राजेश कुमार पासी
डोनाल्ड ट्रंप जब से अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं, वो लगातार अमेरिकी नीतियों में बड़े बदलाव करते जा रहे हैं। ये बदलाव इतने बड़े हैं कि उनके जाने के बाद भी इन नीतियों को बदलना सम्भव नहीं होगा । देखने से लगता है कि ये बदलाव ट्रंप द्वारा किये जा रहे हैं लेकिन सच यह है कि ये अमेरिका के ऐसे बदलाव हैं जो स्थाई रूप लेने वाले हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि उनकी नीति ‘अमेरिका फर्स्ट’ की होगी और सत्ता में आने के बाद वो उसी नीति पर चल रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली थी जिसे वो अभी तक निभाता रहा है। अमेरिका की इस नीति के कारण यूरोपीय देशों ने अपने रक्षा खर्च को बहुत कम कर दिया था क्योंकि उन्हें अमेरिका के कारण अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं थी।
अमेरिका ने अपनी इस नीति के तहत ‘नाटो’ का निर्माण किया था जिसके कानून के अनुसार एक देश पर हमला संगठन के सभी देशों पर हमला माना जाता था। अमेरिका की सैन्य और आर्थिक ताकत के कारण ये संगठन बहुत शक्तिशाली है । ‘नाटो’ के गठन के बाद यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के प्रति इतने आश्वस्त हो चुके थे कि उन्होंने अपनी सेना को बहुत कमजोर कर दिया। यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के प्रति बेफिक्र होकर अपने विकास में लगे रहे और अपनी जनता के लिए बड़ी-बड़ी कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया। दूसरी तरफ अमेरिका ने इस संगठन का फायदा उठाकर पूरी दुनिया में थानेदारी की । अमेरिका ने अपनी सनक में कितने ही देशों को बर्बाद कर दिया। अमेरिका ने कई देशों से युद्ध छेड़े और यूरोपीय देशों ने उसका पूरा साथ दिया । अमेरिका को इसके दो बड़े फायदे हुए. एक तरफ जहां उसकी चौधराहट चलती रही तो दूसरी तरफ उसका रक्षा उद्योग फलता-फूलता रहा । इन युद्धों में ज्यादातर अमेरिका के हथियार इस्तेमाल होते थे, जिनका खर्च नाटो देशों को उठाना पड़ता था। देखा जाए तो रूस-यूक्रेन युद्ध भी नाटो के कारण हुआ है क्योंकि यूक्रेन नाटो में शामिल होने की जिद्द कर रहा था। रूस यूक्रेन के नाटो में शामिल होने के सख्त खिलाफ था क्योंकि वो इसे अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानता है। जब यूक्रेन अपनी जिद्द पर अड़ा रहा तो रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया।
अमेरिका और यूरोपीय देशों के उकसावे में आकर यूक्रेन ने रूस से युद्ध करके अपने आपको बर्बाद कर लिया है। कितनी अजीब बात यह है कि जिस नाटो में शामिल होने के लिए यूक्रेन ने यह दुःसाहस किया था, उसी नाटो का अस्तित्व आज खतरे में दिखाई दे रहा है। दूसरी तरफ डोनाल्ड ट्रंप रूस के साथ दोस्ती करते हुए दिखाई दे रहे हैं। ट्रंप चाहते हैं कि यूक्रेन अपने हितों की अनदेखी करके रूस से समझौता कर ले। नए हालातों में यूक्रेन खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। सच तो यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान यूरोपीय देशों को हुआ है । इस युद्ध के कारण उनकी अर्थव्यवस्था को बड़ी चोट पहुँची है । यूरोपीय देशों की ऊर्जा जरूरतें रूस द्वारा पूरी की जा रही थी लेकिन इस युद्ध के कारण उन्होंने रूस से दूरी बना ली। रूस की अपेक्षा अन्य देशों से ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति यूरोपीय देशों को बहुत महंगी पड़ी है जिसने उनकी आर्थिक कमर तोड़ दी है।
