत पर, उगती खिलती आकाश बेल चढ़ती- कुछ हकीकतें और कुछ आस्‍था, का मेल होती है मित्रता। तय परिधियों के अरण्‍य में ब्रह्म कमल सी एक बार खिलती मन-सुगंध को अपनी नाभि में समेटने का खेल होती है मित्रता। स्‍त्री- पुरुष, पुरुष -स्‍त्री, स्‍त्री-स्‍त्री, पुरुष- पुरुष, के सारे विभेद नापती, अविश्‍वास से… Read more »

जब नींद नहीं आँखों में

Posted On by & filed under कविता, साहित्‍य

बेवजह रात को जब भी मुझे नींद नहीं आती है करवटें बदल बदल कर रात गुज़र जाती है। चादर की हर सिलवट तब, कोई कहानी अपनी, यों ही कह जाती है। जब घर में आँगन होता था और नींद नहीं आती थी चँदा से बाते होती थीं, तारों को गिनने में वो रात गुज़र जाती थी। हल्की सी बयार का झोंका जब तन को छूकर जाता था, उसकी हल्की सी थपकी, नींद बुला लाती थी। अब बंद कमरों मे जब नींद नहीं आँखों में यादों के झरोखे से अब रात के तीसरे पहर में नींद के बादल आते हैं जो मुझे सुला जाते हैं।

यान ही यान हैं यहाँ रमते !

Posted On by & filed under कविता, साहित्‍य

यान ही यान हैं यहाँ रमते ! शिकागो के गगन से   यान ही यान हैं यहाँ रमते, तरा ऊपर तलों में वे उड़ते; धरणि नीचे वे देख हैं लेते, साये आकाश के वे छू लेते !   कोई आते कोई चले जाते, पट्टियों पर कोई उतर चलते; कोई उन पट्टियों से उड़ जाते, उड़ते… Read more »

कभी कुछ भी नज़र नहीं आए !

Posted On by & filed under कविता, साहित्‍य

कभी कुछ भी नज़र नहीं आए ! शिकागो के गगन से   कभी कुछ भी नज़र नहीं आए, धुँधलका आसमान में छा जाए; श्वेत बादल बिछे से नभ पाएँ, व्योम में धूप सी नज़र आए !   ज्योति सम-रस सी रमी मन भाये, मेघ लीला किए यों भरमाएँ; धरा से देख यह कहाँ पायें, रुचिर… Read more »

ज्वालामुखी

Posted On by & filed under कविता, साहित्‍य

हर आदमी आज यहाँ, ज्वालामुखी बन चुका है। क्रोध कुंठा ईर्ष्या की आग भीतर ही भीतर सुलग रही है। कोई फटने को तैयार बैठा हैं, कोई आग को दबाये बैठा है, किसी के मन की भीतरी परत में, चिंगारियां लग चुकी हैं। कोई ज्वालामुखी सुप्त है, कोई कब फट पड़े कोई नहीं जानता। समाज की विद्रूपताओं का सामना करने वाले या उनको बदलने वाले अब नहीं रहे क्योंकि सब जल रहे हैं भीतर से और बाहर से. क्योंकि वो ज्वालामुखी बन चुके हैं। ज्वालामुखी का पूरा समूह फटता है , तो कई निर्दोष मरते है, जब बम फटते है, नाइन इलैवन या ट्वैनटी सिक्स इलैवन होता है। किसी बड़े ज्वालामुखी के फटने से प्रद्युम्न मरते है या निर्भया, गुड़िया,या किसी मीना की इज्जत पर डाके पड़ते है, फिर हाल बेहाल, वो कही सड़क पर कहीं फेंक चलते है। कभी कार मे छोटी सी खरोंच आनेपर चाकू छुरी या देसी कट्टे चलतेहैं क्योंकि वो आदमी नहीं है ज्वालामुखी बन चुके हैं क्रोध कहीं से लिया और कहीं दाग़ दिया क्रोध कुँठा से ही ज्वालामुख बनते हैं औरों के साथ ख़ुद के लियें भी ,ख़तरा बनते हैं। कुछ ज्वालामुखी भीतर ही भीतर धदकते है ये भड़कर फटते भी नहीं हैं, अपनी ही जान लेते हैं। कोई गरीबी में जलता है, कोई प्रेम त्रिकोण में फंसता है कोई परीक्षा में असफल है, कोई उपेक्षित महसूस करता है या फिर अवसाद रोग से जलता रहा है कुछ कह नहीं रहा…,.,……. किसी की प्रेमिका ने किसी और के संग करली है सगाई……….. ये सब ज्वालामुखी धधक रहे हैं शायद ही किसी की आग कोई बुझा सके तो अच्छा हो, वरना ये ज्वालामुखी, अन्दर ही फटते है कोई पंखे पे लटक गया कोई नवीं, मंजिल से कूदा है इन ज्वालामुखियों के फटने से रोज खून इतना बहता है कि अखबार के चार पन्ने लाल होते हैं यहाँ हर आदमी ज्वालामुखी बन चुका है अब, हम जी तो रह है, पर डर के साये में, कौन कब फटे बस यही किसी को नहीं पता!

