विवेक रंजन श्रीवास्तव
अमेरिका को ‘पहियों पर चलने वाला देश’ कहा जाता है. यहां दो स्थानों की दूरी मील में कम, कार से ट्रेवल के गूगल मैप टाइम से ज्यादा बतलाई जाने का प्रचलन है लेकिन कारों की बढ़ती संख्या के चलते आज यही पहिये पार्किंग के लिए जगह तलाशते-तलाशते थक रहे हैं। न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी जैसे महानगरों में पार्किंग अब केवल सुविधा नहीं बल्कि एक रणनीतिक चुनौती बन गई है। यहां भारत की तरह ड्राइवर कम ही कार चलाते हैं. बड़ी मंहगी गाड़ियों में भी सेल्फ ड्राइव ही अधिक देखने में आती है।
हाल ही में न्यूयॉर्क में एक डॉक्टर के अपॉइंटमेंट के दौरान जब मुझे समय पर पार्किंग नहीं मिली तो मजबूरी में कार ‘ट्रक पार्किंग’ ज़ोन में खड़ी करनी पड़ी। महज़ 10 मिनट के भीतर वापस आने पर $115 (करीब 9,500 रुपये) का फाइन टिकट वाइपर पर चिपका मिला। यह घटना दर्शाती है कि यहाँ का प्रशासन और पुलिस व्यवस्था कितनी चाक-चौबंद है।
तकनीक और नियमों का सख्त पहरा चौबीस घंटे बना रहता है। रात के वीराने में भी खाली सड़क होते हुए भी लाल सिग्नल पर कार खड़ी रहती हैं। पैदल चलने वाले को सड़क पर पहला अधिकार दिया जाता है। रोड क्रासिंग पर कार रोक कर पैदल व्यक्ति को सड़क क्रास करने की प्राथमिकता मुस्करा कर देना शिष्टाचार है।
लिबर्टी स्टेट पार्क टहलने के लिए रोज ही जाता हूं. पाथ ट्रेन (लोकल) लेवल क्रासिंग पड़ती है पर कोई बैरियर नहीं है, न ही कोई वॉचमैन . केवल स्वचालित लाइट के इशारे समझ कर कार, पैदल , साइकिलिंग करने वाले सभी रुक जाते हैं । मेरे साथ तो एक बार अद्भुत घटना हुई जब मैं पत्नी के संग रुका हुआ था कि ट्रेन गुजर जाए, तब ट्रैक क्रास करूं पर ट्रेन ड्राइवर ने इशारा किया कि मैं निकल जाऊं और उसने पल भर के लिए रोकी ट्रेन और कुछ क्षण रोके रखी ।
कुल मिलाकर यहाँ सड़क पर कोई कभी भी हड़बड़ी में कार नहीं चलाता । यहां अत्याधुनिक तकनीक और कड़े नियमों का एक बड़ा नेटवर्क परिवहन व्यवस्था बनाए हुए है। पुलिस की मौजूदगी हर जगह भौतिक रूप से भले न दिखे लेकिन तकनीक की नज़र हर वाहन पर है। ‘रडार आधारित स्पीड लिमिट’ के कारण आपकी गति सीमा का उल्लंघन तुरंत दर्ज हो जाता है।
EZ Pass और स्मार्ट टोल:
टोल प्लाजा पर लंबी कतारों के बजाय ‘EZ Pass’ जैसी RFID प्रणाली का उपयोग होता है जिससे वाहन बिना रुके पूरी लगभग सौ की स्पीड से टोल पार कर लेते हैं।
HOV लेन (High Occupancy Vehicle):
पर्यावरण और ट्रैफिक को ध्यान में रखते हुए, तीन या उससे अधिक यात्रियों वाली कारों के लिए अलग लेन आरक्षित होती है।
पार्किंग का डिजिटल समाधान भारत के लिए नया व्यवसाय हो सकता है।
जहाँ जगह कम है, वहाँ पार्किंग समाधान ‘स्मार्ट’ हैं। अब न्यूयॉर्क और जर्सी में ParkMobile जैसे ‘मैन-लेस’ (Man-less) ऐप्स का बोलबाला है। आपको किसी पार्किंग अटेंडेंट की ज़रूरत नहीं, बस ऐप पर अपना ज़ोन नंबर डालें और भुगतान करें। यदि समय बढ़ता है तो आप अपने फोन से ही समय सीमा बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा, शहरों में मल्टी-लेवल और रोबोटिक पार्किंग का जाल है जो सीमित स्थान का अधिकतम उपयोग करते हैं। माल आदि में भी स्वयं ही पार्किंग पेमेंट और स्लिप स्कैन करनी होती है।
भारत और अमेरिका में लोगों की ड्राइविंग आदतों में एक बड़ा मौलिक अंतर अनुशासन का है। अमेरिका में अरबपति हो या सामान्य कर्मचारी, अधिकांश लोग स्वयं कार चलाते हैं। इसके विपरीत, भारत में अभी भी एक बड़ा वर्ग ड्राइवरों पर निर्भर है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भारत में स्व अनुशासन की भारी कमी दिखती है। अनेक बार जिसे जहाँ मन आता है, लोग वहीं कार खड़ी कर देते हैं। ‘नो पार्किंग’ के बोर्ड के नीचे ही गाड़ियाँ खड़ी करना हमारे यहाँ आम बात है जिससे यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है।
चालान बनाते पुलिस वाले से अपने किसी परिचित नेता या अधिकारी से फोन पर बात करवाना जैसा कुछ यहां नहीं होता । अमेरिका में पार्किंग साइन बोर्ड्स पर सड़क की सफाई के दिन, आपातकालीन निषेध और समय सीमा का स्पष्ट उल्लेख होता है और वहाँ कोई भी “दो मिनट में आता हूँ” कहकर अवैध पार्किंग करने का जोखिम नहीं लेता, क्योंकि वहाँ का जुर्माना और टोइंग व्यवस्था बहुत कठोर है। सड़क किनारे फायर ब्रिगेड के हाइड्रेंट्स लगे हुए हैं. उनके सम्मुख पार्किंग करना मतलब आ बैल मुझे मार जैसा है।
भारत के बढ़ते महानगरीय क्षेत्रों के लिए अमेरिका का यह सेल्फ पेमेंट एप पार्किंग मॉडल एक रोडमैप , रोजगार की संभावना हो सकता है। यदि हम ‘फास्टैग’ (FASTag) को ही पार्किंग के साथ एकीकृत (Integrate) कर दें तो मॉल और अस्पतालों में पार्किंग कैशलेस हो सकती है। निजी खाली प्लॉट या पार्किंग स्पेस को किराए पर देने वाले ऐप्स भारत के तंग इलाकों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं, तथा यहाँ की तरह अतिरिक्त आय के साधन और पार्किंग सुविधा बन सकते हैं। तकनीक के साथ-साथ यदि हम भारतीयों में भी यह बोध आ जाए कि सड़क का उपयोग ‘अधिकार’ नहीं बल्कि ‘साझा जिम्मेदारी’ है तो हमारे यातायात की सूरत बदल सकती है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव