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आरक्षण समाप्त करना है तो………


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

आरक्षण समाप्त करना है तो आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसर तत्काल बर्खास्त किये जायें!

भारत के संविधान के बारे में जानकारी रखने वाले सभी विद्वान जानते हैं कि हमारे संविधान के भाग तीन अनुच्छेद-14, 15 एवं 16 में जो कुछ कहा गया है, उसका साफ मतलब यही है कि धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ किया जाने वाला विभेद असंवैधानिक होगा| समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा| इस स्पष्ठ और कठोर प्रावधान के होते हुए अनुच्छेद 16 (4) में कहा गया है कि-

‘‘इस अनुच्छेद (उक्त) की कोई बात राज्य (जिसे आम पाठकों की समझ के लिये सरकार कह सकते हैं, क्योंकि हमारे यहॉं पर प्रान्तों को भी राज्य कहा गया है|) को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों में या पदों के आरक्षण के लिए उपबन्ध करने से निवारित नहीं (रोकेगी नहीं) करेगी|’’

उक्त प्रावधान को अनेकों बार हमारे देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने उचित और न्याय संगत ठहराया है और साथ ही यह भी कहा है कि अनुच्छेद 14 से 16 में समानता की जो भावना संविधान में वर्णित है, वह तब ही पूरी हो सकती है, जबकि समाज के असमान लोगों के बीच समानता नहीं, बल्कि समान लोगों के बीच समानता का व्यवहार किया जावे|

 

इसी समानता के लक्ष्य को हासिल करने के लिये उक्त संवैधानिक प्रावधान में पिछड़े वर्ग लोगों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने पर जोर दिया गया है| संविधान निर्माताओं का इसके पीछे मूल ध्येय यही रहा था कि सरकारी सेवओं में हर वर्ग का समान प्रतिनिधित्व हो ताकि किसी भी वर्ग के साथ अन्याय नहीं हो या सकारात्मक रूप से कहें तो सबके साथ समान रूप से न्याय हो सके| क्योंकि इतिहास को देखने से उन्हें ज्ञात हुआ कि कालान्तर में वर्ग विशेष के लोगों का सत्ता एवं व्यवस्था पर लगातार वंशानुगत कब्जा रहने के कारण समाज का बहुत बड़ा तबका (जिसकी संख्या पिच्यासी फीसदी बताई जाती है) हर प्रकार से वंचित और तिरष्कृत कर दिया गया|

 

ऐसे हालातों में इन वंचित और पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने की पवित्र सोच को अमलीजामा पहनाने के लिये अनुच्छेद 16 में उक्त उप अनुच्छेद (4) जोड़कर अजा, अजजा एवं अन्य पिछडा वर्ग के लोगों को नौकरियों में कम अंक प्राप्त करने पर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी प्रदान की जाती रही हैं|

 

यदि आज के सन्दर्भ में देखें तो इसी संवैधानिक प्रावधान के कारण कथित रूप से 70 प्रतिशत से अधिक अंक पाने वाले अनारक्षित वर्ग के प्रत्याशियों को नौकरी नहीं मिलती, जबकि आरक्षित वर्ग में न्यूनतम निर्धारित अंक पाने वाले प्रत्याशी को 40 या 50 प्रतिशत या कम अंक अर्जित करने वालों को सरकारी नौकरी मिल जाती है| अनराक्षित वर्ग के लोगों की राय में इस विभेद के चलते अनारक्षित वर्ग के लोगों, विशेषकर युवा वर्ग में भारी क्षोभ, आक्रोश तथा गुस्सा भी देखा जा सकता है|

 

इसके बावजूद भी मेरा मानना है कि पूर्वाग्रही, अल्पज्ञानी, मनुवादी और कट्टरपंथियों को छोड़ दें तो उक्त प्रावधानों पर किसी भी निष्पक्ष, आजादी के पूर्व के घटनाक्रम का ज्ञान रखने वाले तथां संविधान के जानकार व्यक्ति कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये, क्योंकि इस प्रावधान में सरकारी सेवाओं में हर वर्ग का समान प्रतिनिधित्व स्थापित करने का न्यायसंगत प्रयास करने का पवित्र उद्देश्य अन्तर्हित है| परन्तु समस्या इस प्रावधान के अधूरेपन के कारण है|

 

