उम्मीदों के अखिलेश !

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एस. के. चौधरी

उत्तर प्रदेश की जनता ने तमाम दावों को खोंखला साबित कर समाजवादी पार्टी को जिस तरह से प्रचंड बहुमत दिया हैं, उससे दो बातें साफ हो गई हैं पहला लोगों को बसपाईयों की गुंडई मंजुर हैं, लेकिन घुस देने के बाद भी अपनी बेइज्जती नहीं, दुसरी राजनीति और राजनेता भले ना बदलें लेकिन अब जनता उन्हे अपनी औकात जरुर दिखाएगी जैसा की बंगाल मे लेफ्ट बिहार मे लालू और अब यूपी मे तमाम दलों को मुहं की खानी पडी हैं । यूपी अब अखिलेश के हवाले है। लोग उनसे नई क्रांति की उम्मीद लगा बैठे हैं। 2007 में लोगों ने ये मौका मायावती को दिया था। लेकिन वो अपने घर में ही क्रांति के मोह में ऐसा फंसीं कि सत्ता ही गंवा बैठीं। लोगों को लगा था कि यूपी बिहार की राह पर चलेगा। यूपी देश के उन चंद राज्यों में से है जिसने आर्थिक विकास की बस बहुत पहले ही मिस कर दी थी। जब दूसरे राज्य तरक्की कर रहे थे तब यूपी, बिहार जाति की गुलामी में फंस सामाजिक क्रांति का नारा बुलंद कर रहे थे। अखिलेश यादव ने लोगों को भरोसा दिया की सपा पर लगी गुंडई का दाग को वो खुद साफ करेंगे और चुनाव के दौरान ना सिर्फ डीपी यादव का विरोध किया बल्की उनकी पैरवी करने वाले मोहन सिंह को भी अपना पद छोड़ना पडा, लोगों ने माया के भ्रष्टाचार के विकल्प के रुप मे अखिलेश पर भरोसा किया और भारी बहुमत से समाजवादी पार्टी को वोट दिया नतीजों ने अखिलेश को यह अहसास कराया की युपी को उनसे कितनी उम्मीदें हैं, युपी के सबसे युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उर्फ भैया जी के पास जितनी चुनौतियां हैं उससे कहीं ज्यादा उनके लिए अवसर भी हैं, अब अखिलेश के हाथ मे हैं कि वो किस तरह से इस अवसर को भूनाते हैं लखनऊ के रास्ते दिल्ली पहुंच पाते हैं या नहीं । आज युपी से अच्छे हालात बिहार के हैं क्योंकी नीतिश कुमार ने मिले मौके को इस तरह भूनाया कि जनता ने उन्हे दोबारा सत्ता पर काबिज किया साथ हीं लालू यादव और रामविलास पासवान को बिहार की राजनैतिक जमीन से बेदखल कर दिया । नीतिश कुमार के शासन से पहले बिहार जाति और धर्म की राजनीति में इस कदर उलझे रहे कि आगे की सोचने की जगह पीछे होते गए।बिहार में लालू यादव ने जातिवाद का झंडा बुलंद कर रखा था लालू को ये यकीन था कि जब तक पिछड़ी जातियां और मुसलमान उनके साथ हैं उन्हें कोई हरा नहीं सकता। हुआ भी काफी कुछ यही। दिग्विजय सिंह की तरह लालू कहते भी थे कि विकास से चुनाव नहीं जीते जाते। उनका भी यही मानना था कि चुनाव जितना ‘राजनीति-का-कमाल’ है। लालू यादव 2005 के बाद से बियाबान भोग रहे हैं, ठिक उसी तरह जैसे 2003 के बाद दिग्विजय सिंह का वनवास शुरु हुआ था जो अभी तक खत्म नही हुआ हैं । लालू के शासन काल को “जंगलराज” का नाम दिया गया प्रदेश की सड़कें गढे मे तब्दील होई, दिन दहाड़े हत्या, बलात्कार और अपहरण की घटनाएं इस कदर बढ़ीं कि लोगों ने अंधेरा होते ही घरों से बाहर निकलना बंद कर दिया। गुडों के खौफ के चलते भारी संख्या में लोग बिहार से पलायन कर गए। लोगों को दुसरे प्रदेश मे जिल्लत की जिंदगी मंजुर लेकिन यहां का जंगलराज नही ।लोग बिहार का कहलाने पर शर्म महसूस करने लगे। ।बिहार को एक नेता की तलाश थी। नीतीश में उसे वो नेता मिला। अच्छी बात ये हुई कि ये नेता भी पिछड़ी जाति का ही था। नीतीश ने सरकार में आते ही बिहार की इमेज बदलने का काम किया। बिहार अब गुंडई अपहरण और जोकरई की जगह विकास के लिए जाना जाने लगा। दुकानें देर रात तक खुलने लगीं, लड़कियां अंधेरा होने के बाद भी साइकिल पर सवार होकर निकलने लगीं। सड़कों की हालत सुधरी, और पंजाब, दिल्ली और मुंबई गए लोग वापस आने लगे। बिहार की तरह युपी ने भी अखिलेश को एक मौका दिया । इससे पहले मायावती को सरकार मे लाने का श्रेय मुलायम सिंह को ही जाता हैं, लोगों का जीना दूभर हो गया। लोग यूपी छोड़कर भागने लगे। 2007 मे लोगों ने तय कर लिया था कि किसी भी हालत में मुलायम को हटाना है। उसने मायावती को सत्ता पर बिठाया । मायावती ने गुंडाराज से निजात तो दिलाई लेकिन भ्रष्टाचार से पुरा यूपी त्राहिमाम करने लगा । बलीया से लेकर नोएडा तक भ्रष्टाचार के किस्से आम हो गए, यहां तक शाम की कच्ची शराब को भी नहीं बख्शा गया। नेता से लेकर मंत्री तक सबने जमकर लुटमार मचाई , आलम ये था कि घुस देने के बाद भी लोगों का काम नही होता था, लोग घुस देने के बाद भी दफ्तरों के चक्कर काटने और बाबुओं तथा अधिकारियों की गाली सुनने को मजबूर थे, कहीं कोई सुनवाई नहीं थी । 2012 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने 2007 से सबक लेकर अखिलेश को आगे किया। अखिलेश ने गुंडाराज से छुटकारा पाने का भरोसा दिया तो यूपी को उम्मीद की नई किरण दिखी। लोगो ने अखिलेश के भरोसे फिर से सपा को सता दिया ।