तुम्हारी हर ख्वाहिशें

Posted On by & filed under कविता, साहित्‍य

  अर्पण जैन ‘अविचल’ हर ख्वाब तेरे सिरहाने रख दुँ, जैसे चांद के पास सारी चांदनी   बिखरते हुए अशकार समेट लूं, जैसे शायरी से मिलकर बनती है गजल   कुछ खिलौनों-सी जिद है जिन्दगी, जैसे बचपन की गुड़िया की रसोई   फर्श पर फिसलते मेरे इश्तेहार जैसे स्याही के बिखरने से बिगड़ता कागज  … Read more »

भारत के  वे “लाल” यशस्वी,सचमुच बड़े “बहादुर” थे ।

Posted On by & filed under कविता, साहित्‍य

भारत के यशस्वी पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री जी को * सादर समर्पित श्रद्धा-सुमन ********* भारत के  वे “लाल” यशस्वी,सचमुच बड़े “बहादुर” थे । क़द  छोटा, इंसान बड़े  थे ,  देश-प्रेम  हित आतुर थे ।। पले अभावों में थे लेकिन,मन से बड़े उदारमना । कर्त्तव्यों में निष्ठा थी,निज कष्टों को नहीं गिना ।। काशी विद्यापीठ… Read more »

कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ !

Posted On by & filed under कविता, साहित्‍य

कुचल दो कुयाशा की शाखाएँ, कुहक ले चल पड़ो कृष्ण चाहे; कृपा पा जाओगे राह आए, कुटिल भागेंगे भक्ति रस पाए !   भयंकर रूप जो रहे छाए, भाग वे जाएँगे वक़्त आए; छटेंगे बादलों की भाँति गगन, आँधियाँ ज्यों ही विश्व प्रभु लाएँ !   देखलो क्या रहा था उनके मन, जान लो कहाँ… Read more »

हरसिंगार

Posted On by & filed under कविता

हरसिंगार की  ख़ुशबू कितनी ही निराली हो चाहें रात खिले और सुबह झड़ गये बस इतनी ज़िन्दगानी है। जीवन छोटा सा हो या हो लम्बा, ये बात ज़रा बेमानी है, ख़ुशबू बिखेर कर चले गये या घुट घुट के जीलें चाहें जितना। जो देकर ही कुछ चले गये उनकी ही बनती कहानी है। प्राजक्ता कहलो या पारितोष कहो केसरिया डंडी श्वेत फूल की चादर बिछी पेड़ के नीचे वर्षा रितु कीबिदाई  है शरद रितु की अगवानी है। अब शाम सुबह सुहानी हैं।