एक समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य – दीपक ‘मशाल’


media_relations_4आज की ताज़ा खबर, आज की ताज़ा खबर… ‘कसाब की दाल में नमक ज्यादा’, आज की ताज़ा खबर….. .
चौंकिए मत, क्या मजाक है यार, आप चौंके भी नहीं होंगे क्योंकि हमारी महान मीडिया कुछ समय बाद ऐसी खबरें बनाने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं. आप विगत कुछ दिनों की ख़बरों पर ज़रा गौर फरमाइए, ‘कसाब की रिमांड एक हफ्ते और बढ़ी’, ‘कसाब ने माना कि वो पाकिस्तानी है’, ‘कसाब मेरा बेटा है-एक पाकिस्तानी का दावा’, ‘कसाब मेरा खोया हुआ बेटा-एक इंडियन माँ’, ‘जेल के अन्दर बम्ब-रोधक जेल बनेगी कसाब के लिए’, ‘कसाब के लिए वकील की खोज तेज़’, ‘अंजलि बाघमारे लडेंगी कसाब के बचाव में’, ‘गाँधी की आत्म-कथा पढ़ रहा है कसाब’ वगैरह-वगैरह…. अरे महाराज, ये महिमामंडन क्यों? कसाब न हुआ ‘ओये लकी, लकी ओये’ का अभय देओल हो गया.ज़रा सोचिये की क्या गुज़रती होगी ये सब देख कर उन्नीकृष्णन, करकरे, सालसकर और कामते जैसे शहीदों पर. अरे इतनी बार नाम तो हमने देश को इस भयावह संकट से निकलने वाले इन वीरों का भी नहीं लिया. माफ़ कीजिये मैं ये सब व्यंग्य की भाषा में लिख सकता था मगर मैं उन मुख्यमंत्री जी की तरह संवेदनाहीन नहीं बन सकता जो शहीदों का सम्मान करना नहीं जानते. इतने के बावजूद शायद महामीडिया और तथाकथित सेकुलरों का तर्क हो की ‘ पाप से घृणा करो, पापी से नहीं’, तो ठीक है उसे उसके पापों की ही सजा दे दो, नहीं हिम्मत पड़ती तो गीता पढ़ के देदो, कुरान का सही अर्थ समझ के देदो और दो, ऐसी सजा दो, ऐसी सजा दो की हर आतंक की रूह फ़ना हो जाये, काँप जाये.

खैर ज्यादा बोल गया, क्योंकि इस सब के लिए इन मीडिया वालों को दोषी ठहराना भी सही नहीं है, इन बेचारों के लिए तो रोज़ी-रोटी वतन और इज्ज़त से प्यारी हो गयी है. तभी ‘काली मुर्गी ने सफ़ेद अण्डे दिए’ ब्रेकिंग न्यूज़ बनाते हैं और चुनावी बरसात का मौसम आते ही ये भी सत्ताधारी सरकार को पुनः बहाल करने के ‘अभियान’(साजिश नहीं कह सकता, ये शब्द चुनाव आयोग को भड़का सकता है खामख्वाह मुझ पर भी रासुका लग सकती है) के तहत अघोषित, अप्रमाणित, अप्रकट किन्तु दृष्टव्य गठबंधन बना लेते हैं. चाणक्य नीति में नयी नीति एड करनी पड़ेगी ‘ जिसकी लाठी उसकी भैंसें’ भैसें इसलिए की कई हैं जैसे की प्रेसिडेंट जी, चीफ इलेक्शन कमिश्नर जी, सी बी आई जी, मीडिया जी, न्यायाधीश जी.
कमाल देखिये कि ५ वर्ष तक मूक-बधिरों के लिए प्रोग्राम बने रहने के बाद हमारे अतिप्रतिभाशाली प्रधानमंत्री जी अक्षम प्रधानमंत्री का लेबल हटाने के लिए अचानक आजतक की तरह हल्ला बोल की मुद्रा में आ गए, मगर वो भी हाईकमान के इशारे पर. ऐसे लगा जैसे मालिक ने बोला हो ‘टॉमी छू’. अरे महाराज दया करो हमें पीअच्.डी., ऍफ़.एन.ए.सी. डिग्रीधारक प्रोफेसर नहीं चाहिए जो घड़ी देख के क्लास लेने आयें और घड़ी देख के बिना कुछ समझाए चले जाएँ(ऐसे लोग सलाहकार ही अच्छे लगते हैं). मालिक, सचिन होना एक बात है और गैरी किर्स्टन होना दूसरी, जरूरी नहीं की अच्छा खिलाडी अच्छा कोच भी साबित हो. हमें एक लीडर चाहिए न की शोपीस. ओबामा जी कलाकार आदमी हैं, खूब मीठी मीठी बातें कहीं पी ऍम साब के बारे में, भाई इलेक्शन टाइम है, वो भी मनमोहक अदा से झूमते हुए पलट के तारीफ कर गए भाई की. इसपर मुझे संस्कृत का एक श्लोक याद आता है कि-
‘उष्ट्रस्य विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभः, परस्परं प्रशंस्यती अहो रूपः अहो गुणं’
ज्यादा मुश्किल अर्थ नहीं है- ऊँट के विवाह में गधे जी ने गीत गया, फिर दोनों ने आपस में ही एक दुसरे के गले(आवाज़) और रूप की प्रशंसा भी कर ली. सच है जी नेता जी वेदों की ओर लौट रहे हैं.

