कमलेश पांडेय

कमलेश पांडेय

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वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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राजनीति

संविधान निर्माता अम्बेडकर के अपमान पर मचे सियासी तूफान के पूंजीवादी एजेंडे को ऐसे समझिए 

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लीजिए, हमारे विपक्षी नेताओं को एक और अपमानजनक मुद्दा मिल गया ताकि संसद की जनहितकारी कार्यवाही को बाधित कर दिया जाए और सड़क से संसद तक हंगामा खड़ा करके लोगों को गोलबंद किया जाए। इससे मिशन आम चुनाव 2029 की विपक्षी राह आसान हो जाएगी। बताया जाता है कि एक संसदीय चर्चा के दौरान संसद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने यह कह दिया है कि आजकल आंबेडकर का नाम लेना सियासी फैशन हो गया है। इतना नाम भगवान का लेते तो सात जन्मों के लिए स्वर्ग मिल जाता।  बकौल शाह, “आंबेडकर-आंबेडकर-आंबेडकर क्यों कह रहे हो? आप अगर भगवान-भगवान कहेंगे तो 7 पीढ़ियां आपकी स्वर्ग में जाएंगी।” बस इसी बयान को लेकर प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी का विरोध करना शुरू कर दिया है।  इस प्रकार विभिन्न दलों के समर्थन-विरोध और बचाव की सियासत के बीच संसद में धक्कामुक्की तक की नौबत आई गई और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी व उनके साथियों के विरुद्ध भाजपा नेताओं द्वारा एफआईआर तक दर्ज करवाना पड़ा। उधर, कांग्रेस ने भी भाजपा सांसदों के खिलाफ शिकायत दी है। इससे बिखरते इंडिया गठबंधन को थोड़ी सी राहत भी मिल गई, क्योंकि जो नेता राहुल गांधी का विरोध करते थे, वही अब उनकी भाषा पुनः बोलने लगे। चूंकि फरवरी 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव और नवम्बर 2025 में ही बिहार विधानसभा चुनाव की सियासी वैतरणी पार करनी होगी, तो मुद्दा चाहिए। इसलिए कांग्रेस ने मनमाफिक मुद्दा ढूंढ लिया। भाजपा ने अपनी नीतियों से मुसलमानों को उसके लिए बुक ही कर दिया है और भाजपा से दलितों को हड़पने के लिए वह संविधान बदलने से लेकर अम्बेडकर के अपमान तक के मुद्दे को हवा दे चुकी है। ऐसा इसलिए कि कांग्रेस का ‘दम समीकरण’ दलित-मुस्लिम गठजोड़ मजबूत हो। बता दें कि इसी को मजबूत करते करते लोकजनशक्ति पार्टी के संस्थापक स्व. रामविलास पासवान और उनके पुत्र केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान भाजपा की गोद में जा बैठे।  वहीं, दम समीकरण की दूसरी प्रबल पैरोकार समझी गईं बसपा नेत्री और यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की सियासी दुर्गति आप लोग देख ही रहे हैं, जिनपर भाजपा की बी टीम होने के आरोप लगते आए हैं। इसलिए इसी दम समीकरण पर अपना दावा मजबूत करते करते कांग्रेस क्या गुल खिलाएगी, अभी कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि इसी समीकरण ने लोकसभा चुनाव 2024 में उसे 10 वर्षों के सियासी दुर्दिन से मुक्ति दिलाई है।  