कोई भी नई चीज आ जाने पर पुरानी चीज पुरानी हो जाती है …………

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दीपिका बात है 2011 की जब मैंने अपने जीवन मे किसी खास को पहला तोहफा दिया . हम पीजी की पढ़ाई कर रहे थे और हॉस्टल मे रहते थे. पैसा घर से ही आता था (खर्च का) और उसी मे सब कुछ देखना पड़ता था. मेरे किसी खास का जन्मदिन आ रहा था.प्लान करना शुरू कर दिया था कि क्या दे.  मेरी मदद करने… Read more »

एक थी माया ………….!!!

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:: १ :::   मैं सर झुका कर उस वक़्त  बिक्री का हिसाब लिख रहा था कि उसकी  धीमी आवाज सुनाई दी, “अभय, खाना खा लो” ,मैंने सर उठा कर उसकी  तरफ देखा, मैंने उससे कहा ,” माया , मै आज डिब्बा नहीं लाया हूं ।” दरअसल सच तो यही था कि  मेरे घर में उस दिन खाना नहीं बना था ।  गरीबी का वो ऐसा दौर था कि… Read more »

 जंगलज़ेन शेरु

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गंगानन्द झा स्वामी विवेकानन्द को प्रासंगिकता से युक्त रखने में रामकृष्ण मिशन की निर्णायक भूमिका है। मिशन के संन्यासी आध्यात्मिक, शैक्षणिक, और सामाजिक स्तरों पर लगातार स्वामीजी की साधना और व्रत का पालन करते जा रहे हैं। स्वामी समर्पणानन्द उन संन्यासियों में एक हैं। वे अपने मिशन के विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। उन्होंने समर्पण के… Read more »

नींद नैन में बस जाती है

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  नींद हमे जब ना आती है चलती घड़ी रुक सी जाती है। कलम उठाकर लिखना चाहूँ भूली बीसरी याद आती है। कलम जब कभी रुक जाती है नींद कंहा फिर तब आती है। कोई कहानी मुकम्मल होकर जब काग़ज पे उतर आती है, नींद नैन में बस जाती है। शब्द कभी कहीं खो जाते हैं भाव रुलाने लग जाते हैं किसी पुराने गाने की लय पर कोई कविता जब बन जाती है। नींद हमें फिर आ जाती है। राह में जब रोड़े आते है, चलते चलते थक जाते हैं पैरों में छाले पड़ जाते ऐसे सपने हमें आते है, कोई नई कहानी तब सपनो में ही गढ़ी जाती है, नींद चौंक कर खुल जाती है।

काट औ छाँट जो रही जग में !

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काट औ छाँट जो रही जग में, दाग बेदाग़ जो रहे मग में; बढ़ा सौन्दर्य वे रहे प्रकृति, रचे ब्रह्माण्ड गति औ व्याप्ति !   कष्ट पत्ती सही तो रंग बदली, लालिमा ले के लगी वह गहमी; गही महिमा ललाट लौ लहकी, किसी ने माधुरी वहाँ देखी !   सेब जो जंगलों में सेवा किये,… Read more »

पारिजात के फूल

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भाग 1 – 1982 वह सर्दियों के दिन थे. मैं अपनी फैक्टरी से नाईट शिफ्ट करके बाहर निकला और पार्किंग से अपनी साइकिल उठाकर घर की ओर चल पड़ा. सुबह के 8:00 बज रहे थे. मैं अपने घर के सामने से गुजरा. मां दरवाजे पर खड़ी थी, मैंने मां को बोला ‘मां नहाने का पानी… Read more »

छोटी अम्मा की बेटी

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सुधीर मौर्य मेरे पिता ज़मीदार नहीं थे पर उनका रुतबा किसी ज़मीदार से कम नहीं था। उनका रुतबा होता भी कैसे कम वो एक ज़मीदार के बेटे और ज़मीदार भाई थे। मेरे पिता तीन भाई थे और तीनो में वे छोटे। मेरे पिता के दोनों बड़े भाई स्कूल से आगे नहीं गए। सच तो ये… Read more »

औरत, औरत की दुश्मन..

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हर शाम की तरह आज भी ऑफिस से आने के बाद घर का वही माहौल था। सब बैठ कर, एक टीम बना कर इधर उधर की बातें कम और चुगलियां ज्यादा कर रहे थे, और मम्मी हमेशा की तरह टीम की कप्तान थी। शायद वो सही कहता है, कि तुम्हारी माँ सब को अपने उंगली… Read more »

कब्र का अजाब

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आरिफा एविस ‘नहीं, मदरसे में रूही नहीं जायेगी . ‘पर क्यों अम्मी?’ ‘कहा ना अब वो नहीं जायेगी मदरसे में बस..’ ‘तो क्या रूही आपा अपना कुरआन पूरा नहीं कर पाएंगी ?’ ‘मैंने यह तो नहीं कहा कि रूही अपना कुरआन पूरा नहीं करेगी. मैंने तो इतना ही कहा कि वो अब मदरसे में पढ़ने… Read more »

जाम का पेड़

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 आशीष श्रीवास्तव दादीजी अपने बेटे-बहू और पोती के साथ नये मकान में रहने आयीं    तो देखा मोहल्ले में हरियाली का नामोनिशान नहीं। कहीं पर भी पेड़ नहीं  फलदार पेड़ तो मोहल्ले के आसपास भी नहीं दिख रहे थे। लोगों ने कुछ पौधे अवश्य गमलों में उगा रखे थे    लेकिन वे असली हैं या नकली, ये… Read more »