विश्ववार्ता

वैश्विक तबाही और बदलाव लाने वाला युद्ध

राजेश कुमार पासी

अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला करते हुए जो सोचा था, हालात उससे कहीं ज्यादा बदतर हो गए हैं। अमेरिका ने ईरान के लिए जो रणनीति बनाई थी, वो पूरी तरह से गलत साबित हुई है। हालात तो ऐसे हो गए हैं कि अमेरिका के लिए इस युद्ध को बंद करना भी मुश्किल हो रहा है। अमेरिका देख रहा है कि ये युद्ध उसे भारी पड़ने वाला है लेकिन विश्वशक्ति होने का गुमान ऐसा है कि वह इस सच को स्वीकार भी नहीं कर सकता। वो चाहता है कि ईरान घुटने टेक दे ताकि युद्ध बंद हो जाये लेकिन ईरान की ऐसा करने की मंशा दिखाई नहीं दे रही है।

डोनाल्ड ट्रंप ने जब हमला किया था तो कहा था कि वो ईरान की जनता के लिए युद्ध कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ईरान को एक बार फिर महान देश बनाएंगे।  सवाल यह है कि ईरान को पूरी तरह से बर्बाद करने के बाद वो उसे कैसे महान बनाएंगे। क्या वो लीबिया, इराक, सीरिया और अफगानिस्तान की तरह ही ईरान को भी महान देश बनाना चाहते हैं। दूसरा सवाल यह है कि अमेरिका कब से इतना महान देश हो गया कि वो दूसरे देशों को महान बनाने चल पड़ा है। अमेरिका एक स्वार्थी देश है जो पूरी दुनिया के संसाधनों का इस्तेमाल करने के लिए साजिश करता रहता है।  अभी कुछ दिन पहले ही अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाकर वहां अपनी कठपुतली सरकार बिठा दी है। इसके बाद उसने वेनेजुएला के क्रूड ऑयल पर कब्जा कर लिया है और पूरी दुनिया में उसको बेचने की तैयारी कर रहा है। ईरान को लेकर भी उसकी कुछ ऐसी ही योजना थी, लेकिन वो सफल होती दिखाई नहीं दे रही है। इजराइल का मकसद अलग था, वो ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है, जो कि पूरी तरह से निर्मूल नहीं है। ईरान की सोच है कि इजराइल दुनिया में होना ही नहीं चाहिए, वो एक दिन इजराइल को खत्म कर देगा। ईरान अपनी जनता के हितों को अनदेखी करके सैन्य तैयारियों पर बहुत ज्यादा खर्च कर रहा है। इस युद्ध ने दिखा दिया है कि इजराइल का डर गलत नहीं है। जितनी ताकत ईरान ने इकठ्ठा कर ली है, वो इजराइल के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी है। 

               इजराइल अपनी सुरक्षा के लिए ये युद्ध लड़ रहा है, इसलिए उसे गलत नहीं कहा जा सकता। जो देश उसके अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गया है, उसके खिलाफ कार्यवाही करना उसका अधिकार है। सवाल यह है कि इसका उपाय क्या ईरान के साथ युद्ध करना ही था। जब अमेरिका ईरान से बातचीत कर रहा था तो बातचीत के दौरान ही उस पर हमला क्यों किया गया। ये हमला इसलिए भी गलत है, क्योंकि ईरान ज्यादातर मांगो को मानने के लिए तैयार हो गया था। इजराइल और अमेरिका का कहना था कि ईरान को परमाणु बम नहीं बनाना चाहिए, इसके लिए ईरान तैयार हो गया था। इजराइल के पास परमाणु बम है, इसलिए बिना परमाणु बम के ईरान इजराइल को खत्म नहीं कर सकता, इसलिए ये हमला पूरी तरह से गैर-जरूरी था।