यह बात दीगर है कि कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष बनते ही उसकी सियासी सौतनों यानी इंडिया गठबंधन के साथी दलों की नींद उड़ चुकी है। इसलिए हरियाणा और महाराष्ट्र में दलितों के छिटकते ही विपक्षी आलोचना का केंद्रविन्दु बनी कांग्रेस ने अंबेडकर के अपमान को ऐसा तूल दिया और आक्रामक रणनीति अपनाई कि संसद में धक्कामुक्की कांड हो गया। इससे राहुल गांधी पुनः विपक्षी नेताओं के हीरो बनते प्रतीत हो रहे हैं। अब उम्मीद की जा रही है कि कांग्रेस इस मुद्दे से ही दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों के बाद 2027 में उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव और फिर 2028 में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों को जीतने की रणनीति बनाएगी। चूंकि इसी बीच कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, पश्चिम बंगाल आदि विधानसभाओं के भी चुनाव इलेक्शन कैलेंडर के मुताबिक होंगे, इसलिए कांग्रेस जातिगत जनगणना के बाद अंबेडकर के अपमान को भी मुख्य मुद्दा बनाएगी क्योंकि भाजपा भी इन्हीं दोनों मुद्दों पर कांग्रेस के ऊपर तार्किक सवाल उठाती आई है। राजनीतिक टिप्पणीकारों की बातों पर गौर करें तो राष्ट्रपति महात्मा गांधी, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी के ‘हत्यारोपी’ हिंदूवादी नेता वीर सावरकर, और अब संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ भीमराम अम्बेडकर के ऊपर हुई सियासी टीका-टिप्पणी कोई नई बात नहीं है, बल्कि नई बात तो यह है कि गांधी-नेहरू का अपमान सहते रहने वाली कांग्रेस ने अम्बेडकर के अपमान को सियासी मुद्दा बनाकर एक तीर से दो शिकार कर रही है।  पहला तो यह कि दलितवादी दलों और ओबीसी की राजनीति करने वाले दलों से वह मुद्दे लपक चुकी है और इसी को धार दे रही भाजपा को जन कठघरे में खड़ा करके अपना सियासी उल्लू सीधा करने की कवायद तेज कर चुकी है। अपने देखा होगा कि इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, राममनोहर लोहिया, वीपी सिंह, लालूप्रसाद, मान्यवर कांशीराम, मायावती, रामविलास पासवान, लालकृष्ण आडवाणी, अटलबिहारी बाजपेयी आदि अनगिनत नेताओं के ऊपर सियासी टिपण्णी हुई, लेकिन बात का इतना बतंगड़ कभी नहीं बना।  कभी आजादी, कभी आरक्षण, कभी समता, कभी समरसता, कभी वामपंथ, कभी समाजवाद और कभी राष्ट्रवाद के सवाल पर सियासत हुई। रोटी कपड़ा और मकान के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान की सियासत भी हुई। जय जवान, जय किसान से लेकर जय विज्ञान तक के उदघोष हुए। सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास तक की बातें हुईं। लेकिन जनता की माली हालत उबचुब करती रही। पिछले तीन दशकों में अमीरी और गरीबी की खाई हर रोज चौड़ी हो रही है।  एक और कड़वी सच्चाई यह है कि निर्वाचित नेताओं की आय रॉकेट की गति से बढ़ रही है पर समतामूलक समाज स्थापित करने के संवैधानिक प्रयत्न नदारत रहे। क्योंकि जब भी सर्वहितकारी कुछ बात शुरू हुई तो दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों को कानूनी ढाल बना दिया गया। कुछ लोगों को आरक्षण दिया गया और उनका समर्थन हासिल करके कहीं पारिवारिक राजनीति को मजबूत किया गया तो कहीं राजकोषीय लूट मचाई गई। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति तो यह कि कहीं कोई प्रशासनिक और न्यायिक संतुलन स्थापित करने की कोशिश नहीं की गई। या तो कानून स्वहित के अनुरूप बने या फिर परिभाषित किये गए। दुष्प्रभाव सबके सामने है। हिंसा-प्रतिहिंसा और असमानता हमारी नियति बन चुकी है। यह कड़वी सियासी सच्चाई यह है कि सन 1990 के दशक के पूर्वार्द्ध से देश में लागू ‘नई आर्थिक नीतियों’ के दुष्परिणाम स्वरूप भारतीय संसद जनहितकारी मुद्दों से अपना पिंड छुड़ाती हुई प्रतीत हो रही है और सिर्फ पूंजीवादी एजेंडों को पूरा करने की गरज से जनमानस के बीच भावनात्मक मुद्दों को हवा दे रही है। इन नीतियों को देश में लागू करने वाली कांग्रेस और फिर बाद में उसकी समर्थक बन चुकी भाजपा (स्वदेशी आंदोलन को भूलकर) ने पूंजीवादी राजनीति को इतनी हवा दी कि क्षेत्रीय सियासत ही हाशिए पर आ गई।  