मेरा विनम्र मत है कि उक्त प्रावधान पिछड़े वर्ग के लोगों को प्रतिनिधित्व देने के लिये निर्धारित योग्यताओं में छूट प्रदान करने सहित, विशेष उपबन्ध करने की वकालत तो करता है, लेकिन इन वर्गों का सही, संवेदनशील, अपने वर्ग के प्रति पूर्ण समर्पित एवं सशक्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने पर पूरी तरह से मौन है| इस अनुच्छेद में या संविधान के अन्य किसी भी अनुच्छेद में कहीं भी इस बात की परोक्ष चर्चा तक नहीं की गयी है कि तुलनात्मक रूप से कम योग्य होकर भी अजा, अजजा एवं अ.पि.वर्ग में आरक्षण के आधार पर उच्च से उच्चतम पदों पर नौकरी पाने वाले ऐसे निष्ठुर, बेईमान और असंवेदनशील आरक्षित वर्ग के लोक सेवकों को भी क्या सरकारी सेवा में क्यों बने रहना चाहिये, जो सरकारी नौकरी पाने के बाद अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करना तो दूर अपने आचरण से अपने आपको अपने वर्ग का ही नहीं मानते?

 

मैं अजा एवं अजजा संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ (जिसके राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज हैं और इण्डियन जस्टिस पार्टी के भी अध्यक्ष है|) का राष्ट्रीय महासचिव रह चुका हूँ| अखिल भारतीय भील-मीणा संघर्ष मोर्चा मध्य प्रदेश का अध्यक्ष रहा हूँ| ऑल इण्डिया एसी एण्ड एसटी रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन में रतलाम मण्डल का कार्यकारी मण्डल अध्यक्ष रहा हूँ| अखिल भारतीय आदिवासी चेतना परिषद का परामर्शदाता रहा हूँ| वर्तमान में ऑल इण्डिया ट्राईबल रेलवे एम्पलाईज एसोसिएशन का राष्ट्रीय अध्यक्ष हूँ| इसके अलावा अजा, अजजा तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के अनेक संगठनों और मंचों से भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सम्बद्ध रहा हूँ|

 

इस दौरान मुझे हर कदम पर बार-बार यह अनुभव हुआ है कि आरक्षित वर्ग के मुश्किल से पॉंच प्रतिशत अफसरों को अपने वर्ग के नीचे के स्तर के कर्मचारियों तथा अपने वर्ग के आम लोगों के प्रति सच्ची सहानुभूति होती है| शेष पिच्यानवें फीसदी आरक्षित वर्ग के अफसर उच्च जाति के अनारक्षित अफसरों की तुलना में अपने वर्ग के प्रति असंवेदनशील, विद्वेषी, डरपोक होते हैं और अपने वर्ग से दूरी बनाकर रखते हैं| जिसके लिये उनके अपने अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क या बहाने हो सकते हैं, जैसे उन्हें अपने वर्ग का ईमानदारी से प्रतिनिधित्व करने पर अनारक्षित वर्ग के उच्चाधिकारी उनके रिकार्ड को खराब कर देते हैं| इस बात में एक सीमा तक सच्चाई भी है, लेकिन इस सबके उपरान्त भी उक्त और अन्य सभी तर्क कम अंक पाकर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी पाकर अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करने के अपराध को कम नहीं कर पाते हैं! क्योंकि सरकारी सेवा में ऐसे डरपोक लोगों के लिये कोई स्थान नहीं होता है, जो अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का ईमानदारी, निष्ठा और निर्भीकतापूर्वक निर्वहन नहीं कर सकते|

 

इस बारे में, मैं कुछ अन्य बातें भी स्पष्ट कर रहा हूँ-अजा एवं अजजा के अधिकतर ऐसे उच्च अफसर जिनके पास प्रशासनिक अधिकार होते हैं और जिनके पास अपने वर्ग को भला करने के पर्याप्त अधिकार होते हैं| अपने मूल गॉंव/निवास को छोड़कर सपरिवार सुविधासम्पन्न शहर या महानगरों में बस जाते हैं| गॉंवों में पोस्टिंग होने से बचने के लिये रिश्वत तक देते हैं और हर कीमत पर शहरों में जमें रहते हैं| अनेक अपनी जाति या वर्ग की पत्नी को त्याग देते हैं (तलाक नहीं देते) और अन्य उच्च जाति की हाई-फाई लड़की से गैर-कानूनी तरीके से विवाह रचा लेते हैं| अनारक्षित वर्ग के अफसरों की ही भॉंति कार, एसी, बंगला, फार्म हाऊस, हवाई यात्रा आदि साधन जुटाना इनकी प्राथमिकताओं में शामिल हो जाते हैं|

