कमलेश पांडेय

कमलेश पांडेय

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वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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राजनीति

आखिर ‘सम्राट चौधरी’ के सियासी उभार से हाशिए पर क्यों चले गए ‘तेजस्वी यादव’?

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कमलेश पांडेय बिहार की प्रमुख विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के लुढ़कते जनाधार से ‘सेक्यूलर सियासतदान’ परेशान हैं। उनकी चिंता है कि भाजपा ने बिहार के युवा नेता और मौजूदा उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर दांव क्या लगाया, तेजस्वी यादव जितनी तेजी से उभरे थे, उससे भी तेज गति से हाशिए पर जाते प्रतीत हो रहे हैं ! कोई इसे कांग्रेस नेता व लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और भाकपा माले की सियासी सोहबत का साइड इफेक्ट करार दे रहा है तो कोई इसे यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं से जारी सियासी लुकाछिपी का असर करार दे रहा है।  राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि लालू प्रसाद की तरह ही तेजस्वी यादव की मुस्लिम परस्त वाली राजनीतिक छवि एक ओर जहां मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण को उनसे जोड़े हुए है, इसकी प्रतिक्रिया में वो सवर्ण वोट भी उनसे छिटक गया जो कभी मुख्यमंत्री और जदयू नेता नीतीश कुमार को राजनीतिक सबक सिखाने के लिए राजद और तेजस्वी यादव से जुड़ने की कोशिश किया था लेकिन जैसे ही तेजस्वी यादव, नीतीश कुमार के आशीर्वाद से एक नहीं बल्कि दो-दो बार बिहार के उपमुख्यमंत्री बने तो वो युवा जनाधार भी उनसे छिटक गया।  इस बात का खुलासा तब हुआ जब लोकसभा चुनाव 2024 और बिहार विधानसभा उपचुनाव 2024 में ‘इंडिया गठबंधन’ का बिहार में सूबाई इंजन बने रहने के बावजूद राजद प्रमुख तेजस्वी यादव अपनी वह राजनीतिक सफलता नहीं दोहरा पाए जैसा कि उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में या उससे पहले प्रदर्शित किया था। बता दें कि बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से महज 9 सीट ही इंडिया गठबंधन जीत सकी जिसमें राजद को 4, कांग्रेस को तीन और भाकपा माले को दो सीटें मिलीं थीं। यह लोकसभा चुनाव 2019 के मुकाबले राजद का बेहतर परफॉर्मेंस है लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के मुकाबले काफी निराशाजनक, क्योंकि तब राजद राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के तौर पर उभरी थी।  वहीं, बिहार विधानसभा उपचुनाव 2024 में 4 सीटों में से एक भी सीट राजद या उसके इंडिया गठबंधन को नहीं मिली जबकि पड़ोसी राज्य यूपी में इंडिया गठबंधन की सूबाई इंजन सपा ने 80 में से 43 (सपा- 37 और कांग्रेस- 6) सीटें जीतकर बीजेपी को 50 प्रतिशत से अधिक सीटों पर जबरदस्त मात दी थी और यूपी विधानसभा उपचुनाव 2024 में भी 9 में से 2 सीटें जीतने में कामयाब रही। इससे तेजस्वी यादव का बिहार में चिंतित होना स्वाभाविक है क्योंकि अब इंडिया गठबंधन की हवा निकल चुकी है और उसमें कांग्रेस के नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे हैं। इसलिए बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान तेजस्वी यादव को अपनी सियासी साख बचाने के लिए न केवल कड़ी राजनीतिक मशक्कत करनी पड़ेगी बल्कि सियासी सूझबूझ भी नए सिरे से दिखानी होगी जिसके आसार बहुत कम हैं। इसलिए अब यह कहा जाने लगा है कि भाजपा के सम्राट चौधरी दांव पर तेजस्वी यादव चारो खाने चित्त हो गए हैं। जहां