खान-पान हीटवेव की मार से हरियाणा–पंजाब की खेती और किसानों की आय दोनों संकट में May 2, 2026 / May 2, 2026 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment चरम तापमान का सबसे प्रत्यक्ष और स्पष्ट प्रभाव फसलों पर पड़ता है। यह स्थापित तथ्य है कि 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान गेहूं, चावल और मक्का जैसी प्रमुख फसलों के लिए प्रतिकूल होता है। Read more » हीटवेव की मार
खान-पान खेत-खलिहान क्षेत्रवार कृषि नीति, नकली बीज और कीटनाशकों पर सख्त कानून से एग्री सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी April 27, 2026 / April 27, 2026 by पुनीत उपाध्याय | Leave a Comment छोटे और सीमांत किसानों की आय बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में छोटे किसान हैं इसलिए कम जमीन से अधिक आय देने वाले मॉडल अपनाने होंगे। उन्होंने अंतरवर्तीय फसल प्रणाली, अनाज के साथ फल.सब्जी उत्पादन, पशुपालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और वृक्ष आधारित खेती जैसे एकीकृत कृषि मॉडल को छोटे किसानों के लिए उपयोगी बताया। Read more » क्षेत्रवार कृषि नीति नकली बीज और कीटनाशकों पर सख्त कानून
खान-पान जन-जन को मिले जलाधिकार April 21, 2026 / April 21, 2026 by डॉ.वेदप्रकाश | Leave a Comment डा.वेदप्रकाश कुछ लोग जल का व्यापार करें और कुछ लोग बूंद बूंद को तरसें। क्या यह जन-जन के जलाधिकार का हनन नहीं है? शासन- प्रशासन मौन क्यों है? क्या हम नहीं जानते कि जल जीवन तत्व है,अमृत है और प्रत्येक जीवधारी के लिए परमात्मा द्वारा दिया गया उपहार है। जल के बिना न तो जीवन संभव है और न ही प्रकृति-संस्कृति की संकल्पना साकार हो सकती है। पृथ्वी पर लगभग 70 प्रतिशत जल होने पर भी पेयजल लगभग 03 प्रतिशत ही है। आज जब जनसंख्या की दृष्टि से भारत सबसे आगे है। नदी, कुएं ,तालाब, बावड़ियां, झरनें और भूजल निरंतर प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। तब क्या हमें जल के संरक्षण- संवर्धन और सदुपयोग पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए? ध्यातव्य है कि विगत दिनों इंदौर सहित देश में कई स्थानों पर प्रदूषित पानी पीने से कई लोग असमय मृत्यु के शिकार हो गए। यदि उन्हें स्वच्छ जल का अधिकार मिला होता तो आज वे जीवित होते। भारत की त्यागपूर्वक भोग की संस्कृति ने सर्वे भवंतु सुखिन: के माध्यम से सबके सुख की कामना की है। कुएं, हैंडपंप, झरने और बावड़ियों से उतना ही जल लिया जाता था, जितनी आवश्यकता होती थी। सभी की चिंता करते हुए सभी को पर्याप्त और स्वच्छ जल की उपलब्धता हेतु धनी लोग जगह-जगह कुंए और प्याऊ बनवाते थे। पानी खरीदने और बेचने का विचार ही नहीं था। आज भारत में मानक व अमानक, वैध एवं अवैध से परे सैकड़ों नामों से पैकेज्ड पानी बिक रहा है। पैकेज्ड पानी का व्यापार करने वाली 10 शीर्ष कंपनियों में बिसलेरी, किनले,एक्वाफिना, रेल नीर, टाटा वाटर प्लस, ऑक्सीरिच, किंगफिशर, हिमालयन, बेले एवं नेस्ले प्रमुख हैं। इन कंपनियों का वार्षिक व्यापार लगभग 20 हजार करोड़ रुपए है जिसमें 32 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ बिसलेरी सबसे ऊपर है। बाजार में एक लीटर पानी की कीमत लगभग 20 रुपये है। एक स्वस्थ व्यक्ति को दिन में लगभग 3 लीटर पानी पीना चाहिए, यानी एक व्यक्ति दिन में लगभग 60-70 रुपये का पानी पीता है। परिवार के हिसाब से यह खर्च लगभग 300-400 रुपये प्रति परिवार हो जाता है। क्या यह परिवार की आर्थिकी को प्रभावित नहीं करता? क्या किसी गरीब व्यक्ति के लिए खरीद कर पानी पीना संभव है? जानकारी के अनुसार भारत में पैकेज्ड पानी का चलन 1960 के दशक में शुरू हुआ। कुएं, तालाब, बावड़ी और प्याऊ आदि पर उपलब्ध जल में सभी का अधिकार होता था लेकिन धीरे-धीरे औद्योगीकरण एवं भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदूषणों से ये जल स्रोत प्रदूषित होने लगे। प्याऊ खत्म कर दी गई और विज्ञापनों के