ऐसा नहीं हो सकता कि अमेरिका ने सिर्फ इजराइल की मदद के लिए इतना बड़ा युद्ध शुरू किया हो, उसके अपने स्वार्थ जुड़े हुए हैं। ये स्वार्थ ईरान के तेल के अलावा और कुछ नहीं है। इजराइल ने डर और अमेरिका ने अपने लालच में आकर पूरी दुनिया को खतरे में डाल दिया है। इनकी गलती का खामियाजा अब पूरी दुनिया भुगतने वाली है। गरीब देशों के लिए अपनी अर्थव्यवस्था भी चलाना मुश्किल होने वाला है क्योंकि क्रूड ऑयल की कीमतों में आग लगने जा रही है। जिन देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत है, वो तो किसी तरह संभल जाएंगे लेकिन एशिया और अफ्रीका के गरीब देशों की जनता को भुखमरी का सामना करना पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि ईरान ने हारमुज स्ट्रेट का रास्ता बंद कर दिया है, जहां से खाड़ी देशों का तेल पूरी दुनिया में जाता है। इस रास्ते के बंद होने के बाद तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी होने वाली है और ये शुरू भी हो गई है। 9 मार्च को क्रूड ऑयल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल पर चली गई है, जो कि अभी सिर्फ शुरुआत है। कुछ अर्थशास्त्री इसके 200 डॉलर तक पहुंचने की आशंका जता रहे हैं। 

              ईरान को दोनों देश मिलकर पूरी तरह से बर्बाद करने पर उतारू हो गए हैं क्योंकि ईरान ने आक्रामक रूप से इजराइल और अरब देशों के अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमला किया है। दोनों देशों की उम्मीद से कहीं ज्यादा भयानक रूप से ईरान द्वारा हमले किये गए हैं। ईरानी हमलों को रोकने में इजराइल की वायु सुरक्षा प्रणाली असफल हो रही है। ऐसे ही अमेरिका की वायु सुरक्षा प्रणाली अरब देशों की सुरक्षा करने में नाकाम साबित हो रही है। दोनों देशों को अपनी वायु रक्षा प्रणाली पर इतना घमंड था कि वो ईरान की सैन्य तैयारियों की अनदेखी कर गए। थोड़े-बहुत नुकसान की आशंका रही होगी लेकिन अमेरिका को अंदाजा नहीं था कि ईरान उसके सैन्य अड्डो को अरब देशों से खत्म कर देगा। ईरान ने न केवल अमेरिकी अड्डों को निशाना बनाया है, बल्कि अमेरिकी दूतावासों पर भी हमले किये हैं। इसके अलावा वो अरब देशों की अर्थव्यवस्था को भी बर्बाद करने की कोशिश में लग गया है। अब वो अरब देशों में हवाई अड्डों, बड़े भवनों, तेल रिफाइनरी और तेल डिपो पर हमले कर रहा है। दोनों देशों ने इससे परेशान होकर ईरान की तेल  रिफाइनरी और तेल डिपो पर हमला किया है।

मीडिया रिपोर्ट बता रही हैं कि दोनों देशों ने ईरान के जल भंडारण पर भी हमला किया है। ईरान समुद्री पानी को शुद्ध करके इस्तेमाल करता है तो अन्य अरब देशों की भी यही हालत है। इन देशों के पास पानी नहीं है, इसलिए ये देश अपनी जरूरत का 70-100 तक पानी इसी तरह से प्राप्त करते हैं। बिना तेल के शायद ये देश चल जाएं लेकिन बिना पानी के इन देशों की जनता प्यासी मर जाएगी। जहां ईरान के जल केंद्रों पर दोनों देश हमला कर रहे हैं तो ईरान इसके जवाब में अरब देशों के जल केंद्रों पर हमले कर रहा है। देखा जाए तो ये युद्ध बहुत भयानक रूप लेता जा रहा है। अगर सच में अरब देशों और ईरान में पानी बर्बाद कर दिया जाता है तो इन देशों की जनता को कौन बचायेगा। दूसरी तरफ तेल रिफाइनरी और तेल स्त्रोतों पर हमले हुए तो दुनिया की ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी होंगी। धीरे-धीरे अरब देश तेल उत्पादन बंद करते जा रहे हैं क्योंकि तेल भेजने का रास्ता बंद हो गया है। इस युद्ध के खत्म हो जाने के बाद भी तेल उत्पादन शुरू होने में बड़ा वक्त लगेगा, अभी ये भी पता नहीं है कि युद्ध कब खत्म होगा। 

