विश्ववार्ता

मुनरो सिद्धांत की ओर झुकती अमेरिकी विदेश नीति

डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र

3 जनवरी 2026 की शुरुआत में वेनेजुएला में एक अत्यन्त नाटकीय घटनाक्रम सामने आया जब अमेरिका ने बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई करते हुए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर देश से बाहर ले जाने की घोषणा की। अमेरिकी प्रशासन के अनुसार यह कार्रवाई नार्को-आतंकवाद, मादक पदार्थों की तस्करी और गंभीर आपराधिक गतिविधियों से जुड़े आरोपों के आधार पर की गई तथा इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक बताया गया। कार्रवाई के दौरान राजधानी काराकस और आसपास के क्षेत्रों में हवाई हमले और विशेष बलों की त्वरित छापेमारी की खबरें सामने आईं। दूसरी ओर, वेनेजुएला सरकार ने इस कदम को देश की संप्रभुता पर सीधा हमला और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार दिया। सरकार समर्थक वर्ग ने इसे विदेशी आक्रमण बताया जबकि कुछ विपक्षी समूहों ने मादुरो शासन के अंत की सम्भावना के रूप में देखा। इस घटनाक्रम ने पुनः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शक्ति राजनीति, संप्रभुता और सैन्य हस्तक्षेप को लेकर व्यापक बहस को भी जन्म दिया है।

वस्तुतः समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक बार फिर इस सच्चाई को रेखांकित कर रही है कि वैश्विक व्यवस्था मूलतः शक्ति, हित और सुरक्षा के तर्क पर संचालित होती है। इस संदर्भ में हंस जे. मॉर्गेंथाऊ का यथार्थवादी सिद्धांत विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है। मॉर्गेंथाऊ के अनुसार अंतरराष्ट्रीय राजनीति शक्ति के लिए संघर्ष है और राष्ट्रीय हित ही विदेश नीति का मूल आधार होता है। वे कहते हैं कि राष्ट्र अपने हितों को शक्ति की भाषा में परिभाषित करते हैं और नैतिकता को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पूरी तरह लागू नहीं किया जा सकता। मॉर्गेंथाऊ यह भी स्वीकार करते हैं कि नैतिकता का अस्तित्व है, लेकिन वह राष्ट्रीय हित से ऊपर नहीं हो सकती। वेनेजुएला में अमेरिका की कार्रवाई को इसी यथार्थवादी नजरिए  से देखा जा सकता है। एक और विंदु जिसकी तरफ ध्यान आकृष्ट किया जाना चाहिए वो है अमेरिका की विदेश नीति में मुनरो सिद्धांत की ओर बढ़ता झुकाव।

1823 में अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो द्वारा प्रतिपादित मुनरो सिद्धांत का मूल उद्देश्य पश्चिमी गोलार्ध को यूरोपीय उपनिवेशवाद और हस्तक्षेप से मुक्त रखना था। उस समय यह सिद्धांत अमेरिका की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्वायत्तता से जुड़ा हुआ था। धीरे-धीरे यह विचार अमेरिका के लिए लैटिन अमेरिका में प्रभाव बनाए रखने का वैचारिक आधार बन गया। शीत युद्ध के दौर और उसके बाद भी अमेरिका ने इस क्षेत्र को अपने रणनीतिक हितों का क्षेत्र माना। आज जब चीन, रूस और ईरान जैसी शक्तियाँ पश्चिमी गोलार्ध में राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य सम्बन्ध मजबूत करने के लिए प्रयासरत हैं, अमेरिका एक बार फिर इस सिद्धांत को आधुनिक संदर्भ में लागू करता दिखाई दे रहा है।

वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई इसी प्रवृत्ति का ताज़ा उदाहरण है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि यह कदम लोकतन्त्र, मानवाधिकार और क्षेत्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए उठाया गया है। अमेरिका लम्बे समय से वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने, चुनावों में अनियमितता, भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी से जुड़े आरोप लगाता रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार इन गतिविधियों से न केवल वेनेजुएला की जनता प्रभावित हुई बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता भी खतरे में पड़ी हालांकि, इस कार्रवाई को केवल लोकतंत्र की रक्षा के रूप में देखना एक पक्षीय दृष्टिकोण होगा। वस्तुतः यह हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों का उल्लंघन है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार किसी संप्रभु देश में सैन्य कार्रवाई तभी वैध मानी जाती है जब वह आत्म-रक्षा में हो या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्वीकृति प्राप्त हो। वेनेजुएला के मामले में यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या अमेरिका के पास ऐसा स्पष्ट कानूनी आधार था। यही कारण है कि इस कार्रवाई पर वैश्विक प्रतिक्रिया तीखी और विभाजित रही है।