माध्यम से बोतल बंद पानी पीने वालों को ही स्वस्थ और सभ्य दिखाया जाने लगा। प्रश्न यह है कि जब जल पर मानव सहित सभी जीवधारियों का अधिकार है तो उसे भूगर्भ से निकालकर, नदी- झरनों से लेकर व्यावसायिक प्रयोग के लिए कुछ कंपनियां अथवा लोग कैसे दोहन कर सकते हैं? देश के अनेक हिस्सों में अवैध रूप से नदियों, झरनों और भूगर्भ से जल निकालकर खुलेआम बेचा जा रहा है। नदियां और झरनें सूख रहे हैं। उनके बहाव क्षेत्र में रहने वाले लोगों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में ये लोग आवश्यकता के लिए पानी खरीदने को मजबूर हैं। क्या यह इन लोगों के जलाधिकार का हनन नहीं है? क्या व्यवसाय के लिए दोहन कर रहे लोग इस जल के बदले किसी को कोई कीमत दे रहे हैं? देश के कई हिस्सों में और विशेष रूप से महानगरों व पर्वतीय क्षेत्रों में शासन- प्रशासन की मिलीभगत से जल माफिया पनप रहे हैं। नहर, बांध एवं पाइपलाइन से स्थानांतरित किए जाने वाले जल का बड़ा हिस्सा लीकेज के कारण बर्बाद होता है। विभिन्न स्थानों पर घरों में सप्लाई हेतु बिछाई गई पाइपलाइन जर्जर हैं। कई स्थानों पर उन्हें अवैध रूप से तोड़कर पानी लिया जाता है और बाकी व्यर्थ बहता रहता है। इसकी निगरानी हेतु कोई व्यवस्था भी दिखाई नहीं देती। क्या यह जिन्हें जल नहीं मिल पा रहा है और पानी के लिए सरकार को पैसा भी दे रहे हैं उनके जलाधिकार का हनन नहीं है? 23 मार्च 2026 को छपा एक समाचार बताता है कि भूजल के अवैध दोहन के कारण राष्ट्रीय राजधानी डे जीरो की तरफ बढ़ रही है, अर्थात् राजधानी में वर्षा जल संचयन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। न ही उपचारित पानी के उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है और न ही पानी की बर्बादी रुक रही है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का अवैध दोहन हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार राजधानी में लगभग 1250 मिलियन गैलन पानी की प्रतिदिन आवश्यकता है। इसकी तुलना में केवल 1000 मिलियन गैलन पानी ही उपलब्ध है। जितना उपलब्ध है उसमें से भी लगभग आधा चोरी या रिसाव के कारण बर्बाद हो जाता है जबकि समय-समय पर पाइप लाइन की मरम्मत एवं रखरखाव के लिए करोड़ों रुपया आवंटित किया जाता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्व के कई शहर डे जीरो की स्थिति में पहुंच सकते हैं। जिसमें भारत के दिल्ली, जयपुर, चेन्नई, हैदराबाद व बेंगलूर जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। चिंताजनक यह भी है कि राष्ट्रीय राजधानी जैसे स्थान पर वर्षा जल संचयन की विभिन्न योजनाएं होने पर भी उचित व्यवस्था न होने के कारण प्रतिवर्ष वर्षा जल का लगभग 85 प्रतिशत नालों में बेकार बह जाता है। क्या इस प्रकार की स्थिति जन-जन के जलाधिकार हेतु एक बड़ी समस्या नहीं है? नदियां सिंचाई पेयजल एवं औद्योगिक आपूर्ति की एक बड़ी स्रोत हैं। देश की छोटी बड़ी कई नदियां भयानक रूप से प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। कई नदियों में अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट एवं सीवेज खुलेआम बहाया जा रहा है। कई नदियों पर बांध बना दिए गए हैं, जिससे नदी को उसके जीवन के लिए बहाव हेतु जल ही नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में नदी का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है। नदियां दम तोड़ रही हैं। इन नदियों के आसपास रहने वाले लोग विस्थापन को मजबूर हैं। नदियों को जोड़ने से सभी को पेयजल की सुनिश्चितता संभव है। चिंताजनक है कि विगत दिनों जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में नदी जोड़ो परियोजना के तहत आवंटित बजट का पूरा उपयोग न होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। वित्तीय वर्ष 2025-2026 के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि इसके लिए 1808 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। जिसमें से केवल 25 