पंचायतों में महिला आरक्षण से ग्रामीण भारत में बदलाव का दौर’’ 

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लेखक – अशोक बजाज, स्थानीय इकाई के रूप में त्रि-स्तरीय पंचायत राज व्यवस्था प्रजातंत्र की सबसे लघु इकाई है । गांव स्तर पर ग्राम पंचायतें, ब्लाक स्तर पर जनपद पंचायतें तथा जिला स्तर पर जिला पंचायतें  कार्यरत है । प्राचीन काल से ही भारत के गांवों में पंचायतों का बहुत बड़ा महत्व रहा है, लोंगों… Read more »

क्या वाकई ब्रह्माण्ड को समझना आसान, पर महिला खुद ही एक रहस्य है?

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हाल ही में हमने एक महान वैज्ञानिक प्रोफेसर स्टीफ़न हाॅकिंग को खो दिया जो कि ब्रह्माण्ड की खोज में लगे हुए थे। स्टीफन हॉकिंग ने ब्लैक होल और बिग बैंग सिद्धांत को समझने में अहम योगदान दिया। उन्होंने दो विवाह किए। उस आधार पर नारी को लेकर उनका एक कथन अखबारों में प्रमुखता से छाया… Read more »

महिला सशक्तीकरण की प्रतिबद्धता

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डॊ. सौरभ मालवीय आज हर क्षेत्र में महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज न कराई हो। महिलाएं समाज की प्रथम इकाई परिवार का आभार स्तंभ हैं। एक महिला सशक्त होती है, तो वह दो परिवारों को सशक्त बनाती है। प्राचीन काल में भी महिलाएं… Read more »

जीवंत और मजबूत राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण

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(अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस 08 मार्च पर विशेष आलेख) हम विश्व में लगातार कई वर्षों से अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते आ रहे हैं, महिलाओं के सम्मान के लिए घोषित इस दिन का उद्देश्य सिर्फ महिलाओं के प्रति श्रद्दा और सम्मान बताना है। इसलिए इस दिन को महिलाओं के आध्यात्मिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के… Read more »

मातृत्व स्वास्थ्य का लक्ष्य और चुनौतियां

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उपासना बेहार न्यूयार्क में 24 सितम्बर 2015 को 193 देशों के नेताओं की बैठक हुई जिसे यू. एन. सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट कहा गया।  समिट में 2030 तक के लिए एजेंडा तय किया गया है. ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (सतत विकास लक्ष्य) में 17 मुख्य विकास लक्ष्यों तथा 169 सहायकलक्ष्यों को निर्धारित किया गया है. जो P5 (People, Planet, Peace, Prosperous और Partnership पर जोर देता है, इसे ग्लोबल गोल भी कहा जाता है। इसे “हमारी दुनिया का रूपांतरण : सतत विकास के लिए 2030 का एजेंडा” (Transforming Our World : The 2030 Agenda for Sustainable Development) नाम दिया गया है, जिसका आधार सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य(Millinum Development Goal)  है और इसकी समयसीमा 2015-30 तक है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल के 17 गोल में से गोल 3 का उद्देश्य सभी आयु के लोगों में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा देना है  ‎जिसमें मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाना प्रमुख लक्ष्य हैं। ‎ दुनिया के परिदृश्य में मातृत्व स्वास्थ्य वर्तमान में पूरी दुनिया के परिदृश्य में मातृत्व स्वास्थ्य की स्थिति को देखें तो मातृ मृत्यु ‎दर में 45 प्रतिशत की कमी आई है.। साऊथ एशिया में मातृ मृत्यु ‎दर 1990 से 2013 में 64 प्रतिशत कम हुआ है।  इसी दौरान सब सहारन अफ्रीका में मातृ मृत्यु ‎दर 49 प्रतिशत कम हुआहै। नार्थ अफ्रीका में गर्भवती महिला का प्रसव पूर्व जाँच (कम से कम 4 बार) जहाँ 1990 में 50 प्रतिशत था वो 2014 तक 89 प्रतिशत हुआ है। गर्भनिरोधक का उपयोग पूरी दुनिया में बढ़ा है और 2014 में 64 प्रतिशत महिलायें इसका उपयोग कर रही हैं. भारत में मातृत्व स्वास्थ्य 2015 में आई सयुंक्त राष्ट्र एजेंसी और वर्ल्ड बैंक की सांझा रिपोर्ट के अनुसार देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से होने वाली गर्भवती महिलाओं की मृत्यु 1 लाख 36 हजार है। रिपोर्ट के अनुसार देश में 20 प्रतिशत महिलाओं की मृत्यु खून की कमी से और 10 प्रतिशत मौतेंगर्भपात से सम्बंधित जटिलताओं के कारण होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आकंड़ों के अनुसार भारत में 1 घंटे में 5 महिलाओं की मौत हो जाती है इसका सबसे बड़ा कारण प्रसव के बाद रक्तस्राव और इस पर नियत्रंण न होना है. ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट, 2017 (जीएनआर) की रिपोर्ट के अनुसार एनीमिया से जूझ रही महिलाओं की लिस्ट में भारत सबसे ऊपर है। प्रजनन उम्र में पहुंचने वाली महिलाओं में से आधी से ज्यादा महिलाओं में (51 प्रतिशत) खून की कमी (एनीमिया) है। ऐसी महिलाएं जबगर्भवती होती हैं, तब जच्चा-बच्चा दोनों के लिए खतरनाक होता है. वही प्रिंस्टन विश्वविद्यालय के रुडो विल्सन स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि भारतीय महिलाएं जब गर्भवती होती हैं तो उनमें से 40 फीसदी से अधिक गर्भवती महिलाऐं सामान्य से कम वजन (औसतन 7 कि.ग्रा.) कीहोती हैं, जो गर्भ में पल रहे बच्चे के साथ-साथ मां के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा होता है। इसी प्रकार यूनिसेफ की रिर्पोट ‘एंडिंग चाइल्ड मैरिज-प्रोग्रेस एंड प्रोस्पेक्ट 2014’ के अनुसार दुनिया की हर तीसरी बालिका वधू भारत में है। बाल विवाह के कारण बच्चियां कम उम्र में गर्भवती हो जाती हैं जिससे उनकी मृत्यु, गर्भपात में वृद्धि, कुपोषित बच्चों का जन्म, मातामें कुपोषण, खून की कमी होना, शिशु मृत्यु दर, माता में प्रजनन मार्ग संक्रमण यौन संचारित बीमारिया बढ़ती हैं। स्वास्थ सुविधाओं की कमी देश में शहरों की तुलना में गावों में स्वास्थ सुविधाएं अच्छी नही है।  2011 के ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ों को देखें तो गावों में 88 फीसदी विशेषज्ञ डाक्टरों तथा 53 फीसदी नर्सों की कमी है। शहरों में 6 डाक्टर प्रति दस हजार जनसंख्या में हैं वही ग्रामीण में यह 3 डाक्टर प्रतिदस हजार जनसंख्या में है।  संस्थागत डिलेवरी की स्थिति देखें तो एन.एफ.एच.एस.-4 के अनुसार 78.9 गर्भवती महिलाओं की संस्थागत डिलेवरी हुई है।… Read more »