लोकसभा चुनाव 2024 में यूपी वाले ‘इंडिया गठबंधन’ यानी समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठजोड़ को हासिल उपलब्धि की तरह बिहार में कुछ खास नहीं कर पाए, वहीं बिहार विधानसभा उपचुनाव 2024 में उससे भी बुरा सियासी प्रदर्शन किया जिससे अब उनके नेतृत्व पर ही सवाल उठने लगे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि लालू प्रसाद यादव जैसे रघुवंश प्रसाद सिंह या जगतानंद सिंह जैसे कद्दावर नेताओं की दूसरी कतार की तरह राजद में अपने मुकाबले कोई दूसरी कतार बनने ही नहीं दिया, जिसका अब उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, लालू प्रसाद जैसे भाजपा में सुशील मोदी जैसा बैकडोर शुभचिंतक रखते थे, कोई वैसा दूसरा हमउम्र शुभचिंतक पैदा करने में भी तेजस्वी यादव सर्वथा विफल रहे हैं! कहना न होगा कि आज ‘तेजस्वी यादव’ और ‘सम्राट चौधरी’ महज व्यक्ति नहीं बल्कि विचार बन चुके हैं। तेजस्वी यादव जहां ‘सेक्यूलर जमात’ की तरफदारी कर रहे हैं, वहीं सम्राट चौधरी अपने धर्मनिरपेक्ष मिजाज के बावजूद ‘प्रबल हिंदुत्व’ के समर्थकों की एकमात्र उम्मीद बनकर उभरे हैं और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की तरह दबंगई पूर्वक अपनी बात रखते हैं। यही वजह है कि पहले उन्हें बीजेपी ने मंत्री बनाया, फिर प्रदेश अध्यक्ष बनने का मौका दिया और उसके बाद सीधे उपमुख्यमंत्री बना दिया।  वहीं, सम्राट चौधरी के बढ़ते सियासी ग्राफ का सेंसेक्स इस बात का संकेत दे रहा है कि भविष्य में तीसरी पीढ़ी के भाजपा नेताओं से जब प्रदेश में ओबीसी मुख्यमंत्री या फिर देश में ओबीसी प्रधानमंत्री बनाने की बात छिड़ेगी तो सम्राट चौधरी के नाम को खारिज करना इसलिए भी कठिन हो जाएगा, क्योंकि पूर्वी भारत में वो एकमात्र ऐसे भाजपा नेता हैं जिन्हें न केवल पीएम नरेंद्र मोदी और एचएम अमित शाह पसंद करते हैं बल्कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी उनके सियासी अंदाज को तवज्जो देते हैं।  यह बात मैं इसलिए बता रहा हूँ ताकि बिहारवासी यह समझ सकें कि सियासत एक चक्रव्यूह है जिसे अमूमन किसी अभिमन्यु की तलाश रहती है लेकिन समकालीन अर्जुन वह गलतियां नहीं दुहराता, जो महाभारत काल में दुहराई जा चुकी हैं। आज लालू प्रसाद और शकुनी चौधरी जैसे सियासी धुरंधर पग-पग पर अपने पुत्रों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। आपको पता होगा कि बिहार की राजनीति को लगभग 15 वर्षों तक (1990-2005) अपने हिसाब से हांकने वाले पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के तेजस्वी पुत्र तेजस्वी यादव हैं जबकि उस दौर में भी लालू प्रसाद को कड़ी सियासी चुनौती देने वाले उनकी ही सरकार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शकुनी चौधरी के यशस्वी पुत्र सम्राट चौधरी हैं, जो बिहार के सबसे कम उम्र के मंत्री बनने का रिकॉर्ड स्थापित कर चुके हैं। यह उनके राजनीतिक सूझबूझ का ही तकाजा है कि आज वो कुशवाहा नेता उपेंद्र कुशवाहा को काफी पीछे छोड़ चुके हैं जो उनके पिता शकुनी चौधरी के प्रबल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी समझे जाते थे। बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी जितना फूंक-फूंक कर सियासी कदम उठा रहे हैं. उससे साफ पता चलता है कि अपने स्वर्णिम राजनीतिक भविष्य के लिए वह कोई जोखिम मोल लेना नहीं चाहते हैं । वहीं, पटना से लेकर दिल्ली तक जिस तरह से अपने शुभचिंतकों से जुड़े दिखाई प्रतीत होते हैं, उससे उनके प्रतिस्पर्धी नेता भी खुन्नस खा रहे हैं। हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के शपथ ग्रहण समारोह में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ उनकी असरदार मौजूदगी भी दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में चर्चा का विषय बनी हुई है।  