अमेरिका इस तरह के कदम अतीत में भी उठाता रहा है। मसलन 1989 में पनामा में अमेरिका ने “ऑपरेशन जस्ट कॉज” के तहत सैन्य हस्तक्षेप किया था और राष्ट्रपति मैनुअल नोरीएगा को गिरफ्तार कर अमेरिका ले जाया गया था। उस समय भी अमेरिका ने ड्रग तस्करी, मानवाधिकार उल्लंघन और अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा को आधार बनाया था। इसी तरह  2003 में इराक पर अमेरिकी आक्रमण सामूहिक विनाश के हथियारों के आरोपों के आधार पर किया गया हालांकि बाद में ऐसे हथियारों के प्रमाण नहीं मिले। इन दोनों मामलों में अमेरिका ने सुरक्षा और लोकतंत्र की भाषा का प्रयोग किया लेकिन वास्तविकता थी रणनीतिक हित, तेल संसाधनों पर कब्जा  और क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ावा देना।

वेनेजुएला की कार्रवाई भी इन्हीं ऐतिहासिक उदाहरणों की याद दिलाती है। समर्थकों का तर्क है कि अमेरिका ने एक तानाशाही शासन के विरुद्ध निर्णायक कदम उठाया जबकि आलोचक इसे “शासन परिवर्तन” की राजनीति और शक्ति के प्रयोग का उदाहरण मानते हैं। इस बहस के केंद्र में वही प्रश्न है जो अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बार-बार उठता रहा है—क्या शक्तिशाली राष्ट्रों को नैतिक उद्देश्य के नाम पर दूसरे देशों की संप्रभुता में हस्तक्षेप का अधिकार है?

चीन, रूस और ईरान की प्रतिक्रियाएँ भी इसी शक्ति राजनीति को दर्शाती हैं। रूस और चीन ने अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी आलोचना करते हुए इसे संप्रभुता का उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया है। दोनों देशों के वेनेजुएला के साथ राजनीतिक और आर्थिक सम्बन्ध रहे हैं, और वे इसे पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखते हैं। ईरान ने भी इस कार्रवाई की निन्दा करते हुए इसे साम्राज्यवादी हस्तक्षेप करार दिया है। इन देशों की प्रतिक्रिया केवल नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि अपने रणनीतिक हितों और अमेरिका के प्रभाव को चुनौती देने की इच्छा से भी जुड़ी हुई है लेकिन सच्चाई यह भी कि ये देश अभी कुछ करने की स्थिति में नही हैं ईरान में जहाँ गृहयुद्ध जैसे हालात बन रहे हैं, वहीं रूस यूक्रेन युद्ध में व्यस्त है जहां तक चीन का सवाल है तो वह ताइवान पर अमेरिका जैसी ही कार्यवाही करने की फिराक में है।अमेरिका ने यह कदम पूरे रणनीतिक सोच के साथ उठाया है।

भू-राजनीतिक दृष्टि से वेनेजुएला की घटना यह संकेत देती है कि पश्चिमी गोलार्ध एक बार फिर वैश्विक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन रहा है। अमेरिका इस क्षेत्र में चीन और रूस की बढ़ती उपस्थिति को सीमित करना चाहता है जबकि ये शक्तियाँ अमेरिका के एकध्रुवीय प्रभाव को चुनौती देने का अवसर देख रही हैं। ऐसे में मुनरो सिद्धांत का आधुनिक रूप केवल ऐतिहासिक अवधारणा नहीं, बल्कि सक्रिय रणनीति बनता जा रहा है।अंततः, वेनेजुएला में की गई अमेरिकी कार्रवाई न तो पूरी तरह नैतिक आदर्शवाद का उदाहरण है और न ही केवल आक्रामक साम्राज्यवाद का। यह समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उसी यथार्थवादी प्रकृति को उजागर करती है, जहाँ राष्ट्र अपने हितों, सुरक्षा और शक्ति-संतुलन को सर्वोपरि रखते हैं। मुनरो सिद्धांत, इराक और पनामा के अनुभव, तथा चीन-रूस-ईरान की प्रतिक्रियाएँ मिलकर यह स्पष्ट करती हैं कि आज की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय संबंध सहयोग और संघर्ष, दोनों के मिश्रण से संचालित हो रहे हैं। इस परिदृश्य में नैतिकता और कानून की भूमिका बनी रहती है लेकिन अन्तिम निर्णय अक्सर राष्ट्रीय हित और शक्ति की गणना से तय होते हैं।

डॉ ब्रजेश कुमार मिश्र