कमलेश पांडेय
भारतीय संविधान के कुछ प्रावधानों को यदि सनातन विरोधी षडयंत्र समझा जाता है तो यह अनायास नहीं है क्योंकि इसके कई निर्माताओं का सार्वजनिक चरित्र संदिग्ध और हिंदुत्व विरोधी माना जाता रहा है। तत्कालीन नौकरशाहों, न्यायविदों, व उद्योगपतियों में भी ऐसे ही तत्वों की बहुतायत थी जिससे आजादी के मौलिक उद्देश्य बता आजतक अधूरे हैं।
खास बात यह कि भले ही सत्तागत स्वार्थपूर्ति की गरज से तत्कालीन नेताओं ने सांप्रदायिक आधार पर हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के विभाजन को स्वीकार कर लिया लेकिन बाद में वोट बैंक की दृष्टि से जो नीतिगत संवैधानिक शरारत की वह लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को मुंह चिढ़ाने वाली प्रतीत हुई। इसके लिए संविधान निर्माता डॉ भीम राव अंबेडकर और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू गुट पूरी तरह से जिम्मेदार हैं।
ऐसा इसलिए कि अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो वाली जातीय, क्षेत्रीय व धार्मिक नीतियों को स्वतंत्र भारत में हूबहू लागू कर दिया गया। हैरत की बात तो यह कि इनका पुरजोर विरोध शांतिप्रिय हिन्दू समाज ने भी नहीं किया। तब सवर्णों के पास सत्ता थी, दलितों और अल्पसंख्यकों को बेहिसाब अधिकार मिले थे और पिछड़ों को हाशिए पर छोड़ दिया गया ताकि सरदार पटेल कमजोर रहें हालांकि बाद में इन्हीं पिछड़ों ने एकजुट होकर समाजवादी राजनीति की और राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में कांग्रेस की सत्ता बदल दी। तब राष्ट्रवादियों का भी उन्होंने सहयोग लिया।
दरअसल, भारतीय संविधान में कुछ प्रावधानों को सनातन धर्म के अनुयायियों द्वारा “विरोधी” माना जाता है, विशेष रूप से शिक्षा और धार्मिक संस्थाओं से संबंधित अनुच्छेद के दृष्टिगत। इनमें मुख्यतः अनुच्छेद 28, 29 और 30 शामिल हैं जिन्हें हिंदू संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने वाला देखा जाता है। यह विवादास्पद अनुच्छेद कतिपय नजरिए से हिन्दू विरोधी समझे जाते हैं क्योंकि अनुच्छेद 28 राज्य-समर्थित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबंध लगाता है जिससे हिंदू गुरुकुल प्रभावित होते हैं।
वहीं, अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों (मुस्लिम, ईसाई आदि) को अपनी संस्थाएं चलाने और सरकारी सहायता लेने का अधिकार देता है जबकि बहुसंख्यक हिंदुओं पर ऐसा प्रतिबंध रहता है। साथ ही अनुच्छेद 26 धार्मिक मामलों में हिंदू समुदायों को पूर्ण स्वायत्तता नहीं देता, खासकर मंदिर प्रबंधन में। ये प्रावधान कांग्रेस काल में जोड़े गए माने जाते हैं जो अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के लिए हिन्दू विरोधी कृत्य को बढ़ावा देते आए हैं हालांकि, पहले जिस तरह से भाजपा का समाजवादीकरण हुआ और अब जिस तरह से उसकी कांग्रेसीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई है, उसके दृष्टिगत ये सवाल पुनः मुखर हो चुके हैं।
इसलिए इनमें संविधान संशोधन किये जाने सम्बन्धी प्रमुख अपेक्षाएं गलत नहीं हैं, बल्कि समानता व बंधुत्व के लिहाज से उचित हैं। तभी तो सनातन समर्थक हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग इन अनुच्छेदों को रद्द करने या संशोधित करने की मांग करते आये हैं ताकि हिंदू संस्थाओं को समान अधिकार मिले क्योंकि संवैधानिक अनुच्छेद 28 और 30 को समाप्त कर सभी को समान धार्मिक शिक्षा का अधिकार देना जरूरी है, वहीं, मंदिरों पर से सरकारी नियंत्रण हटाना और हिंदू संपत्ति पर स्वायत्तता की बहुत जरूरी है।
इसके अलावा, संविधान में अलग से जोड़े गए “सेक्युलर” और “सोशलिस्ट” शब्द हटाने की मांग भी वाजिब हैं जो 42वें संशोधन द्वारा 1976 में जोड़े गए। कहना न होगा कि ऐसे संशोधन से शिक्षा में वेद-गीता जैसी शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा लेकिन अल्पसंख्यक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। फिर भी कुछ विचारक संविधान को सही ढंग से लागू करने की वकालत करते हैं न कि पूर्ण बदलाव की।
