धर्म-अध्यात्म वर्तमान और भविष्य के पथप्रदर्शक अहिंसा के ‘महावीर’ April 1, 2026 / April 2, 2026 | Leave a Comment डॉ घनश्याम बादल दुनिया भर के 193 देश में से 54 देश इस समय अंदरूनी संघर्ष, हिंसा या अंतरराष्ट्रीय युद्ध अथवा आतंकवाद से त्रस्त हैं। अखबारों, टीवी चैनलों, सोशल मीडिया या अन्य मंचों से लगातार खून खराबे एवं विनाशकारी धमाकों के समाचार मिल रहे हैं। ऐसे में जब विश्व के विभिन्न कोनों से युद्ध, हिंसा […] Read more »
व्यंग्य अप्रैल फ़ूल बनाया, बड़ा मज़ा आया ! March 30, 2026 / March 30, 2026 | Leave a Comment इतिहास के पन्नों में झांकें तो इस दिन की उत्पत्ति कई तरीके से पता चलती है। 16वीं शताब्दी के फ्रांस में जब कैलेंडर बदला और नववर्ष एक जनवरी को मनाया जाने लगा, लेकिन कुछ लोग एक अप्रैल को ही नया साल मानते रहे। उन्हें मज़ाक का पात्र बनाया गया और यहीं से “एप्रिल फूल” की परंपरा शुरू हुई। Read more » had a lot of fun! Made an April Fool अप्रैल फ़ूल
धर्म-अध्यात्म मर्यादा के पर्याय, आदर्श शासक ‘राम’ March 24, 2026 / March 24, 2026 | Leave a Comment चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को अयोध्या की धरती पर जब भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में श्रीराम का अवतरण हुआ, तो वह केवल एक असुर के Read more » रामनवमी
धर्म-अध्यात्म देवी के पालकी पर आगमन का प्रतीकार्थ March 23, 2026 / March 23, 2026 | Leave a Comment भारतीय सांस्कृतिक चेतना में चैत्र नवरात्रि केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि समय की नब्ज़ पढ़ने का भी अवसर होता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाले Read more » देवी के पालकी पर आगमन
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म नई ऊर्जा चुनौतियां एवं उम्मीदें लेकर आया है नव संवत्सर 2083 March 19, 2026 / March 19, 2026 | Leave a Comment भले ही आज दुनिया ईस्वी सन के हिसाब से चल रही है और हम 2026 में रह रहे हैं लेकिन आज भी दुनिया भर में हिंदू नव वर्ष संवत्सर की महत्ता अलग ही है। Read more » नव संवत्सर 2083
धर्म-अध्यात्म आस्था, शक्ति और समाज का धर्म सेतु हैं नवरात्र March 18, 2026 / March 18, 2026 | Leave a Comment भारतीय संस्कृति पर्व, उपवास व्रत और संकल्पों की ऐसी मंजूषा है जिसकी तुलना विश्व में संभव ही नहीं है। हमारी संस्कृति में पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के प्रतीक होते हैं। Read more » नवरात्र
विश्ववार्ता तेल के खेल, गैस का दर्द,सियासत और जंग March 16, 2026 / March 16, 2026 | Leave a Comment दुनिया की बड़ी राजनीति अक्सर आम आदमी की छोटी-छोटी ज़रूरतों पर भारी पड़ती रही है। जब कहीं युद्ध की आहट होती है, तो उसके धमाके केवल सीमाओं Read more » गैस का दर्द तेल के खेल सियासत और जंग
खेल जगत मनोरंजन जीत की रीत का नया गीत March 10, 2026 / March 10, 2026 | Leave a Comment टी-20 वर्ल्ड कप जीत Read more » टी-20 वर्ल्ड कप जीत
विश्ववार्ता अमेरिका, इजरायल – ईरान युद्ध : विचार, वर्चस्व और संप्रभुता का खूनी संघर्ष March 3, 2026 / March 3, 2026 | Leave a Comment डॉ घनश्याम बादल अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किए जा रहे हमले आज की वैश्विक राजनीति का वह क्रूर चेहरा है, जहाँ ‘शक्ति ही नीति’ है और नीति नैतिकता का स्थान ले चुकी है। अमेरिका और इज़रायल के लिए ईरान केवल एक देश नहीं, बल्कि ऐसी शक्ति संरचना है जो उनके प्रभुत्व वादी ढाँचे […] Read more »