सामाजिक ‘राक्षस’ का शिकार बनतीं महिलाएं

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आशीष रावत भारतीय समाज में हमेशा से ही पुरुषों का प्रभुत्व रहा है। एक तरफ दुनिया में तकनीकी क्षेत्र में लगातार प्रगति हो रही है, खुशहाली का स्तर बढ़ रहा है वहीं महिलाओं से अप्राकृतिक यौन संबंध और दुव्र्यवहार में भी वृद्धि हो रही है। आजकल महिलाओं से बलात्कार और उनकी बर्बर हत्या करना एक… Read more »

क्या कभी नारी को गुस्सा आया है

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आज से पांच साल पहले 16 दिसंबर 2012  को जब राजधानी दिल्ली की सड़कों पर दिल दहला देने वाला निर्भया काण्ड हुआ था तो पूरा देश बहुत गुस्से में था  । अभी हाल ही में हरियाणा के हिसार में एक पाँच साल की बच्ची के साथ निर्भया कांड जैसी ही बरबरता की गई, देश एक… Read more »

चंबल की ये औरतें- feminism से आगे की बात हैं

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राजनैतिक रूप से लगातार उद्भव-पराभव वाले हमारे देश में कुछ  निर्धारित हॉट टॉपिक्स हैं चर्चाओं के लिए। देश के सभी प्रदेशों में  ”महिलाओं की स्‍थिति” पर लगातार चर्चा इन हॉटटॉपिक्स में से एक  है। यूं तो फेमिनिस्‍ट इनकी सतत तलाश में जुटे रहते हैं मगर  उनका उद्देश्‍य हो-हल्‍ला-चर्चाएं-डिस्‍कोर्स-कॉफी मीटिंग्‍स से आगे जा ही  नहीं पाता… Read more »

महिलाओं की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य की बदहाली क्यों?

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-ललित गर्ग- देश में अस्तित्व एवं अस्मिता की दृष्टि से ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से महिलाओं के हालात बदतर एवं चिन्तनीय है। देखा जा रहा है कि किसी भी क्षेत्र में तमाम महिला जागृति के कार्यक्रमों एवं सरकार की योजनाओं के बावजूद महिलाओं का शोषण होता है, उनके अधिकारों का हनन होता है,… Read more »

शोषण की नई भाषा गढ़ता ‘फंसाने’ का चलन और बच्‍चियां

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कल अंतर्राष्‍ट्रीय बालिका दिवस पर बेटियों के लिए बहुत कुछ सुना,  देखा और पढ़ा भी। सभी कुछ बेहद भावनात्‍मक था। कल इसी बालिका  दिवस पर बच्‍चियों को सुप्रीम कोर्ट ने भी बड़ी सौगात दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने बालविवाह जैसी कुरीतियों पर प्रहार करते हुए ऐतिहासिक  निर्णय दिया कि अब नाबालिग पत्‍नी से संबंध बनाने… Read more »