यह ठीक है कि भारतीय संविधान ने जातिवाद को समाप्त करने का लक्ष्य रखा लेकिन कुछ आलोचकों के अनुसार
आरक्षण प्रणाली और अनुसूचित जाति-जनजाति की पहचान को जाति से जोड़कर इसे संस्थागत रूप से मजबूत किये जाने का कुत्सित ब्रितानी प्रयास जारी रखा। ऐसा इसलिए कि यह प्रावधान सामाजिक न्याय के नाम पर जन्म-आधारित वर्गीकरण को संरक्षण देता है जो सनातनी वर्ण व्यवस्था की आधुनिक प्रतिध्वनि माना जाता है। इससे सनातन धर्म में विभेद को बढ़ावा मिलता है और हिन्दू धर्म कमजोर होता है।
बता दें कि इस निमित्त संविधान सभा ने ब्रिटिश कालीन पिछड़ी जातियों की सूचियों को अपनाया ताकि ऐतिहासिक शोषण का सुधार हो। जिस तरह से संवैधानिक अनुच्छेद 15(4), 16(4), 46 के तहत अनुसूचित जाति/जनजाति/अत्यंत पिछड़ा वर्ग (SC/ST/OBC) को आरक्षण देकर समता सुनिश्चित की गई, उसने जाति को स्थायी पहचान बना दिया। भले ही डॉ आंबेडकर ने इसे अस्थायी माना और सिर्फ 10 वर्ष के लिए इसकी वकालत की, लेकिन उससे जातिवाद और मजबूत हुआ। वहीं राजनीतिक दबाव से अब यह अनंतकालिक होता प्रतीत होता है। इससे हिंदुओं में जातीय विद्वेष की भावना पनपी और हिंदुओं में गहरी फूट पड़ गई।
समझा जाता है कि आरक्षण ने हिंदुओं के बीच की जाति को राजनीतिक हथियार बना दिया, और वोटबैंक और भेदभाव को संस्थागत रूप से गहरा किया। इससे अंतरजातीय विवाह और अंतर्धार्मिक शादी जैसे सामाजिक विरोधाभासों को भी बढ़ावा दिया गया। इससे हिन्दू समाज दिग्भ्रमित और कुसंस्कारी हुआ है। इससे बचने की जरूरत है, अन्यथा नीतिगत विडंबना से पूरी सनातन संस्कृति पर काले बादल मंडराने लगेंगे।
यह ठीक है कि अनुसूचियां (SC/ST सूची) जन्म-जाति पर आधारित हैं और धर्मांतरण पर इनका लाभ छिन जाता है। वहीं, मंडल आयोग के तहत जिन्हें ओबीसी आरक्षण मिला और उनकी सामाजिक पिछड़ापन को जाति से जोड़ा, उससे उप-जातियां भी बनीं। इनका सनातनी सामाजिक सोच पर विभाजनकारी असर स्पष्ट रूप से महसूस किया जाता है।
चूंकि संवैधानिक अनुच्छेद 330-342 के तहत संसद व विधानसभाओं में सीट आरक्षण मिला हुआ है, जहां जातिगत प्रतिनिधित्व को स्थायी बना दिया गया है।
वहीं, अनुच्छेद 243D/T के द्वारा पंचायत/नगरपालिकाओं में SC/ST कोटा प्रदान करके स्थानीय स्तर पर जाति विभाजन की रेखा को मजबूती प्रदान की गई है। वहीं,
SC/ST एक्ट यानी जाति-आधारित अपराध पर कठोरता के बढ़ते दुरुपयोग से सनातनियों के बीच सामान्य भेदभाव बढ़ा है। बहरहाल, जो यूजीसी एक्ट द्वारा सवर्णों पर जो भेदभावपूर्ण प्रावधान थोपे जा रहे हैं, उससे हिंदुओं के बीच नीतिगत विडंबना मजबूत होने की आशंका प्रबल है।
कहना न होगा कि यह व्यवस्था जाति उन्मूलन के बजाय इस को और अधिक बढ़ावा देती है, जैसा कि आरएसएस-अंबेडकर बहस में यह तथ्य उभरा था लेकिन अब जब केंद्र में आरएसएस समर्थित भाजपा की सरकार मजबूती से जम चुकी है, और पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में उसके ओबीसीकरण की प्रक्रिया तेज है, तब कांग्रेसियों व समाजवादियों की सियासी बुराइयों के उसमें प्रविष्ट कर जाने से हिन्दू समाज ठगा सा महसूस कर रहा है।
ऐसा इसलिए कि भाजपा ने जाति व धर्म सम्बन्धी संवैधानिक सोच को बदलने के बजाए उसका राजनीतिक लाभ उठाने की जो सस्ती चाल चली है, वह देर सबेर समाजवादियों व कांग्रेसियों की तरह ही भाजपाइयों को भी ले डूबेगी। दरअसल, भारत का राजनीतिक इतिहास इस बात की चुगली करता है कि यहां सवर्ण विरोधी राजनीति अक्सर ब्रेक के बाद दम तोड़ देती है। इसलिए भाजपा या तो अपनी पुरानी नीतियों पर कायम रहते हुए संविधान संशोधन के द्वारा मौजूदा जाति व धर्म की स्थायी बना दी गई नीयति बदले अन्यथा अपनी इस सियासी लापरवाही की भावी कीमत चुकाने की तैयारी कर ले क्योंकि इतिहास खुद को दुहराता जरूर है।
कमलेश पांडेय