प्रतिशत ही खर्च हुआ है, यानी परियोजनाओं के क्रियान्वयन की गति धीमी रही है। क्या इस प्रकार की परियोजनाओं में सुस्ती गंभीर अपराध नहीं होना चाहिए? सर्वविदित है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जल स्रोत तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। विगत दिनों अर्थ साइंस रिव्यूज नामक पत्रिका में प्रकाशित एक शोध में यह स्पष्ट हुआ है कि विगत 30 वर्षों में पूर्वी हिमालय से लगभग 30 प्रतिशत बर्फ की परत घट गई। चिंताजनक यह भी है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ग्लेशियर झीले बढ़ रही हैं जिनके फटने की घटनाएं भी जारी हैं। पर्वतीय और हिमालयी क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न रूप में निर्माण भी वहां की पारिस्थितिकी एवं जल संरचनाओं को नुकसान पहुंचा रहा है। पहाड़ों में कई स्थानों पर वैध अथवा अवैध निर्माण से जल स्रोत सूख रहे हैं जिससे यहां के लोग पहाड़ों को छोड़कर मैदानों में आकर बस रहे हैं। भूजल दोहन की स्थिति भी चिंताजनक है। जल स्रोतों से मानव शक्ति अथवा पशु शक्ति के जरिए जल लेने के स्थान पर अब यांत्रिक शक्ति से जल का दोहन किया जा रहा है। खेती और औद्योगिक आपूर्ति जैसे कार्यों के लिए भूजल दोहन निरंतर बढ़ रहा है। सबसे अधिक भूजल दोहन करने वाले राज्यों में पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा एवं हिमाचल सबसे आगे हैं। इसके दुष्परिणाम से कुएं, हैंडपंप, ट्यूबवेल और तालाबों के पानी का स्तर अचानक नीचे जा रहा है। आईआईटी गांधीनगर के एक शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि वर्ष 2002 से 2021 तक उत्तर भारत में लगभग 450 घन किमी भूजल घट गया है। क्या इस प्रकार के शोध भविष्य में जल संकट की भयावहता के संकेत नहीं कर रहे हैं? भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण ग्रंथ वेद, रामायण और महाभारत आदि में भी जल के महत्व एवं उपयोगिता के संबंध में व्यापक चिंतन उपलब्ध है। आदिकाव्य रामायण में राजा सुमति द्वारा जल दान का उल्लेख है। वहां लिखा है- राजा सुमति सदा अन्न का दान करते और प्रतिदिन जल दान में प्रवृत्त रहते थे। उन्होंने असंख्य पोखरों, बगीचों और बावड़ियों का निर्माण कराया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने मन की बात नामक कार्यक्रम एवं अनेक महत्वपूर्ण स्थानों पर अपने संबोधनों में जल के संरक्षण-संवर्धन हेतु निरंतर संदेश दे रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 51(क) में मूल कर्तव्य के अंतर्गत लिखा है- प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करें और उसका संवर्धन करें…। संयुक्त राष्ट्र महासभा भी जुलाई 2010 में स्वच्छ जल की उपलब्धता को मानव अधिकार बनाने का प्रस्ताव मंजूर कर चुकी है। भारत भी संयुक्त राष्ट्र महासभा का सदस्य है। क्या अब यह समय की मांग नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित प्रस्ताव लागू किया जाए? आज जब देश विकसित भारत का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहा है, तब जन-जन को स्वच्छ और समुचित पेयजल उपलब्ध हो यह सुनिश्चित करना शासन- प्रशासन की जिम्मेदारी बने। जल उत्पाद नहीं है, परमात्मा का दिया हुआ उपहार है। इसलिए यथाशीघ्र जल के अवैध दोहन, दूषण एवं अवैध व्यवसायिक बिक्री पर कठोर दंडात्मक प्रविधान करने की आवश्यकता है। जिससे जल स्रोत बचे रहें और जन-जन को जलाधिकार मिल सके। डा.वेदप्रकाश Read more » जन-जन को मिले जलाधिकार
खान-पान खेत-खलिहान आस्था के नाम पर फैलते छल से बचकर ही सुरक्षित रहेगी किसान की मेहनत April 16, 2026 / April 16, 2026 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment वे घर की दहलीज पर खड़ी होकर आने-जाने वालों का स्वागत करती हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देती हैं। उनके लिए यह केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आस्था का हिस्सा होता है। लेकिन यही आस्था कई बार उनकी कमजोरी बन जाती है, जब कुछ लोग इसका लाभ उठाने लगते हैं। Read more » Tradition of charity and service in villages to kalnem किसान गाँवों में दान और सेवा की परंपरा