इसलिए क्षेत्रीय दलों को भाजपा और कांग्रेस के इस सियासी पेंच को समझना चाहिए, लेकिन ये भी इन दोनों दलों के गठबंधन के मोहरे बन चुके हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए कि सियासत के लिए जो जरूरी आर्थिक खाद-पानी चाहिए, वो सिर्फ पूंजीवादी कम्पनियां ही पूरी कर सकती हैं। आप गौर कीजिए कि 1990 के दशक से शुरू हुए कम्पनी राज के बाद जीवन चर्या कितनी महंगी होती जा रही है। मानवीय संवेदनाओं से परे सबकुछ को मौद्रिक पैमाने पर तौलने की बाजारू प्रवृत्ति ने खान-पान, दवा-दारू, रहन-सहन से लेकर परिवहन तक को महंगा कर दिया और गुणवत्ता के मामलों में भगवान भरोसे छोड़ दिया।  वहीं, कभी कांग्रेस और कभी भाजपा के वर्चस्व वाली  संसद मजबूत कानूनों को पूंजीपतियों के लिहाज से कमजोर करती रही  जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, परिवहन आदि के क्षेत्रों में व्याप्त अराजकता बढ़ती चली गई। यह आज भी जारी है। समाज में रूपये के बढ़ते बोलबाले से प्रशासनिक तंत्र और अधिक भ्रष्ट हो गया। सियासत में ओबीसी, दलित व अल्पसंख्यक शब्दों के बढ़ते बोलबाले से जो जनप्रतिनिधियों की फौज संसद में आई, उन्होंने जाने-अनजाने सियासत को भ्रष्ट कर दिया। आलम यह है कि यथा राजा-तथा प्रजा और यथा प्रजा-तथा राजा का अंतर मिट चुका है। जनप्रतिनिधियों के विशेषाधिकार और न्यायाधीशों के न्यायिक अवमानना के अधिकारों ने मीडिया के मुंह सील दिए। देश में अब स्वस्थ राजनीतिक बहस की कोई गुंजाइश नहीं बची है क्योंकि पहले आजादी, फिर समाजवाद, उसके बाद हिंदूवाद की सियासत हुई, जिसमें अल्पसंख्यक तुष्टिकरण, जातीय तुष्टिकरण, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, दलित-पिछड़ा-आदिवासी गोलबंदी, फिर इनकी आपसी सिरफुटौव्वल के बीच पूंजीवादी राजनीतिक अपनी जड़ जमाती रही और लोगों के मूलभूत रोजगार से लेकर जीवन यापन तक की नीतियां हाशिए पर चली गईं। अब जो भी दिखावटी जनहितकारी नीतियां लागू की जा रही हैं, उसके पीछे कॉरपोरेट लूट का एजेंडा सर्वप्रथम है, जिसे समझने में हमारे अधिकांश नेता व उनकी समर्थक अशिक्षित या कम शिक्षित जनता नाकाम रही है। आधार कार्ड, मुफ्त आवास, मुफ्त या कम ब्याज दर ऋण, डीबीटी जैसे जितने भी नव आर्थिक उपाय किए गए, सबका मकसद कम्पनियों को लाभ पहुंचना है। लोगों के पास काम नहीं है और सरकार एआई पर जोर दे रही है। सत्ता में मशीनीकरण के घुसपैठ से सिर्फ पूंजीवादियों का ही भला होगा।  सच कहूं तो एक देश, एक चुनाव भी उनका ही एजेंडा है ताकि छोटे छोटे दल समाप्त हो जाएं। छोटी-छोटी कम्पनियों को उनका ऑनलाइन बाजार लूट ही चुका है। इसलिए देश जनक्रांति की बाट जोह रहा है, क्योंकि वैश्विक पूंजीवादी ताकतों के इशारे पर थिरक रही भारतीय कम्पनियों से मुट्ठी भर लोगों का भला होगा, जबकि बहुत बड़ी आबादी भावनात्मक मुद्दों पर उलझी हुई है और किसी राष्ट्रीय अभिशाप से कम नहीं है। सवाल पुनः वही कि भावनाओं को भड़काकर सियासी रोटी सेंकने की कांग्रेस-भाजपा की चाल को आखिर कब तक समझेंगे हमारे क्षेत्रीय दल और जनहित की रक्षा के लिए उन पर दबाव बढ़ाएंगे, अन्यथा एक समय बाद वो भी लोगों के बीच अप्रासंगिक हो जाएंगे। कमलेश पांडेय