राजनीतिक लोग बता रहे हैं कि कभी नीतीश कुमार को सियासी आईना दिखाने वाले सम्राट चौधरी अब परिस्थितिवश जितना बेहतर तालमेल प्रदर्शित कर रहे हैं, उसका इशारा भी साफ है कि नीतीश कुमार का राजनीतिक सूर्य अस्त होते ही सम्राट चौधरी उस सियासी शून्य को भरकर बिहार भाजपा को वह राजनीतिक ऊर्जा प्रदान करेंगे जो उसे इन दिनों यूपी से महाराष्ट्र तक मिल रही है। ऐसा तभी संभव होगा, जब तेजस्वी यादव को बिहार विधान सभा चुनाव 2025 में एक और शिकस्त मिलेगी। टीम भाजपा अभी अपने इसी मिशन में जुटी हुई है। उधर, बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरजेडी नेता तेजस्वी यादव पूरी तरह से सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में अपनी शेखपुरा यात्रा के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेता देवेंद्र कुशवाहा से मुलाकात कर सियासी पारा हाई कर दिया है। इस मुलाकात के बाद जिले की सियासत गर्म हो गई है, क्योंकि कुशवाहा ने कहा कि उन्होंने पंचायत की समस्याओं को लेकर तेजस्वी से मुलाकात की जबकि सियासी हल्के में यह चर्चा है कि राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा अपनी लोकसभा चुनाव 2024 की हार से भाजपा से भीतर ही भीतर चिढ़े हुए हैं और अपने नेताओं को तेजस्वी यादव के पीछे लगा दिया है, ताकि समय आने पर अपने साथ हुए सियासी छल का बदला ले सकें।  आपको पता होगा कि जब-जब भाजपा नीतीश कुमार के करीब जाती है तो लाचारीवश उसे उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से दूरी बनानी पड़ती है। वहीं, लोजपा नेता चिराग पासवान और हम नेता जीतनराम मांझी जैसे नीतीश विरोधी नेताओं की पूछ भी घट जाती है हालांकि, दलित नेता होने के चलते चिराग को उपेंद्र से ज्यादा तवज्जो मिलती है। नीतीश कुमार के ही चक्कर में कभी भाजपा जॉइन किये आरसीपी सिंह भी आज सियासी नेपथ्य में चले गए हैं। ऐसे में नीतीश के धुर विरोधी रहे सम्राट चौधरी जिन्होंने कभी उन्हें पद से हटाने के लिए पगड़ी तक बांध रखी थी, को यदि भाजपा तवज्जो दे रही है तो यह उनके नेतृत्व कौशल, राजनीतिक प्रबंधन और व्यक्तिगत सम्पर्क का ही तकाजा है। इससे नीतीश व तेजस्वी दोनों परेशान हैं और खुद को उस सियासी चक्रव्यूह में घिरा महसूस कर रहे हैं, जहां सम्राट के महीन सियासी वार की कोई राजनीतिक काट तक उन्हें नहीं सूझ रही है। वहीं, बिहार की राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (2005-से अब तक बीच में अपने शागिर्द जीतनराम मांझी के संक्षिप्त कार्यकाल को छोड़कर) ने बिहार के अधिकांश रिकॉर्ड को ध्वस्त करते हुए जिस तरह से अपनी सूबाई बादशाहत बनाए हुए हैं, उसे भी यदि सम्राट चौधरी निकट भविष्य में विनम्रता पूर्वक तोड़ दें तो किसी को हैरत नहीं होगी क्योंकि भले ही वह आरएसएस बैकग्राउंड से नहीं हैं लेकिन संघ और भाजपा की एक-एक राजनीतिक कड़ी को बखूबी जोड़ते जा रहे हैं ताकि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार जल्द ही बिहार में बन सके। उनके इस उद्देश्य की पूर्ति में केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय और भूपेंद्र यादव का सक्रिय सहयोग भी उन्हें मिल रहा है, ऐसा पार्टी सूत्र बताते हैं। कमलेश पांडेय

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राजनीति

यक्ष प्रश्न: जीत और गठबंधन की मृगमरीचिका में आखिर कब तक भटकेगी कांग्रेस?