खान-पान खेत-खलिहान असमय बारिश ने बर्बाद की फसलें April 16, 2026 / April 16, 2026 by रमेश ठाकुर | Leave a Comment नुकसान पर सरकारें बेशक सर्वे कराकर प्रभावित किसानों को ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ के तहत राहत देने का प्रयास करती हों लेकिन लगातार बेमौसम बारिश के कारण किसानों का कर्ज और मुसीबतें बढ़ रही हैं। हुकूमतें बेशक इस बारिश को ‘कुदरती आपदा’ करार दें पर, कड़वी सच्चाई वही है जो मौसम वैज्ञानिक बता रहे हैं। Read more » असमय बारिश ने बर्बाद की फसलें
खान-पान कम उपभोग, ज्यादा संरक्षण: यही है शून्य अपशिष्ट का मंत्र March 29, 2026 / March 29, 2026 by सुनील कुमार महला | Leave a Comment इस साल यानी कि वर्ष 2026 में इस दिवस की थीम ‘खाद्य अपशिष्ट’ रखी गई है, जिसका मुख्य उद्देश्य भोजन की बर्बादी को रोकना है। Read more » international zero waste day
खान-पान हॉर्मुज़ की हलचल से खेतों तक पहुंचा संकट. उर्वरक निर्भरता पर बड़ा सवाल March 18, 2026 / March 18, 2026 by निशान्त | Leave a Comment लेकिन दुनिया की सबसे अहम समुद्री गलियों में अगर हलचल बढ़ जाए, तो उसका असर चुपचाप खेतों तक पहुंच जाता है। Read more » उर्वरक निर्भरता पर बड़ा सवाल
खान-पान टप-टप टपक रहे महुआ की मादकता से महक रही है धरती March 17, 2026 / March 17, 2026 by आत्माराम यादव पीव | Leave a Comment धरती पर फूला हुआ टप-टप गिर रहा महुआ किसी रस भरे मोतियों से कम नजर नहीं आता है। आकाश में चंदा मामा अपनी प्यारी सी चितवन के साथ खिले हुए है इस रस भरे वातावरण में महुआ की मादकता प्रेमियों Read more » महुआ महुआ की मादकता
खान-पान साझा चूल्हा: संकट से समाधान की राह March 16, 2026 / March 16, 2026 by प्रियंका सौरभ | Leave a Comment रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों को लेकर समय-समय पर देश में राजनीतिक बहस तेज हो जाती है। विपक्ष इसे आम आदमी पर बढ़ते आर्थिक बोझ के रूप में उठाता है, Read more » रसोई गैस सिलेंडर साझा चूल्हा
खान-पान भारत में चाइल्डहुड ओबेसिटी: उभरती हुई साइलेंट पैन्डेमिक March 16, 2026 / March 16, 2026 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment भारत लंबे समय तक कुपोषण और अल्पपोषण की समस्या से जूझता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में एक नई स्वास्थ्य चुनौती तेजी से उभर कर सामने आई है—चाइल्डहुड ओबेसिटी Read more » चाइल्डहुड ओबेसिटी
खान-पान दूध में मिलावट: आर्थिक अपराध नहीं नैतिक पतन की पराकाष्ठा February 27, 2026 / February 27, 2026 by डॉ नीलम महेन्द्रा | Leave a Comment भारत आज गर्व से दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश होने का दावा करता है। वैश्विक दूध उत्पादन में हमारी हिस्सेदारी लगभग 25% है। आंकड़ों की बाजीगरी में हम नंबर वन हैं, लेकिन क्या कभी हमने उस दूध के गिलास की गहराई में झांक कर देखा है जिसे हम ‘अमृत’ समझकर अपने बच्चों को पिलाते हैं? हालिया रिपोर्ट्स और समाचार पत्रों […] Read more » adulterated milk दूध में मिलावट
खान-पान ₹6.78 की थाली: क्या देश का भविष्य इतना सस्ता है? February 23, 2026 / February 23, 2026 by डॉ. सत्यवान सौरभ | Leave a Comment सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करोड़ों बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन योजना के तहत प्रति विद्यार्थी प्रतिदिन मात्र ₹6.78 (प्राइमरी) और ₹10.17 (अपर प्राइमरी) की कुकिंग कॉस्ट—क्या इससे पोषण और सम्मान दोनों संभव हैं? — डॉ. सत्यवान सौरभ भारत में शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की सबसे मज़बूत नींव माना जाता है। बार-बार यह कहा जाता […] Read more » ₹6.78 की थाली