 

ऐसे अफसरों द्वारा अपने आरक्षित वर्ग का सरकारी सेवा में संविधान की भावना के अनुसार प्रतिनिधित्व करना तो दूर, ये अपने वर्ग एवं अपने वर्ग के लोगों से दूरी बना लेते हैं और पूरी तरह से राजशाही का जीवन जीने के आदी हो जाते हैं| इस प्रकार के असंवेदनशील और वर्गद्रोही लोगों द्वारा अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करने पर भी, इनका सरकारी सेवा में बने रहना हर प्रकार से असंवैधानिक और गैर-कानूनी तो है ही, साथ ही संविधान के ही प्रकाश में पूरी तरह से अलोकतान्त्रिक भी है| क्योंकि उक्त अनुच्छेद 16 के उप अनुच्छेद (4) में ऐसे लोगों को तुलनात्मक रूप से कम योग्य होने पर भी अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करने के एक मात्र संवैधानिक उद्देश्य से ही इन्हें सरकारी सेवा में अवसर प्रदान किया जाता है|

 

ऐसे में अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं करके, अपने वर्ग से विश्वासघात करने वालों को सरकारी सेवा में बने रहने का कोई कानूनी या नैतिक औचित्य नहीं रह जाता है| इस माने में संविधान का उक्त उप अनुच्छेद आरक्षित वर्गों को सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व प्रदान करने की भावना को पूर्ण करने के मामले में अधूरा और असफल सिद्ध हुआ है| यही कारण है कि आज भी अजा एवं अजजा वर्ग लगातार पिछड़ता जा रहा है| जबकि सरकारी सेवाओं में आरक्षित वर्गों का सशक्त और संवेदनशील प्रतिनिधित्व प्रदान करने के उद्देश्य से ही आरक्षित वर्ग के लोगों को पीढी दर पीढी आरक्षण प्रदान करने को न्याय संगत ठहराया गया है|

 

मेरा मानना है कि यदि इस सन्दर्भ में प्रारम्भ से ही संविधान में यह प्रावधान किया गया होता कि आरक्षण के आधार पर नौकरी पाने वाले लोगों को तब तक ही सेवा में बने रहने का हक होगा, जब तक कि वे अपने वर्ग का ईमानदारी से सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व करते रहेंगे, तो मैं समझता हूँ कि हर एक आरक्षित वर्ग का अफसर अपने वर्ग के प्रति हर तरह से संवेदनशील और समर्पित होता| जिससे आरक्षित वर्गों का उत्थान भी होता जो संविधान की अपेक्षा भी है और इस प्रकार से मोहन दास कर्मचन्दी गॉंधी द्वारा सैपरेट इलेक्ट्रोल के हक को छीनकर जबरन थोपे गये आरक्षण के अप्रिय प्रावधान से हम एक समय में जाकर हम मुक्त होने के लक्ष्य को भी हो भी हासिल कर पाते| जो वर्तमान में कहीं दूर तक नज़र नहीं आ रहा है!

 

अतः अब हर एक जागरूक और राष्ट्र भक्त मंच से मांग उठनी चाहिये कि जहॉं एक ओर आरक्षित वर्ग के अफसरों को सरकारी सेवाओं में अपने वर्ग का निर्भीकता पूर्वक प्रतिनिधित्व करने के लिये अधिक सशक्त कानूनी संरक्षण प्रदान किया जावे| उनका रिकार्ड खराब करने वालों को दण्डित किया जावे और इसके उपरान्त भी आरक्षित वर्ग के अफसर यदि अपने वर्ग का निष्ठा, निर्भीकता और ईमानदारी से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं तो ऐसे अफसरों को तत्काल सेवा से बर्खास्त किया जावे| यदि हम ऐसा प्रावधान नहीं बनवा पाते हैं तो आरक्षण को जरी रखकर आरक्षण के आधार पर कम योग्य लोगों को नौकरी देकर कथित रूप से राष्ट्र के विकास को अवरुद्ध करने और समाज में सौहार्द के स्थान पर वैमनस्यता का वातावरण पैदा करने को स्वीकार करने का कोई न्यायसंगत कारण या औचित्य नजर नहीं आता है|