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 कमलेश पांडेय कांग्रेस एक पुरानी राजनीतिक पार्टी है जिसका देशव्यापी जनाधार है लेकिन वह ‘जीत’ और ‘गठबंधन’ की मृगमरीचिका में आखिर कबतक भटकेगी, यह एक यक्ष प्रश्न है? आखिर कमजोर ‘सियासी बैशाखियों’ के सहारे उसकी जीत कितना मुकम्मल कहलाएगी और स्थायी बन पाएगी, यह उससे भी ज्यादा विचारणीय पहलू है। वैसे भी जब कांग्रेस विभिन्न महत्वपूर्ण राज्यों में क्षेत्रीय दलों की वैशाखी ढूंढ़ती है या फिर मुद्दों के बियाबान में भटकती और फिर स्टैंड बदलती नजर आती है तो मुझे इसके रणनीतिकारों पर तरस आती है।  ऐसा इसलिए कि मैंने भू-जमींदारी देखी है, जहां पर लोग अपनी जमीनें ठेके या बंटाईदारी पर देकर अनाज और पैसे दोनों लेते हैं। ठीक उसी तरह से आज कांग्रेस के रसूखदार और धन्नासेठ नेता पार्टी संगठन में पद और चुनावी टिकट देने के वास्ते ‘वोट’ और ‘पैसा’ दोनों लेते/लिवाते हैं, यह जानते हुए भी कि सामने वाला न तो उनका जनाधार बढ़ा पाएगा और न ही चुनाव जीत/जीतवा पाएगा। ऐसा वो सिर्फ इसलिए करते हैं कि सामने वाला अमीर है, वफादार है, पिछलग्गू भर है या फिर निहित समीकरण वश किसी ने उसकी सिफारिश की है। बेशक कुछ अपवाद भी हो सकते हैं, लेकिन वही जिनके नेहरू-गांधी परिवार से ठीक ठाक सम्बन्ध हैं। अब बात पते की करते हैं। जैसे एक शातिर बंटाईदार अपने भूस्वामी की भूमि पर भी कब्जा कर लेता है और इसमें जब वह असफल होता है तो जमीन मालिक से कम कीमत में उसकी रजिस्ट्री करवाना चाहता है। अनुभवहीन भूस्वामियों को ऐसा करते हुए भी देखा सुना है। ठीक इसी प्रकार लालू प्रसाद और स्व. मुलायम सिंह यादव जैसे नवसियासी बटाईदारों ने कांग्रेस के साथ किया और आज क्षेत्रीय सियासी जमींदार बन बैठे हैं। ऐसा इसलिए सम्भव हो सका, क्योंकि निहित स्वार्थवश पीवी नरसिम्हाराव यही चाहते थे! उनके तिकड़म को सोनिया गांधी नहीं समझ सकीं । वहीं, आज जब राहुल-प्रियंका गांधी की कांग्रेस की रीति नीति देखता हूँ तो इनकी राजनीतिक जमींदारी के हश्र को महसूस भी करता हूँ। कांग्रेस माने या न माने लेकिन समाजवादी, वामपंथी और राष्ट्रवादी सियासी जमींदारों ने उसकी राजनीतिक जमींदारी को क्षत-विक्षत करने में अहम भूमिका निभाई है और हैरत की बात यह है कि वह समझ नहीं पाई और नादान बनी रही जबकि इसके खिलाफ ठोस और जमीनी रणनीति बनानी चाहिए जैसे कि उसके बाद जन्मी भाजपा ने किया है। माना कि सत्ता प्राप्ति के लोभ में क्षेत्रीय दलों से गठबंधन यानी यूपीए/महागठबंधन की सोच तो सही है, लेकिन इनके इशारे पर कांग्रेस संगठन को हांकना कतई सही नहीं है। कांग्रेस इससे इंकार कर सकती है, लेकिन वह आज इसी की पूरी सियासी कीमत अदा कर रही है। आज वह सत्ता में नहीं है, फिर भी उन्हीं लोगों से सहारा ढूंढ रही है जो उसके सियासी पतन के लिए कसूरवार हैं। चूंकि मैंने एआईसीसी/बीजेपी/तीसरे मोर्चे को कवर किया है, इसलिए दावे के साथ कह सकता हूँ कि कांग्रेस के अंग्रेजी भाषी दलाल नेताओं ने उसके जमीनी नेताओं को भाजपा या क्षेत्रीय दलों में जाने के लिए अभिशप्त कर दिया।  