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राजनीति

पॉलिटिकल सेलिब्रिटी प्रियंका गांधी के ‘गांधीवादी थैले’ की सियासत

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कमलेश पांडेय पॉलिटिकल सेलिब्रिटी, कांग्रेस महासचिव और वायनाड सांसद प्रियंका गांधी का ‘बौद्धिक गांधीवादी थैला’ अब एक नहीं बल्कि दो अंतरराष्ट्रीय विवादों की ओर लोगों का ध्यान बरबस खींच चुका है जिसमें इजरायल द्वारा फलस्तीनी सुन्नी मुसलमान उत्पीड़न और बंगलादेशी हिन्दू/ईसाई उत्पीड़न का मसला प्रमुख है। इस बीच सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के सवालों और जवाबों के बीच उत्तर प्रदेश के फायर ब्रांड मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यूपी-इजराइल से जुड़ी रोजगारपरक टिप्पणी ने इस मामले पर देशी तड़का जड़ दिया है।  इससे सोशल मीडिया पर शुरू हुईं सांप्रदायिक बहसों के साथ-साथ पापी पेट के सवाल को भी एक नया दूरदर्शी आयाम मिल चुका है, वहीं,  यदि राजनीतिक नजरिए से देखें तो पहले सुन्नी मुस्लिम बहुल फलस्तीन से जुड़े सवालों पर गांधीवादी थैला संसद में जाते ववक्त प्रदर्शित करके और उस पर विवाद उत्पन्न होने के बाद दूसरे दिन बंगलादेशी हिंदुओं और ईसाइयों के उत्पीड़न से जुड़ा दूसरा थैला प्रदर्शित करके युवा सांसद प्रियंका गांधी ने अपने पूर्वज प्रधानमंत्रियों- जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के कांग्रेसी मध्यम मार्ग पर पुनः लौटने का दूरदर्शिता पूर्ण संकेत दिया है। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि जहां पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने कांग्रेस को दक्षिण मुखी बनाने के चक्कर में उत्तर भारतीयों को पार्टी से दूर कर दिया, वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अल्पसंख्यक प्रथम की बात छेड़कर बहुसंख्यकों को नाराज कर दिया। जानकार बताते हैं कि ऐसा करके इन लोगों ने भले ही अपना-अपना गठबंधन कार्यकाल पूरा कर लिया, लेकिन कांग्रेस खोखली होती गई।  हालांकि, उसके बाद पार्टी का जनाधार इतना लुढ़का कि 2014 और 2019 में उसे नेता प्रतिपक्ष का तमगा भी नहीं मिला। हां, राहुल गांधी के जुझारूपन ने 2024 में यह तमगा हासिल कर लिया और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद अपनी बहन प्रियंका गांधी को भी सेफ सियासी मोड में अपनी छोड़ी हुई सीट से लोकसभा ले आए। वहीं, लोकसभा में आते ही प्रियंका गांधी ने “लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ” वाले तेवर दिखाने शुरू कर दिए। सर्वप्रथम उन्होंने भारतीय संविधान के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में लोकसभा में आयोजित विशेष बहस पर प्रथम विपक्षी सम्बोधन देते हुए और उसके बाद बैग पॉलिटिक्स को हवा देकर जनमानस को यह संकेत दे दिया कि भाई-बहन की यह जोड़ी कोई न कोई नया सियासी गुल खिलाती रहेगी जो कि राजनीति की पहली शर्त समझी जाती है।  वहीं बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच इंडिया गठबंधन के सहयोगियों को अपनी हद में रहने के परोक्ष संकेत देकर भाई-बहन की जोड़ी ने अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को भी स्पष्ट कर दिया है क्योंकि उन्हें पता है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प केवल कांग्रेस है जिसे जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए चुनावी वैशाखियों को उनकी हद में रखना होगा ताकि कार्यकर्ताओं के मनोबल ऊंचे रहें। वहीं, पीएम मोदी के प्रबल विरोधों के बीच राहुल गांधी की अल्पसंख्यक समर्थक और उद्योगपति विरोधी छवि बनने से भी कांग्रेस भीतर ही भीतर चिंतित है। इसलिए उसने प्रियंका गांधी को आगे करके अपना मध्यम मार्ग वाला कांग्रेस कार्ड फिर फेंका है ताकि इंडिया गठबंधन में नेतृत्व के सवाल पर यदि कांग्रेस अलग थलग भी पड़ जाए तो उसका मध्यममार्गी स्वरूप जनमानस को रिझाए, जिसके दम पर वह लगभग 6 दशकों तक वामपंथियों और दक्षिणपंथियों को पछाड़ती रही है। यही वजह है कि राहुल गांधी के साथ साथ प्रियंका गांधी ने भी खुद को सियासी चर्चा का विषय बनाये रखने के लिए अपने नवप्रयोगों को हवा दी जिससे राजनीतिक चर्चाओं का कोर्स ही बदल गया। बताते चलें कि संसद के मौजूदा सत्र से अपनी संसदीय पारी की शुरुआत करने वाली कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी के बैग इन दिनों खासी चर्चा और विवाद का केंद्र बन रहे हैं। इससे उनकी इंदिरा गांधी वाली छवि भी परिपुष्ट हुई है।  कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी की रणनीति है कि 2029 में मोदी-योगी के मुकाबले राहुल-प्रियंका के फेस को इतना मजबूत बना दिया जाए कि उन्हें इंडिया गठबंधन के सहयोगी मनमाफिक नचाने की जुर्रत ही नहीं कर सकें क्योंकि वह इस बात को समझती हैं कि पीएम फेस के लिए राहुल का मुकाबला मोदी, योगी, फडणवीस, सम्राट आदि से कम और अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल जैसों से ज्यादा होगी। इसलिए उन्होंने कांग्रेस को अपने बूते आगे बढ़ाने का निश्चय किया है और रणनीतिक रूप से गठबंधन सहयोगियों के लिए अपने दरवाजे खोल रखे हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर ! यही वजह है कि कांग्रेस ने अदाणी मुद्दे पर विरोध करने के बाद इंडिया गठबंधन के सपा और टीएमसी जैसे सहयोगियों के साथ छोड़ते ही गत सोमवार को प्रियंका गांधी ने अपने बैग पॉलिटिक्स शुरू कर दी ताकि इंडिया गठबंधन के सहयोगियों पर भी नैतिक दबाव बढ़े। समझा जाता है कि अपने बैग को लेकर वह उस समय चर्चा का केंद्र बन गईं, जब उन्होंने फलस्तीन लिखा बैग अपने कंधे पर लटकाया हुआ था और संसद में प्रवेश कर रही थीं।  हालांकि इस पर मचे बवाल के बाद भी प्रियंका रुकी नहीं, और वह मंगलवार को बांग्लादेश के मौजूदा हालात पर टिप्पणी करते बैग को कंधे पर लटकाकर सदन में नजर आईं। खादी के सफेद झोला नुमा बैग पर लिखा था- ‘बांग्लादेश के हिंदुओं और ईसाइयों के साथ खड़े हों। बताया जाता है कि इस बैग को अपने साथ टांगने वाली प्रियंका अकेली नहीं थीं  बल्कि कई कांग्रेस सांसदों ने ऐसे ही बैग को अपने साथ लेकर बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं व ईसाइयों पर हो रहे अत्याचार के विरोध में गत मंगलवार को ही संसद परिसर में प्रदर्शन किया।  देखा गया कि कांग्रेस सांसदों ने सदन की बैठक शुरू होने से पहले मुख्य द्वार के पास अपना विरोध प्रदर्शन किया जहां प्रियंका सहित तमाम सांसदों ने अपने हाथ में थैला भी ले रखा था, जिस पर ‘बांग्लादेश के हिंदुओं और ईसाइयों के साथ खड़े हों’ लिखा हुआ था। यही वजह है कि प्रियंका गांधी के बैग पर गरमाती सियासत के बीच यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी उन पर निशाना साधा है क्योंकि वह एक असफल यूपी प्रभारी भी रह चुकी हैं। योगी का कहना था कि हम यूपी के युवाओं को कमाने के लिए इजराइल भेज रहे हैं और कांग्रेस सांसद फलस्तीन का बैग लेकर घूम रही हैं।  हालांकि इस पर मचे विवाद के बाद प्रियंका गांधी ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मैं क्या पहनूंगी, यह कौन तय करेगा? यह पैतृक समाज ही है जो यह तय करता है कि महिलाएं क्या पहनेंगी? उनका कहना था कि मैं कई बार बता चुकी हूं कि इस बारे में मेरी क्या मान्यताएं हैं. अगर आप मेरा ट्विटर हैंडल देखेंगे तो वहां आपको मेरा बयान मिलेगा। वहीं, भाजपा नेताओं ने इस पर तल्ख टिप्पणी की कि एक्स (ट्वीटर), बैग और बयानों से वह लोगों का ध्यान चाहे जितना खींच लें, लेकिन अपनी पार्टी में कार्यकर्ताओं के अकाल को दूर करने के लिए उन्हें सड़कों की धूल फांकनी ही पड़ेगी। राष्ट्रवादी मुद्दों की ओर लौटना ही पड़ेगा अन्यथा विपक्षियों की नेत्री बनने की सियासत वो करती रहें, सत्ता की दिल्ली अभी उनके लिए बहुत दूर है ! कमलेश पांडेय

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राजनीति विश्ववार्ता

जानिए, ग्रेटर इजरायल प्लान क्या है? इसको अमेरिकी समर्थन क्यों हासिल है? ग्रेटर इंडिया प्लान से इसका क्या रिश्ता है?

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कमलेश पांडेय क्या आपको पता है कि19वीं सदी में यहूदीवाद (जायोनिज्म) आंदोलन की आधारशिला रखने वाले थियोडोर हर्जेल ने एक ऐसे यहूदी देश की अवधारणा रखी थी जो अरब के एक बड़े इलाके में फैला हुआ होगा। यदि नहीं तो आपके लिए यह जानना जरूरी है कि यहूदीवाद, यहूदियों का तथा यहूदी संस्कृति का राष्ट्रवादी […]

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