अब अमेरिका ने अपनी सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव कर दिया है जिससे यूरोपीय देशों के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। पेंटागन ने शुक्रवार को 34 पन्नों की ‘नई राष्ट्रीय रक्षा रणनीति’ जारी कर दी है। नई रक्षा नीति में कहा गया है कि अमेरिका अब दुनिया का चौकीदार नहीं बनेगा। इस नीति में कहा गया है कि अमेरिका का फोकस अब केवल पश्चिमी गोलार्द्ध, ग्रीनलैंड और पनामा नहर पर रहेगा। अमेरिका ने एशिया और यूरोप के अपने सहयोगी देशों को फटकार लगाई है और कहा है कि ये देश लंबे समय से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर है। अमेरिका ने उम्मीद जताई है कि अब ये देश रूस और उत्तर कोरिया जैसे खतरों से निपटने में ज्यादा जिम्मेदारी लेंगे। इस नीति में बदलाव की वजह यह बताई गई है कि बहुत लंबे समय तक अमेरिकी सरकार ने अपने नागरिकों और उनके हितों को प्राथमिकता नहीं दी है, अब ऐसा नहीं होने वाला है।
देखा जाए तो अमेरिका ने यूरोपीय देशों को रूस से खुद निपटने को कह दिया है और दक्षिण कोरिया को उत्तर कोरिया से निपटने का इशारा कर दिया है। 2022 में अमेरिका ने कहा था कि उत्तर कोरिया से निपटने की जिम्मेदारी उसकी है लेकिन अब अमेरिका पीछे हट गया है। ईरान के बारे में भी अमेरिका ने कहा है कि उससे निपटने की जिम्मेदारी अब क्षेत्रीय देशों पर होगी। अमेरिका ने जहां इजराइल को खुला समर्थन दिया है तो अरब देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की बात कही है।
इस नीति में ताइवान के लिए कुछ नहीं कहा गया है लेकिन लगता है कि अब अमेरिका ने उसे भी चीन के भरोसे छोड़ दिया है। अमेरिका अपने सहयोगी देशों में सैन्य तैनाती कम करने जा रहा है। सवाल यह है कि डोनाल्ड ट्रंप को इससे क्या फायदा होने वाला है। वास्तव में ट्रंप चाहते हैं कि सभी देश अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा से ज्यादा खर्च करें। यूरोपीय देशों को उन्होंने बहुत पहले कह दिया था कि वो रक्षा पर अपना खर्च बढ़ाये। अब वो कह रहे हैं कि यूरोपीय देश रक्षा पर अपनी जीडीपी का पांच प्रतिशत से ज्यादा खर्च करें । इसके पीछे ट्रंप का स्वार्थ यह है कि सभी देश अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा से ज्यादा हथियार खरीदे। इससे अमेरिका के सैन्य उद्योग को बड़ा फायदा होगा क्योंकि इस समय अमेरिका ही सबसे बड़ा आर्म्स सप्लायर है। देखा जाए तो अमेरिकी नीति से अब हथियारों की होड़ बढ़ने वाली है।