चूंकि कांग्रेस के जमीनी नेताओं के पास रणनीति और जनाधार दोनों है, इसलिए वो अपने व्यक्तिवादी मिशन में सफल रहे लेकिन कांग्रेस दिन ब दिन डूबती चली गई। राजनीतिक परिस्थिति वश कभी दो डग आगे तो चार कदम पीछे चलने को अभिशप्त हो गई। इस बात में कोई दो राय नहीं कि किसी भी स्थापित दल को चलाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय लायजनरों की जरूरत पड़ती है लेकिन इनके निहित स्वार्थों के ऊपर यदि ब्लॉक, जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार रखने वाले नेताओं की उपेक्षा की जाएगी तो फिर वोट कहाँ से आएगा, यह सोचने की फुर्सत सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के पास नहीं होगी।  अतीत पर नजर डालें तो एक जमाना था जब गांव-गांव में कांग्रेस के मजबूत शुभचिंतक थे, लेकिन पार्टी की अव्यवहारिक रीति-नीति के चलते वह इससे दूर होते चले गए। दो टूक कहें तो भाजपा में या क्षेत्रीय दलों में शिफ्ट हो गए। ऐसे में आज कांग्रेस के पास सिर्फ उन ‘धनपशुओं’ की टोली बची है जिनको दूसरी राजनीतिक पार्टियां कभी तवज्जो नहीं देतीं। इनका काम कांग्रेस की सत्ता और संगठन के बड़े नेताओं के शाही खर्चों का इंतजाम करना भर है और इसलिए इनके समर्थक ब्लॉक, जिला, राज्य व राष्ट्रीय संगठनों पर हावी हैं।  चूंकि इनका कोई जनाधार नहीं है और ये जनाधार वाले कार्यकर्ताओं को तवज्जो नहीं देते, इसलिए कांग्रेस खत्म होती चली गई। वहीं, जब से क्षेत्रीय कांग्रेस के नेता अस्तित्व रक्षा के लिए बिहार में राजद प्रमुख लालू प्रसाद व तेजस्वी यादव तथा उत्तरप्रदेश में सपा प्रमुख स्व. मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव जैसे मजबूत नेताओं के इशारे पर काम करने लगे, तब से पार्टी संगठन की स्थिति और अधिक दयनीय हो गई।  आलम यह है कि कांग्रेस जैसी राजनीतिक पार्टी, जिसे देश की आजादी का श्रेय प्राप्त है, जब जनजीवन व राष्ट्रीय हितों से इतर प्रमुख जातीय, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय समीकरणों पर खेलने लगी, तो उसकी जोड़-तोड़ से सत्ता तो बदलती रही, परंतु जनाधार छीजता चला गया क्योंकि उसके प्रति निष्ठावान रहे प्रतिभाशाली पेशेवर, कारोबारी, प्रशासक और समाजसेवी आदि उससे दूर होते चले गए। चूंकि पहले क्षेत्रीय दलों और उसके बाद भाजपा ने उन्हें तवज्जो दी, इसलिए वो सब इनके साथ जुड़ गए, जिससे इन्हें अप्रत्याशित मजबूती मिली और कांग्रेस को कमजोरी मुबारक हुई।  