शख्सियत समाज

सेवा की मिसाल बना पंजाब के एक गांव से निकला संन्यासी

अमरपाल सिंह वर्मा


पंजाब के एक छोटे से गांव से निकले एक साधारण युवक ने संन्यास का मार्ग चुना और राजस्थान में पहुंच कर भक्ति के साथ जन सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। उसने अपने तप, त्याग व करुणा से हजारों-लाखों लोगों की जिंदगी में उजाला भर दिया। आज वही युवक संत स्वामी ब्रह्मदेव के नाम से जन-जन की श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। गणतंत्र दिवस पर केन्द्र सरकार ने उन्हें पदमश्री प्रदान करने की घोषणा की है। उन्हें यह सम्मान देने की घोषणा केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है बल्कि उस विचारधारा पर मुहर है, जिसमें सेवा को साधना और मानवता को धर्म माना जाता है।

 
पंजाब के मोगा जिले की निहाल सिंह वाला तहसील में एक छोटासा गांव है-रौंता। इस गांव से एक दिन एक युवक निकला लेकिन उसने दुनिया से कुछ पाने का नहीं बल्कि दुनिया को कुछ लौटाने का रास्ता चुना। यह युवक आगे चलकर स्वामी ब्रह्मदेव के नाम से विख्यात हुआ। स्वामी ब्रह्मदेव ने संन्यास लिया लेकिन समाज से मुंह नहीं मोड़ा। उन्होंने पूजा-पाठ के साथ-साथ पीडि़त मानवता की पीड़ा को देखा। उन्होंने 1963 में जब अमृतसर में श्री दुग्र्याना मंदिर में अंध विद्यालय को देखा तो ऐसा ही कोई काम करने का संकल्प किया। अपनी शिक्षा पूर्ण कर वह 1978 में राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक मंदिर में आए। यहीं से शुरू हुई श्री जगदंबा अंध विद्यालय की कहानी। शुरुआत बहुत साधारण थी। कोई बड़ी इमारत नहीं, कोई सरकारी मदद नहीं। थे तो बस कुछ अच्छे लोग और स्वामी जी का अटूट भरोसा। जन सहयोग से रोपा गया एक छोटा सा पौधा। किसी ने नहीं सोचा था कि यही पौधा एक दिन वटवृक्ष बन जाएगा।


वर्ष 1980 में  उन्होंने जगदम्बा अंध विद्यालय की आधारशिला रखी। जगदम्बा अंध विद्यालय की शुरुआत केवल एक बच्चे और एक शिक्षक के साथ हुई थी लेकिन आज वह वटवृक्ष बन चुका है। बीते साढ़े चार दशकों में उन्होंने सात हजार से ज्यादा दृष्टिबाधित बच्चों को शिक्षित किया है। मूक-बधिर बच्चों के लिए चार दशक से स्कूल भी चल रहा है। स्वामी ब्रह्मदेव ने बच्चों को सिर्फ पढ़ाया नहीं बल्कि उन्हें जीना भी सिखाया। नेत्रहीन और मूक-बधिर बच्चों के हाथ में हुनर दिया, साथ में आत्म विश्वास भी दिया। आज उस विद्यालय से पढ़े अनेक बच्चे अपने पैरों पर खड़े हैं।

  
 स्वामीजी यहीं नहीं रुके। उन्होंने देखा कि बहुत से लोग ऐसे हैं जो जन्म से अंधे नहीं हैं, बस आर्थिक संकट के कारण इलाज नहीं करा पाए। गरीबी ने उनकी आँखों से रोशनी छीन ली। यहीं से शुरू हुआ मोतियाबिंद ऑपरेशन का काम। वर्ष 1993 में स्थापित श्री जगदम्बा आई हॉस्पिटल  में निरंतर मोतियाबिंद के ऑपरेशन होते हैं। अब तक साढ़े चार लाख से ज्यादा जरूरतमंद लोगों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन कर उनकी आंखों की रोशनी बचाई जा चुकी है। साढ़े चार लाख का यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है। यह साढ़े चार लाख घरों में लौटी उम्मीद है। स्वामी ब्रह्मदेव ने समाज को एक और गहरी बात सिखाई है, वह है मरणोपरांत नेत्रदान। उन्होंने लोगों को समझाया कि मौत के बाद भी किसी की जिंदगी रोशन की जा सकती है। धीरे-धीरे यह बात लोगों के दिलों में उतरती गई। सालों से संस्था के जरिए नेत्रदान करा कर जरूरतमंदों को नेत्र प्रत्यारोपित किए जाते हैं।


स्वामी ब्रह्मदेव का जीवन दिखावे से दूर रहा है। वह कथा-कीर्तन करते हैं, चढ़ावे में आया धन सेवा में लगा देते हैं। न कोई शोर, न कोई प्रचार। आज भी वही सादा वेश, वही सरल बोलचाल। वे खुद संस्था में मौजूद रहते हैं, काम देखते हैं, लोगों से मिलते हैं। उनके लिए सेवा कोई परियोजना नहीं है, जीवन का स्वभाव है। पदमश्री मिलने के बाद भी उन्होंने इसका श्रेय खुद नहीं लिया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान प्रभु की कृपा और जनता के नि:स्वार्थ सहयोग का प्रतिफल है।

 
स्वामी ब्रह्मदेव को पदमश्री अवार्ड केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है। यह उन हजारों लोगों की मुस्कान का सम्मान है जिनकी आंखों में कभी अंधेरा था और आज उजाला है। स्वामी ब्रह्मदेव की कहानी जितनी श्रीगंगानगर के लिए महत्वपूर्ण है, उतनी पंजाब के लिए खास है क्योंकि यह किसी बड़े शहर की नहीं, किसी रसूखदार परिवार की नहीं बल्कि यह रौंता गांव में एक साधारण के घर जन्मे बेटे की कहानी है। यह उस पंजाब की कहानी है जहां से उठकर लोग पूरे देश की तकदीर में उजाला भर देते हैं। आज स्वामी ब्रह्मदेव पर पूरा देश गर्व कर रहा है। वजह है कि उनकी कहानी बेहद सच्ची और पवित्र है। उनकी कहानी में दिखावा नहीं है। जहां दिखावा नहीं होता, वहीं असली रोशनी होती है।

अमरपाल सिंह वर्मा