मुझे सच में नहीं पता कि नेहरु-गाँधी परिवार के सबसे छोटे चश्म-ओ-चिराग ने कुछ उल्टा-पुल्टा बोला था कि नहीं (क्योंकि सी.डी. नहीं देखि) मगर ये तो सच है कि आरोप लगे हैं, बाकी सच्चाई चुनाव बाद ही पता चलेगी क्योंकि अभी हाईकमान ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर की जंजीर टाइट कर रखी है. मगर श्रीमान वरुण जी, अच्छा सुन्दर, धार्मिक नाम पाया है आपने और आपके सारे परिवार ने. ज़रा सोच समझ के ही बोल लेते, जोश में होश खो दिया, इतना भावुक होने की क्या जरूरत थी. 

अरे लेलेले अगर मैंने मासूम लालू के लिए नहीं लिखा तो इस महान सेकुलर का दिल टूट जायेगा और लल्ला रूठ जायेगा. खैर दद्दा आपकी तो कच्ची लोई है, जो जी में आये बोलो. वैसे भी आपकी गलती नहीं मानता मैं, चारा खा के कोई और बोलेगा भी क्या(याद रहे ये चारा है, राणा प्रताप ने भूसे की रोटियां खाई थीं वो भी अपने देश के लिए, इसलिए अपने को उस केटेगरी में मत समझना). लेकिन एक नया राज़ पता चला की चारा आपने राबड़ी को भी खिलाया है, वो तो भला हो उनकी जुबान का जिसने खुल के सब पर्दाफाश कर दिया की उनके दिमाग में जो है वो क्या खाने से हो सकता है.

आहा हा, पासवान साब तो मुझे सदाशिव अमरापुरकर की याद दिला देते हैं(रियल लाइफ नहीं रील लाइफ वाले अमरापुरकर की).

माननीय मुलायम जी के बारे में लिखने से तो कलम भी इन्कार करती है, वैसे भी मैं इस ब्लॉग और व्यंग्य की गरिमा नहीं गिराना चाहता.

बहिन मायावती जी के लिए जरूर करबद्ध निवेदन है आप लोगों से कि एक बार इस बेचारी को २-४ दिन के लिए ही सही प्रधानमंत्री बनवा दो यार. पुष्पक विमान से कुछ विदेशी दौरे मार लेगी, बाहर की धरती देख लेगी, विदेशी मेमों से कुछ फैशन टिप्स ले लेगी, देश में ५-६ हज़ार अपनी स्टेच्यू लगवा लेगी और उत्तर प्रदेश में करोड़ों के करती है यहाँ अरबों के वारे-न्यारे कर लेगी(इंटरनेशनल बर्थडे पार्टी के लिए चंदा ज्यादा चाहिए ना) और ज्यादा कुछ नहीं. फिर लल्ला कोई बड़ी समस्या जैसे ही देश के सामने आवेगी अपने आप ही भड़भड़ा के इस्तीफा दे देगी. उसकी तमन्ना पूरी कर दो यार, कम से कम सच्चाई में एक तो ‘स्लमडोग मिलियेनर’ बने.

बहुत देर से कमेन्ट किये जा रहा हूँ भइया, अब सुनो गौर से ऐसे लिखते-पढ़ते रहने से कुछ ना होने वाला, कुछ ठानो, कुछ करो. मैंने तो सोच लिया है अगला इलेक्शन लड़ने का, आप भी डिसाइड करलो या बिना मेरा नाम बताये सुसाईड कर लो. क्योंकि अब ये ही दो आप्शन हैं. सच्चाई ये है कि आज जब तक एक ऍम.पी. एक डी.ऍम. के बराबर योग्य(सिर्फ डिग्री वाला योग्य नहीं, बोलने और करने वाला योग्य) नहीं होगा तब तक देश का यूँ ही मटियामेट होता रहेगा और इस जैसे न जाने कितने व्यंग्य सामने आते रहेंगे.

एक बात दिल से बताना भाईलोग कि “क्या आप लोगों को ऐसा नहीं लगता कि उम्मीदवारों के नाम के बाद एक आखिरी ऑप्शन इनमें से कोई नहीं का होना चाहिए और यदि ५०% से ज्यादा मतदाता उस ऑप्शन को चुनते हैं तो पुनः चुनाव हो. वो भी नए उम्मीदवारों के साथ जिससे कि सभी पार्टियों को ये सन्देश जाये की अब ‘अर्द्धलोकतंत्र’ नहीं चलेगा, उनका उम्मीदवार नहीं चलेगा बल्कि जनता का नेता चलेगा. संविधान में संशोधन होना चाहिए कि कुछ विशेष योग्यता वाला व्यक्ति ही सांसद या विधायक पद का उम्मीदवार हो वर्ना ऐसे ही भैंसियों की पीठ से उतर के लोग देश की रेल ढकेलते रहेंगे.”

अरे जागो ग्राहक जागो, अब और घटिया माल मत खरीदो. एक नई क्रांति का सूत्रपात करो.

- दीपक चौरसिया ‘मशाल’

April 15th, 2009 | Tags: | Category: राजनीति, व्यंग्य | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post | 241 views

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