अत: संविधान और संविधान द्वारा प्रदत्त सामाजिक न्याय की अवधारणा में विश्वाहस रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को चाहिये कि भारत सरकार को इस बात के लिये बाध्य किया जाये कि संविधान में इस बात का भी प्रावधान किया जावे कि आरक्षित वर्गों का सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से अनारक्षित वर्ग के लोगों की तुलना में कमतर होकर भी आरक्षण के आधार पर नौकरी पाने वालों को पूर्ण समर्पण और संवेदनशीलता के साथ अपने वर्ग और अपने वर्ग के लोगों का सकारात्मक प्रतिनिधित्व करना चाहिये और ऐसा करने में असफल रहने वाले आरक्षित वर्ग के वर्गद्रोही अफसरों या कर्मचारियों को सरकारी सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश करने के लिये अजा और अजजा आयोगों का संवैधानिक रूप से सशक्त किया जाना चाहिये| अन्यथा न तो कभी आरक्षण समाप्त होगा और न हीं आरक्षित वर्गों का सरकारी सेवाओं में संवैधानिक भावना के अनुसार सच्चा प्रतिनिधित्व ही स्थापित हो सकेगा|

January 26th, 2012 | 149 views | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post
Category: विधि-कानून | Tags: TO STOP RESERVATION, आरक्षण समाप्त करना है तो
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  • आर. सिंह
    R.Singh

    मुकेश जी मेरी टिप्पणी में धर्म और मजहब के साथ जाति शब्द भी जोड़ा जा सकता है,पर भारतीय या हिन्दू समाज जिन्हें आज भी अछूत समझता है ,उनके लिए जाति के नाम पर आरक्षण से इनकार नहीं किया जा सकता.ऐसे भी संविधान में केवल अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के लिए निश्चित अवधि के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था.बाद के आरक्षण तो संख्या के बल पर जबरदस्ती लिए गये हैं और ये आरक्षण औचित्य की किसी सीमा में तब तक नहीं आते जब तक इनका आधार वास्तविक पिछडापन नहीं हो,किसी धर्म मजहब या जाति को इसके लिए आधार बनाया गया हो.

    January 30 2012
    CommentsLikeUnlike
    • मुकेश चन्‍द्र मिश्र
      Mukesh Mishra

      आर सिंह जी आपने लिखा है ऐसा आरक्षण खाली हिन्दुवों को क्यों मिले जिससे यह साबित होता है की आरक्षण दूसरे धर्म के पिछड़ों को भी मिलना चाहिए, जबकि आरक्षण हिन्दू धर्म के ऊंची जातियों में ही जन्मे पिछड़े और गरीबों को नहीं मिल रहा है. अतः आप अगर ईमानदारी से कमेन्ट करते तो सायद लिखते की आरक्षण का आधार जाती या धर्म ना होकर आर्थिक पिछड़ापन होना चाहिए…..

      January 29 2012
      CommentsLikeUnlike
      • आर. सिंह
        R.Singh

        मुकेश मिश्र जी मैंने अपनी टिप्पणी में न तो मीणा जी के लेख पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और न आपके द्वारा की गयी टिप्पणी पर.मैंने प्रश्न केवल पिछड़ेपन पर किया था,जिसे मैं धर्म की सीमा से बाहर मानता हूँ.

        January 28 2012
        CommentsLikeUnlike
        • मुकेश चन्‍द्र मिश्र
          मुकेश चन्‍द्र मिश्र

          आर सिंह जी क्या ऊँची जातियों में कोई पिछड़े, गरीब या गरीबी रेखा के नीचे नहीं हैं??? अगर ऊँची जातियों के गरीबों की संख्या का अनुपात तथाकथित दलितों से कम है तो इस कारण उनकी गरीबी गरीबी नहीं है?? अगर किसी ऊँची जाती का व्यक्ति बहुत पैसे वाला या बहुत ऊँचे पदों पर है तो क्या उसकी अमीरी ऊँची जाती के गरीबों के काम आ रही है?? अगर नहीं तो सरकार द्वारा दोहरा मापदंड क्यों अपनाया जा रहा है ???

          January 28 2012
          CommentsLikeUnlike
          • आर. सिंह
            R.Singh

            एक बात तो समझ में आती है कि छूत अछूत का भेद केवल हिन्दुओं में है,अतः छुआ छूत के भेद के कारण जिन लोगों का विकास रूका हुआ है वे हिन्दू हैं,अतः इस आधार पर अगर आरक्षण मिलता है तो केवल हिन्दुओं में दलित उसके अधिकारी होते हैं,पर अगर आरक्षण उन लोगों को मिलता है जो पिछड़े तो हैं ,पर छूत अछूत के भेद भाव के शिकार नहीं है तो ऐसा आरक्षण भी केवल हिन्दुओं को ही क्यों मिले?क्या अन्य धर्मों में कोई पिछड़ा है ही नहीं.?