अब जब कांग्रेस की ट्रू कॉपी भाजपा बनती जा रही है तो भी कांग्रेस के थिंक टैंक को असली मुद्दे समझ में नहीं आ रहे हैं। शायद उसकी इसी मनोवृत्ति पर चोट करते हुए पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि कांग्रेस को पुराने ढर्रे की राजनीति बंद करनी होगी और नए ढर्रे बनाने होंगे अन्यथा सियासी सफलता मुश्किल है। लिहाजा कांग्रेस की इसी कमजोरी को मजबूती में बदलने का आह्वान पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने किया है।  हाल ही में हरियाणा और महाराष्ट्र में पार्टी और गठबंधन की हुई करारी हार के बाद हुई पहली कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने दो टूक कहा कि अब पार्टी में जवाबदेही तय करने का वक्त आ गया है क्योंकि इन दोनों ही राज्यों में महज चंद महीने पहले पार्टी का प्रदर्शन काफी संतोषजनक रहा था लेकिन अब जो नई दुर्गति सामने आई है, वह हमें नए सिरे से सोचने पर मजबूर करती है। बता दें कि 29 नवंबर 2024 शुक्रवार को हुई कांग्रेस के सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई की इस समीक्षा बैठक में खरगे के अलावा तमाम सीनियर नेता, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस की नवनिर्वाचित सांसद प्रियंका गांधी भी मौजूद थी हालांकि बैठक खत्म होने से पहले ही राहुल और प्रियंका निकल गए। इसी मीटिंग में मल्लिकार्जुन खरगे ने पार्टी के नेताओं के सामने जहां एक ओर इस निराशाजनक प्रदर्शन के लिए तमाम वजहों को गिनाया, वही उन्होंने ईवीएम का मुद्दा भी उठाया।  खरगे का दो टूक कहना है कि पार्टी में अनुशासन की कमी और पुराने ढरें की राजनीति के जरिए जीत नहीं मिल सकती क्योंकि कांग्रेस के भीतर आपसी गुटबाजी एक स्थायी भाव बन चुकी है। उन्होंने इस ओर इशारा करते हुए कहा कि आपसी एकता की कमी और एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी हमें काफी नुकसान पहुंचाती है। जब तक हम एक हो कर चुनाव नहीं लड़ेंगे, आपस में एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी बंद नहीं करेंगे, तब तक अपने विरोधियों को राजनीतिक शिकस्त नहीं दे पाएंगे। इसलिए हमें हर हाल में एकजुट रहना होगा। वहीं, उन्होंने पार्टी में अनुशासन पर जोर देते हुए संकेत दिया कि पार्टी के लोग अपने स्तर पर अनुशासन में बंधें। वैसे तो पार्टी के पास अनुशासन का हथियार है, लेकिन हम नहीं चाहते कि अपने साथियों को किसी बंधन में डाले। वहीं, खरगे ने कांग्रेस की एक और बड़ी कमी की ओर इशारा करते हुए कहा कि पार्टी अपने पक्ष के माहौल को नहीं भुना पाती। उनका कहना था कि चुनावों में माहौल हमारे पक्ष में था लेकिन केवल माहौल पक्ष में होना भर ही जीत की गारंटी नहीं होती। इसलिए अब पार्टी में जवाबदेही तय करने का वक्त आ गया है। क्योंकि पार्टी में अनुशासन की कमी है। पार्टी के भीतर आपसी गुटबाजी एक स्थायी भाव बन चुकी है। सच कहूं तो लोकसभा चुनाव के बाद दो राज्यों में पार्टी की हुई करारी हार के बाद शुक्रवार को सीडब्ल्यूसी मीटिंग में खरगे द्वारा पार्टी की हार की