भूख न मिटती पैसे की

चकाचौंध चकाचौंध है,

चकाचौंध है पैसे की|

किसी तरह से पैसा आये,

चाहे आये जैसे भी|

 

पैसे की दुनियाँ दीवानी,

पैसे के सब मीत यहाँ|

बिना दाम के कॊई न पूँछे,

पूँछ है केवल पैसे की|

 

पैसे से इज्जत मिलती है’

पैसे से मिलता सम्मान|

इस कारण से ही तो सबको,

भूख है बाकी पैसे की|

 

पैसे से मिलती सुविधायें ,

पैसे से आराम मिले|

जय जय कार हुआ करती है,

सभी ओर अब पैसे की|

 

पैसे से पैसा बनता है,

पैसा बढ़ता जाता है|

सपने में भी आती अक्सर,

याद सभी को पैसे की|

 

किंतु कभी संतोष न मिलता,

कभी किसी को पैसे से|

कितना भी आ जाये पैसा,

भूख न मिटती पैसे की|

 

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव
लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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