            January 28 2012
            CommentsLikeUnlike
            • मुकेश चन्‍द्र मिश्र
              Mukesh Mishra

              बहुत सुन्दर आँखे खोलने वाला लेख है……. उच्च वर्ग वाले अफसरों को भी आपकी बातों से सीख लेनी चाहिए यदि कोई ब्रह्मण या राजपूत का लड़का किसी दलित की बेटी के साथ बलात्कार करे और अगर न्यायाधीश ब्रह्मण या राजपूत है तो उसे अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए उस लड़के को बाइज्जत बरी कर देना चाहिए… पुलिश इंस्पेक्टर को भी चोरों को पकड़ने से पहले उससे उसका वर्ग या जाती पूछनी चाहिए अगर वो स्वजातीय हो तो उसे छोड़कर पीड़ित को जेल में डाल देना चाहिए…जितने भी मुस्लिम भारतीय फ़ौज में हैं उन्हें पाकिस्तान से युद्ध होने के समय पाकिस्तान का साथ देना चाहिए और भारत के ही फौजियों पर गोली चलानी चाहिए आखिर वो पाकिस्तानी उनके ही वर्ग या धर्म के हैं ना….. देश के प्रधानमंत्री जो की सिख हैं उनको सिखों के आलावा और किसी के बारे सोचना भी पाप समझना चाहिए….देश का क्या वो तो वैसे भी गर्त में जा ही रहा है…………. मीना जी अगर आजादी के बाद उच्च वर्ग के लोगों ने जो की पॉवर में थे आपके जैसा ही सोचा होता तो सायद आप इस तरह लिखने लायक भी न होते…खुद ही आपलोग ये भी कहते हो की जातिप्रथा ख़त्म होनी चाहिए और मनुस्मृति जलाते हो और खुद ही उसकी इतनी वकालत करते हो…. इस तरह के व्यव्हार से १००% भी आरक्षण दे दिया जाय तब भी तुम लोग वहीँ रहोगे… अगर अपने हालात बदलने हैं तो पहले अपनी सोच बदलो……

              January 27 2012
              CommentsLikeUnlike
              • sureshchandra karmarkar

                मीनाजी,आपने बहुत विस्तार से आरक्षित वर्ग के अधिकारीयों की असम्वेदन शील वृतियों को उठाया है,जैसा की आपको दीर्घ और मैदानी अनुभव है. मगर आप कोई पैमाना तो सुझाइए जो तै कर सके की फलां अधिकारी अपने वर्ग के प्रति संवेदनशील नहीं है.

                January 27 2012
                CommentsLikeUnlike
                • Anil Gupta

                  भाई मीना जी ,हाल में केंद्र सरकार ने पिछड़े वर्ग को दिए जाने वाले आरक्षण में से ४.५% कोटा अल्पसंख्यकों(मुस्लिमों) को देने की घोषणा की है. अब अनुसूचित वर्ग के आरक्षण में से भी मतांतरित लोगों( जो ईसाई या मुस्लिम हो गए हैं) को शामिल करने की चर्चा चल रही है और इस बात की पूरी सम्भावना है की वोट बेंक की खातिर केंद्र सरकार मुस्लिमों और ईसाईयों को भी अनुसूचित वर्ग में शामिल कर लेगी. तथा उनके कोटे में से उन्हें भी आरक्षण दिया जायेगा. मीना जी कृपया इस बिंदु पर अपने विचारों से अवगत करने का कष्ट करें

                  January 27 2012
                  CommentsLikeUnlike

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                    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
                    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

                    आस्तिक हिन्दू! तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष मेहनत-मजदूरी जंगलों व खेतों में, 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे और 20 वर्ष 09 माह 05 दिन दो रेलों में सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्‍लेषक, टिप्पणीकार, कवि और शोधार्थी! छोटे बच्चों, कमजोर व दमित वर्गों, आदिवासियों और मजबूर औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक समाचार-पत्र "प्रेसपालिका" का सम्पादक! 1993 में स्थापित और वर्तमान में देश के 18 राज्यों में सेवारत राष्ट्रीय संगठन ‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (बास-BAAS) का मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष!
                  • संपादक की कलम से…