वजहों का जिक्र कोई पहला मौका नहीं था, जब पार्टी ने अपनी कमियों की ओर इंगित किया हो। यह कड़वी सच्चाई है कि कांग्रेस समस्या जानती है, उसका निदान और उपचार भी जानती है, लेकिन इसके लिए जो इच्छा शक्ति की जरूरत होती है, वह पार्टी नेतृत्व में नजर नहीं आती। यही वजह है कि 2014 के आम चुनाव के बाद असेबली चुनावों में पार्टी की हो रही लगातार हार के बाद 2016 में कांग्रेस के तत्कालीन महासचिव दिग्विजय सिंह ने पार्टी में मेजर सर्जरी की जरूरत बताई थी लेकिन हुआ कुछ नहीं। उल्टे जी-23 में से ज्यादातर को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसलिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि खरगे द्वारा पार्टी की कमियों की ओर किया गया यह इशारा क्या वाकई पार्टी और नेताओं के भीतर कोई बदलाव लाएगा? क्या पार्टी अनुशासन की ब्लेड से मेजर सर्जरी कर पाएगी या फिर यह भी बस एक महज खानापूर्ति बन कर रह जाएगा? क्योंकि खरगे का यह सुझाव सही है कि हमें माहौल को नतीजों में बदलना सीखना होगा। उन्होंने जीत के लिए भरपूर मेहनत के साथ-साथ समयबद्ध तरीके से रणनीति बनाने और संगठन की मजबूती पर जो जोर दिया है, वह भी पते की बात है। उनका सुदीर्घ अनुभव इसमें झलकता है।उन्होंने सटीक आईना दिखाया है कि सिर्फ माहौल पक्ष में होना भर ही जीत की गारंटी नहीं होती। क्योंकि भाजपा इसे अपने पक्ष में करना जानती है। हरियाणा से लेकर महाराष्ट्र तक उसने यही किया है। खरगे का कहना भी सही है कि हमें अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना होगा। हमें मतदाता सूची बनाने से लेकर वोट की गिनती तक रात-दिन सजग, सचेत और सावधान रहना होगा। हमारी तैयारी शुरू से लेकर मतगणना तक ऐसी होनी चाहिए कि हमारे कार्यकर्ता और सिस्टम मुस्तैदी से काम करें। वहीं उन्होंने राज्यों को भी अपना संगठन मजबूत करने पर जोर देते हुए कहा कि राष्ट्रीय मुद्दों और राष्ट्रीय नेताओं के सहारे राज्यों का चुनाव आप कब तक लड़ेंगे? उन्होंने प्रदेश संगठनों से कहा कि हाल के चुनावी नतीजों का संकेत यह भी है कि हमें राज्यों में अपनी चुनाव की तैयारी कम से कम एक साल पहले शुरू कर देनी चाहिए। उन्होंने यह कहते हुए राजनीतिक दूरदर्शिता दिखाई है कि हमारी टीम समय से पहले मैदान में मौजूद रहनी चाहिए। जो कि अपने प्रतिद्वंद्वी की तैयारियों पर नजर रखने में सक्षम हो।  वाकई ऐसा संभव हुआ तो यह कांग्रेस के लिए पुनर्जन्म जैसा होगा। लेकिन सुलगता सवाल फिर वही कि  क्या पार्टी के नेताओं के अंदर अब कोई बदलाव आएगा? क्या उनके घिसे-पिटे सियासी एजेंडे और तुष्टिकरण की नीति में आमूलचूल बदलाव आएगा? क्या उनकी क्षुद्र जातीय नीतियां बदलेंगी और राष्ट्रनिर्माण के वास्ते को कोई अग्रगामी और निर्णायक कदम उठा पाएंगे! इंतजार करना श्रेयस्कर रहेगा।

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