समस्या सिर्फ यह नहीं है कि इससे हथियारों की होड़ बढ़ने वाली है बल्कि इससे भी बड़ी समस्या यह खड़ी हो गई है कि कई देशों में अपने दुश्मन देशों से युद्ध का खतरा खड़ा हो गया है। अमेरिका पर भरोसे के कारण यूरोपीय देश, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान जैसे देशों ने समुचित सुरक्षा व्यवस्था नहीं की है, अब उन्हें अपनी सुरक्षा का भय सताने लगा है। जापान को इसका अहसास पहले ही हो गया था, इसलिए वो पिछले कुछ समय से भारत के साथ मिलकर रक्षा तैयारियों में जुटा हुआ है। दक्षिण कोरिया को भी अब इस रास्ते पर चलना होगा। ताइवान को तो लंबे समय से यह डर सता रहा है कि अगर चीन ने हमला कर दिया तो अमेरिका उसकी मदद करने से पीछे हट सकता है। ताइवान पिछले कुछ समय से हथियारों की खरीद में लगा हुआ है क्योंकि उसे पता है कि चीन उस पर हमला जरूर करेगा। अमेरिका की नई रक्षा नीति के कारण अब ये देश जबरदस्त तरीके से रक्षा तैयारियों में जुटने वाले हैं क्योंकि खतरा उनके सिर पर खड़ा है। अब यूरोपीय देश भी इसी लाइन में आ गए हैं क्योंकि अमेरिका ने दुनिया को बता दिया है कि ये देश कितने कमजोर हैं। जिस तरह से ये देश अमेरिका के सामने सिर झुकाकर खड़े थे, इससे इनकी कमजोरी पूरी दुनिया को पता चल गई है। अब यूरोप के सामने जल्दी से जल्दी मजबूत सुरक्षा व्यवस्था बनाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है।
27 जनवरी को भारत और यूरोपीय यूनियन की बैठक हो रही है जिसमें ‘फ्री ट्रेड अग्रीमेंट’ और ‘डिफेंस पैक्ट’ होने की बड़ी संभावना है। सवाल यह है कि जो समझौता वर्षों से अटका हुआ था, अचानक यूरोपीय देश इसके लिए क्यों तैयार हो गए हैं। यूरोपीय यूनियन की प्रेसिडेंट उर्सुला ने सोशल मीडिया एक्स पर भारत और ईयू एफटीए को ‘मदर ऑफ आल ट्रेड डील्स’ बताते हुए लिखा है, “हम भारत और ईयू के बीच एफटीए को अंतिम रूप दे रहे हैं” । उन्होंने कहा है कि यह समझौता दोनों पक्षों के बीच सिक्युरिटी एंड डिफेंस पार्टनरशिप को मजबूत करेगा। भारत और ईयू के बीच व्यापार समझौते के लिए बातचीत बहुत समय से चल रही थी लेकिन डिफेंस पैक्ट के बारे में कभी कुछ नहीं कहा गया। दोनों पक्षों के बीच होने वाले समझौते के बारे में कहा जा रहा है कि युद्धक विमान, पनडुब्बी, मिसाइल सिस्टम और ड्रोन टेक्नोलॉजी में सह-विकास और सह-निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा। जापान पहले ही भारत के साथ रक्षा सहयोग में शामिल है । ऑस्ट्रेलिया के साथ भी भारत आगे बढ़ रहा है। फ्रांस और इजराइल के साथ भारत का रक्षा सहयोग पुराना है।
वास्तव में भारत की विश्वसनीयता और निष्पक्षता के बारे में दुनिया को अच्छी तरह से पता है, इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए भारत की ओर दुनिया के कई देश देख रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले यूएई अध्यक्ष दो घंटे की संक्षिप्त यात्रा पर भारत आये थे, उसकी भी बड़ी वजह उनकी सुरक्षा चिंता थी। सच तो यह है कि भारत रक्षा सहयोग के नाम पर सिर्फ हथियार खरीद और बेच सकता है. इससे आगे भारत बढ़ने वाला नहीं है। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता ने भारत की सैन्य ताकत से दुनिया को परिचित करवा दिया है। इसके बाद ही दुनिया में भारत के साथ रक्षा सहयोग ही होड़ लग गई है। अब अमेरिका की नई रक्षा नीति ने दुनिया को हथियारों की दौड़ में लगा दिया है । वैसे तो यह सही नहीं है लेकिन सभी देशों के लिए जरूरी है कि वो अपनी सुरक्षा के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भर न हों। भारत अपनी रक्षा में पूरी तरह सक्षम है और अब अपने सहयोगियों को भी इसमें मदद कर रहा है।
राजेश कुमार पासी