               भारत जैसे देशों का क्या होगा जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही आयातित तेल पर टिकी हुई है। भारत ने अभी से इसकी वैकल्पिक व्यवस्था करनी शुरू कर दी है, लेकिन क्या सभी इसमें सफल नहीं हो पाएंगे। देखा जाए तो दुनिया बड़ी तबाही की ओर जा रही है। इसे रोकने का कोई रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा है। अमेरिका और इजराइल किसी के रोकने से रुकने वाले नहीं हैं और जब तक ये नहीं रुकेंगे तब तक ईरान भी नहीं रुकेगा। ये युद्ध अब ईरान की बर्बादी पर ही रुकेगा क्योंकि उसकी हथियार डालने की मंशा नहीं है। ईरान की बर्बादी तक अरब और इजराइल में बहुत बर्बादी होने वाली है। ये युद्ध पूरे वैश्विक परिदृश्य को बदलने वाला है। अमेरिका बेशक ये युद्ध जीत जाए, लेकिन उसकी सारी हेकड़ी ईरान ने निकाल दी है। अरब देशों की दी गई उसकी सुरक्षा गारंटी फेल हो गयी है, वो उनकी सुरक्षा छोड़कर अपनी सुरक्षा में लगा हुआ है।

ईरान के बर्बाद होने तक इजराइल भी आधे से ज्यादा खत्म हो सकता है। अमेरिका की इस युद्ध ने ऐसी हालत कर दी है कि इसके बाद उसके लिए कोई दूसरा बड़ा युद्ध लड़ना मुश्किल होने वाला है। हो सकता है कि ये अमेरिका का आखिरी बड़ा युद्ध हो क्योंकि अमेरिकी जनता को इस युद्ध की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसके बाद अमेरिका की जनता शायद ही अपने किसी शासक को इतने बड़े युद्ध में जाने की इजाजत दे। अरब देशों को इस युद्ध के बाद अपनी सुरक्षा के लिए नए रास्ते ढूंढने होंगे। ये देश अभी तक अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर थे लेकिन इस युद्ध ने बता दिया है कि सुरक्षा के मामले में सबको आत्मनिर्भर होना चाहिए। ईरान के प्रति अभी मुस्लिम जगत में सहानुभूति की लहर है, लेकिन वो जिस तरह से अरब देशों को निशाना बना रहा है, उससे ये युद्ध शिया बनाम सुन्नी बन सकता है। अभी तक ईरान इन देशों में सिर्फ अमेरिकी अड्डों और दूतावासों को निशाना बना रहा था, लेकिन अब उसने इन देशों के नागरिक ठिकानों पर हमले शुरू कर दिए हैं। अगर ऐसा चलता रहा तो ये देश ईरान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर सकते हैं।

 अगर ये युद्ध अरब बनाम ईरान बना तो मुस्लिम जगत की नई मुसीबत शुरू हो जाएगी। धीरे-धीरे हालात ऐसे बन रहे हैं कि पूरी वैश्विक राजनीति बदल सकती है। ये युद्ध जल्दी खत्म होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है, ये सबसे बड़ा खतरा है। हमें ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि ये युद्ध जल्दी ही खत्म हो जाये। ये युद्ध जितनी जल्दी खत्म हो, दुनिया के लिए उतना अच्छा है। बड़ी महामारी और बड़े युद्ध बदलाव लाते हैं। जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध और कोरोना ने दुनिया को बदला है, ऐसे ही ये युद्ध वैश्विक परिदृश्य को बदलने वाला दिखाई दे रहा है। 

राजेश कुमार पासी