                  • विधानसभा चुनाव पर विशेष

                    • अब तो विधानसभा चुनाव के बाद ही तस्वीर होगी साफ़
                    • कांग्रेस, सपा और बसपा एक ही थैली के चट्टे-बट्टे : राजनाथ सिंह
                    • युवराज अभी कागज फाड़ रहे हैं कुछ समय बाद कपड़े फाड़ेंगे : गडकरी
                    • दलितों के विकास का धन हाथी के निर्माण में खर्च किया : कटियार
                    • चुनाव परिणामों पर टिकी दिग्गजों की निगाह
                    • भाजपा के पक्ष में चल रही है लहर : सुषमा स्‍वराज
                    • बसपा शासन में सर्वजन दुखाय, सर्वजन सताय का बोलबाला रहा : उमा भारती
                    • उत्तर प्रदेश की बदहाली के लिए बसपा, सपा और कांग्रेस की तिकड़ी जिम्मेदार : राजनाथ
                    • अछूत बने ब्राह्मणों की चुप्पी
                    • चुनावी नतीजों से पहले उत्तराखंड की राजनीति में चल रही है बर्फीली हवाएं
                    • एम के गॉंधी के-निष्ठुर, हृदयहीन तथा धोखेभरे निर्णयों को सहना ही होगा!
                    • राहुल गांधी ने अवसर गंवा दिया
                    • जनता बसपा, सपा, कांग्रेस की सरकारों से बहुत प्रताड़ित हो चुकी है- कलराज मिश्र
                    • उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव २०१२ की चकल्लस और मतदाता
                    • भाजपा ने 2.जी स्पेक्ट्रम आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया
                    • सूबे का विकास करना सपा-बसपा और कांग्रेस के बूते की बात नहीं : कलराज मिश्र
                    • कांग्रेस का भ्रष्टाचार मुक्त सुशासन की बात जनता के लिए धोखा : कलराज मिश्र
                    • पिछड़ों के कोटे से आरक्षण को कतर्इ नहीं बर्दाश्त करेगी भाजपा- नितिन गडकरी
                    • केन्द्र और प्रदेश सरकार ने जनता का शोषण किया है : राजनाथ सिंह
                    • ‘मुलायम सिंह यादव का बलात्कार पीड़ित महिलाओं को नौकरी देना समूची नारी जाति का अपमान’
                  • पाठकों से निवेदन

                    सुधी लेखकों से निवदेन है अपनी रचनाएं यूनिकोड (मंगल) फोंट में भेजें और साथ ही संबंधित तस्‍वीर भी हमें भेजेंगे तो उसे प्रकाशित करने में सुविधा होगी।

                    लेखों के त्‍वरित प्रकाशन के लिए हमें आप SMS के जरिए तत्‍काल सूचना दे सकते हैं : 09868964804 (sanjeev.sinha78@gmail.com)

                  • लोकतांत्रिक विमर्शों का मंच

                    प्रवक्‍ता डॉट कॉम भारतीय परंपरा की जान 'शास्त्रार्थ' का आधुनिक स्‍वरूप है, जहां विभिन्‍न विचारधाराओं के लोग एक ही मंच पर बेहतर लोकतांत्रिक समाज के लिए विचार-विमर्श करते हैं।

                  • जरूर पढ़ें

                    • तसलीमा नसरीन का कसूर
                    • हिन्दी समाचार पत्रों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रस्तुति का अध्ययन
                    • ॥अमृत भाषा संस्कृत॥- डॉ. मधुसूदन उवाच
                    • किसका वोट-बैंक / शंकर शरण
                    • आरक्षण समानता और सुरक्षा के मन्त्र नहीं.
                    • क्यों और कैसे लिखा मैंने – कहो कौन्तेय
                    • वे जो हर सांस में भारत को ही जीते हैं
                    • सभी धर्मों में एक ही बात नहीं
                    • हिंदी लेखन, विचारधारा और इतिहास बोध
                    • बाबा माधवदास की वेदना : शंकर शरण
                    • द्वितीय प्रवक्‍ता लेख प्रतियोगिता के परिणाम घोषित
                    • प्रवक्‍ता डॉट कॉम द्वारा आयोजित द्वितीय लेख प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा 5 दिसम्‍बर को
                    • प्रवक्ता डॉट कॉम द्वारा लेख प्रतियोगिता का आयोजन
                    • तीन साल का हो गया ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’
                    • ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ बना वैकल्पिक वेबसाइटों का सिरमौर
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                  • स्‍वास्‍थ्‍य-योग

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