नींद नैन में बस जाती है

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  नींद हमे जब ना आती है चलती घड़ी रुक सी जाती है। कलम उठाकर लिखना चाहूँ भूली बीसरी याद आती है। कलम जब कभी रुक जाती है नींद कंहा फिर तब आती है। कोई कहानी मुकम्मल होकर जब काग़ज पे उतर आती है, नींद नैन में बस जाती है। शब्द कभी कहीं खो जाते हैं भाव रुलाने लग जाते हैं किसी पुराने गाने की लय पर कोई कविता जब बन जाती है। नींद हमें फिर आ जाती है। राह में जब रोड़े आते है, चलते चलते थक जाते हैं पैरों में छाले पड़ जाते ऐसे सपने हमें आते है, कोई नई कहानी तब सपनो में ही गढ़ी जाती है, नींद चौंक कर खुल जाती है।

काट औ छाँट जो रही जग में !

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काट औ छाँट जो रही जग में, दाग बेदाग़ जो रहे मग में; बढ़ा सौन्दर्य वे रहे प्रकृति, रचे ब्रह्माण्ड गति औ व्याप्ति !   कष्ट पत्ती सही तो रंग बदली, लालिमा ले के लगी वह गहमी; गही महिमा ललाट लौ लहकी, किसी ने माधुरी वहाँ देखी !   सेब जो जंगलों में सेवा किये,… Read more »

पारिजात के फूल

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भाग 1 – 1982 वह सर्दियों के दिन थे. मैं अपनी फैक्टरी से नाईट शिफ्ट करके बाहर निकला और पार्किंग से अपनी साइकिल उठाकर घर की ओर चल पड़ा. सुबह के 8:00 बज रहे थे. मैं अपने घर के सामने से गुजरा. मां दरवाजे पर खड़ी थी, मैंने मां को बोला ‘मां नहाने का पानी… Read more »

छोटी अम्मा की बेटी

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सुधीर मौर्य मेरे पिता ज़मीदार नहीं थे पर उनका रुतबा किसी ज़मीदार से कम नहीं था। उनका रुतबा होता भी कैसे कम वो एक ज़मीदार के बेटे और ज़मीदार भाई थे। मेरे पिता तीन भाई थे और तीनो में वे छोटे। मेरे पिता के दोनों बड़े भाई स्कूल से आगे नहीं गए। सच तो ये… Read more »

औरत, औरत की दुश्मन..

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हर शाम की तरह आज भी ऑफिस से आने के बाद घर का वही माहौल था। सब बैठ कर, एक टीम बना कर इधर उधर की बातें कम और चुगलियां ज्यादा कर रहे थे, और मम्मी हमेशा की तरह टीम की कप्तान थी। शायद वो सही कहता है, कि तुम्हारी माँ सब को अपने उंगली… Read more »

कब्र का अजाब

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आरिफा एविस ‘नहीं, मदरसे में रूही नहीं जायेगी . ‘पर क्यों अम्मी?’ ‘कहा ना अब वो नहीं जायेगी मदरसे में बस..’ ‘तो क्या रूही आपा अपना कुरआन पूरा नहीं कर पाएंगी ?’ ‘मैंने यह तो नहीं कहा कि रूही अपना कुरआन पूरा नहीं करेगी. मैंने तो इतना ही कहा कि वो अब मदरसे में पढ़ने… Read more »

जाम का पेड़

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 आशीष श्रीवास्तव दादीजी अपने बेटे-बहू और पोती के साथ नये मकान में रहने आयीं    तो देखा मोहल्ले में हरियाली का नामोनिशान नहीं। कहीं पर भी पेड़ नहीं  फलदार पेड़ तो मोहल्ले के आसपास भी नहीं दिख रहे थे। लोगों ने कुछ पौधे अवश्य गमलों में उगा रखे थे    लेकिन वे असली हैं या नकली, ये… Read more »

पागल

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गाँव में उन दिनों खूब आंधी चल रही थी जिससे वहां की बालू रेत भी खूब उड़ रही थी। सारा माहौल कुछ मटमैले रंग का प्रतीत हो रहा था। एक तो आंधी ऊपर से ये तेज धूप, कोई अपने घरों से दोपहर को बाहर तक नहीं निकलता था। कौन खामखां आंधी में परेशानी उठाए भला।… Read more »

कलयुग के देवता

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कहने को आजाद हो गये हम पर मिली आजादी किस बात की जब बिना रिश्वतखोरी के आती नहीं है साँसभी। घर से निकलते होती है मुलाकात रिश्वतखोर दलालों से येहैं कलयुग के देवता पाला न पड़े गद्दारों से।। कैसे छुपायें, पचती नहीं गैस बनती है बात भी बिना रिशवतखोरी के आती नहीं है साँसभी।। करप्सन,करप्शन,… Read more »

चश्मा

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देवेश शास्त्री ………. उन्हें नीति-नेम, धर्म-कर्म से कोई मतलब नहीं था। उसकी स्वाभाविक वृत्ति राजनैतिक रूप से ऐन-केन प्रकारेण अपना उल्लू सीधा करने यानी कमाऊ जुगाड़ भिड़ाने की रही है। कई बार चुनाव भी लड़ा और हारते रहे, उनका नजरिया चुनाव जीतने की बजाय आलाकमान से मिलने वाले चुनावी खर्चे को हड़पने और क्षेत्रीय रसूख… Read more »