विश्ववार्ता भारत बांग्लादेश संबंध के नवीकरण का वक्त February 19, 2026 / February 19, 2026 | Leave a Comment लोकतंत्र की जीत के निहितार्थ डॉ घनश्याम बादल बांग्लादेश के चीफ एडवाइजर के रूप में मोहम्मद यूनुस और कुछ खास कर पाए हों या नहीं लेकिन एक काम तो उन्होंने कर ही दिया है कि बांग्लादेश को राजनीतिक उहापोह की स्थिति से निकालकर स्पष्ट जनादेश दिलवा दिया है। 12 फरवरी को हुए चुनावों के नतीजे […] Read more » भारत बांग्लादेश संबंध
बच्चों का पन्ना लेख परीक्षा : प्रतिस्पर्धा नहीं,निर्माण यात्रा February 18, 2026 / February 18, 2026 | Leave a Comment अध्ययन, संतुलन, तकनीकी, श्रम,विद्यालय, परिवार, छात्र, शिक्षक मिलकर बनाएं उत्सव। डॉ घनश्याम बादल बोर्ड परीक्षाएं सर पर है और परीक्षा को लेकर बच्चों, माता-पिता और विद्यालयों के मन में एक स्वाभाविक डर एवं बेचैनी है लेकिन डरना या परेशान होना किसी समस्या का हल नहीं होता. हल है उस समस्या का शांत मन एवं सही […] Read more » exam is a journey of creation Exam: Not a competition
कला-संस्कृति धर्म-अध्यात्म प्रकृति, चेतना और आत्म जागरण का उत्सव January 21, 2026 / January 21, 2026 | Leave a Comment बसंत पंचमी विशेष : डॉ घनश्याम बादल भारतीय परंपरा और श्रीमद् भागवत गीता में वसंत को ऋतुराज कहा गया है,’ऋतूनां कुसुमाकरः अर्थात् ऋतुओं में मैं वसंत हूँ, जहाँ सृजन, सौंदर्य और चेतना अपने चरम पर होती है। बसंत का सौंदर्य एवं महत्व देखकर ही इसे ऋतुराज की संज्ञा दी गई है। वसंत पंचमी भारतीय जीवन-दर्शन का सजीव प्रतीक है- जहाँ धर्म, विज्ञान, मनोविज्ञान और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही चेतना के विविध रूप हैं। तिथि मात्र नहीं बसंत वसंत पंचमी केवल पंचांग में अंकित एक तिथि मात्र नहीं, अपितु भारतीय चेतना का वह क्षण है जब जड़ता के लंबे शीतकाल के बाद जीवन पुनः मुस्कुराने लगता है। यह ऋतु परिवर्तन का संकेत भर नहीं, बल्कि आत्मा, प्रकृति और समाज तीनों के नवजागरण का पर्व है। श्वेत शीत के बाद पीत वसंत का आगमन जैसे कहता है-अब भीतर और बाहर, दोनों ही स्तरों पर ऊर्जा को जगाने एवं सृजन का समय है। धार्मिक और आध्यात्मिक संदर्भ वसंत पंचमी को माँ सरस्वती का प्राकट्य दिवस माना जाता है। सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि चेतना की धारा हैं। वह चेतना जो अज्ञान के तम को चीरकर विवेक का प्रकाश फैलाती है। इसीलिए इस दिन पुस्तकों, वाद्ययंत्रों और लेखन-कार्य का पूजन होता है। या कुन्देन्दु तुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना श्लोक हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान का स्वरूप शुद्ध, शांत और उज्ज्वल होता है, ठीक उसी तरह जैसे वसंत का प्रकाश। आध्यात्मिक दृष्टि से वसंत पंचमी आंतरिक ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। जैसे धरती के भीतर बीज फूटते हैं, वैसे ही साधक के भीतर सुप्त चेतना जागती है। योग और तंत्र परंपरा में इस काल को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है । प्रकृति और विज्ञान का संगम वैज्ञानिक दृष्टि से वसंत पंचमी के आसपास पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध में दिनों की अवधि बढ़ने लगती है, सूर्य की किरणें अधिक सीधी और ऊर्जा-समृद्ध हो जाती हैं। इसका प्रभाव सीधे मानव शरीर और मस्तिष्क पर पड़ता है। मौसम विज्ञान के अनुसार भी वसंत ऋतु में सेरोटोनिन और डोपामिन जैसे “प्रसन्नता दायक हार्मोन” का स्तर बढ़ता है अवसाद, जड़ता और आलस्य में कमी आती है। सृजनात्मकता और सीखने की क्षमता तीव्र होती है । इसीलिए प्राचीन भारत में गुरुकुलों में नए अध्ययन सत्र, संगीत-नाट्य अभ्यास और शास्त्रार्थ इसी काल में प्रारंभ होते थे। मनोविज्ञान और आत्मिक चेतना मनोवैज्ञानिक रूप से वसंत पंचमी आशा का पर्व है। शीतकाल मानव मन में एक प्रकार की संकुचनशीलता ले आता है। कम प्रकाश, कम ऊर्जा, अधिक अंतर्मुखता। वसंत इस संकुचन को तोड़ता है। पीला रंग, जो वसंत पंचमी का प्रतीक है, ऊर्जा, ऊष्मा,आशावाद, बौद्धिक स्पष्टता और आत्मविश्वास का रंग माना जाता है। इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले पकवान (केसरिया खीर, बेसन के लड्डू) परंपरा में शामिल हैं। यह रंग मन को संदेश देता है- संकुचन एवं आलस का समय यानी शीतकाल अब चला गया इसलिए आगे बढ़ो,सीखो और रचो।” भौगोलिक परिवर्तन और जीवन भौगोलिक दृष्टि से वसंत पंचमी कृषि चक्र का महत्वपूर्ण पड़ाव है। रबी की फसलें पकने लगती हैं, सरसों के खेत पीले फूलों से भर जाते हैं। यह दृश्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि अन्न, समृद्धि और जीवन की निरंतरता का संकेत है। उत्तर भारत से लेकर पूर्वी भारत तक लोकजीवन में वसंत का स्वागत गीतों के माध्यम से होता है- फागुन आयो रे, रंग बरसाओ रे, सरसों फूली,धरती बोली,जीवन गुनगुनाओ रे जैसे लोकगीतों में किसान की आशा, प्रकृति से उसका संवाद और जीवन के प्रति उसका उल्लास समाहित होता है। वसंत और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा वसंत पंचमी के साथ ही फाग, होली, रास और प्रेम-उत्सवों की श्रृंखला आरंभ होती है। कालिदास ने ‘ऋतुसंहार’ में वसंत को प्रेम और सृजन की ऋतु कहा है। यह प्रेम केवल दैहिक नहीं, बल्कि आत्मा का प्रकृति से, मनुष्य का मनुष्य से और साधक का ब्रह्म से प्रेम है। आधुनिक संदर्भ में वसंत पंचमी आज के यांत्रिक और तनावग्रस्त जीवन में वसंत पंचमी हमें रुककर देखने, महसूस करने और स्वयं से जुड़ने का अवसर देती है। यह पर्व याद दिलाता है कि ज्ञान केवल डिग्रियों में नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, संतुलन और प्रकृति-संगति में भी निहित है। यदि हम वसंत पंचमी को केवल रस्म न बनाकर, आत्मचिंतन का दिन नई सीख शुरू करने का संकल्प, भीतर की नकारात्मकता त्यागने का अवसर बना लें, तो यह पर्व वास्तव में आत्मिक पुनर्जन्म का उत्सव बन सकता है। यह पर्व संदेश देता है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नया करती है, वैसे ही मनुष्य भी अपने भीतर नवीनता, विवेक और करुणा का वसंत ला सकता है। वसंत पंचमी शाश्वत संदेश है- तम से प्रकाश की ओर, जड़ता से चेतना की ओर, और अस्तित्व से आत्मबोध की ओर बढ़ना , दुखों के पुराने पत्तों को त्याग कर प्रसन्नता एवं नवीनता के नए अंकुरण को धारण करना। डॉ घनश्याम बादल Read more » बसंत पंचमी