अगर मायावती ने 2007 के जनादेश को अपने अहंकार और लालच में गंवाया न होता तो वो नीतीश की तरह ही 2012 की सरकार भी वहीं बनातीं। अफसोस इस बात का कि वो ऐतिहासिक मौका गंवाने के बाद भी कोई भरोसा नहीं देती कि वो बदली हैं। 6 जुन के प्रेस कांफ्रेंस मे वही गुरूर, वही दंभ दिखा। लेकिन अखिलेश को बदलना होगा। इतिहास ने उन्हें वो मौका है कि इतनी छोटी उम्र में वो इतिहास पुरुष बन सकते हैं बशर्ते वो नीतीश की तरह विकास का नया मॉडल दें। हालांकी अखिलेश के आगे बहुत सारी चुनौतियां हैं लेकिन फैसले लेने मे कोई मजबुरी नहीं होनी चाहीए, समाजवादी पार्टी को सबसे पहले अपने चाल चरित्र और चेहरा बदलने की जरुरत हैं जो कि अखिलेश ने चुनाव के दौरान भरोसा दिलाया था । क्योंकी सपाइयों की सबसे बड़ी कमी हैं कि वे ना तो किसी नीयम को मानते हैं ना कानुन को, जैसा की चुनाव नतीजे आने के बाद हीं यूपी के कई हिस्सो मे देखने को मिली, राजा भैया जैसे नेता को मंत्रीमंडल मे शामिल करना राजनीतिक मजबूरी तो नहीं कह सकते क्योंकी सपा के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत था फिर भी अखिलेश को ऐसे लोगो से सतर्क रहना होगा अगर वाकई पार्टी के उपर लगे दाग को धोना हैं । यूपी में कानून व्यवस्था की बुरी हालत के कारण पूंजी निवेश और उद्योगपति इस राज्य की तरफ देखना नहीं चाहते। सबसे पहले उन्हें राज्य की इस छवि को बदलना होगा। औद्योगिकी करण के साथ राज्य के इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करना होगा, बिजली सुधार और सड़क निर्माण में युद्ध स्तर पर काम करना होगा। दूसरे, यूपी को सिर्फ नोएडा और ग्रेटर नौएडा और गाजियाबाद की नजर से भी देखना बंद करना होगा। तीसरे, भ्रष्टाचार से निपटने के लिए न केवल बेहद कड़े कानून बनाने होंगे बल्कि उत्तराखंड और कर्नाटक की तर्ज पर लोकायुक्त की नई संस्था भी खड़ी करनी होगी। क्योंकी जनता ने चुनावी पंडितों के सभी पूर्वानुमानों को झुठलाते हुए प्रदेश में पूर्ण बहुमत से समाजवादी पार्टी की सरकार को चुना हैं । अखिलेश से जितनी उम्मीदें यूपी को हैं उस पर खडा होना अखिलेश के लिए कोई मुश्किल काम नहीं हैं बशर्ते की वो राजनीतिक मजबूरीयों और कांप्रोमाइज से उपर उठकर कुछ कड़े फैसले लेने पड़ेंगें यूपी में अपार क्षमता है बस उसे सही दिशा की जरूरत है। क्या वो अखिलेश दे पाएंगे? मुझे यकीन है। इतिहास बार-बार ऐसे मौके नहीं देता।

 

2 COMMENTS

  1. नेम सिंह जी से सहमति|
    एक सच्चाई जोड़ता हूँ|
    ===गुजरात की पार दर्शक १०० प्रति शत सच्चाई जो उड़कर टाइम मेगेजिन के आवरण पृष्ठ पर जा बैठी|
    वह है भारत भक्त गिरनार सिंह “नरेंद्र मोदी”|
    उनकी लेखा बही से एकाध पन्ना चुरा लो, यदि इमानदारी और साहस हो तो?
    अब गुजरात ने माप दंड बदला है| इसी नाप पर आपको काम करना होगा|

  2. यूपी में कानून व्यवस्था की बुरी हालत के कारण पूंजी निवेश और उद्योगपति इस राज्य की तरफ देखना नहीं चाहते। सबसे पहले उन्हें राज्य की इस छवि को बदलना होगा। औद्योगिकी करण के साथ राज्य के इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करना होगा, बिजली सुधार और सड़क निर्माण में युद्ध स्तर पर काम करना होगा। दूसरे, यूपी को सिर्फ नोएडा और ग्रेटर नौएडा और गाजियाबाद की नजर से भी देखना बंद करना होगा। तीसरे, भ्रष्टाचार से निपटने के लिए न केवल बेहद कड़े कानून बनाने होंगे बल्कि उत्तराखंड और कर्नाटक की तर्ज पर लोकायुक्त की नई संस्था भी खड़ी करनी होगी। क्योंकी जनता ने चुनावी पंडितों के सभी पूर्वानुमानों को झुठलाते हुए प्रदेश में पूर्ण बहुमत से समाजवादी पार्टी की सरकार को चुना हैं ।

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