विविधा ज़िन्दगी तो तभी जी ली, जब साथ-साथ खेलें है : kanishka July 3, 2009 / December 27, 2011 | Leave a Comment उपर दूर आसमां तन्हा सामने गुजरगाह तन्हां जिस्म तन्हा, जां तन्हा आती हुई सबा तन्हा पहले भी हम थे तन्हा आज भी अकेले हैं सुना हर यूं लम्हा क्यूं? मेरा मुकद्दर तन्हा क्यूं? खुद को पल-पल ढूंढ रहा मेरे चारो तरफ़ मेले हैं और जीने की चाह कहां? बुझने की परवाह कहां? ज़िन्दगी तो तभी […] Read more » Love ज़िन्दगी
विविधा कनिष्क कश्यप: उस रेत पे अपना नाम लिख ता-उम्र निशानी दे चलो June 17, 2009 / December 27, 2011 | Leave a Comment मुझे ख्वाहिसों की कस्ती पे सागर के पार ले चलो ज़हां हर लहर लिख जाती रेत पर एक नयी कहानी कुछ बरसते बादल और हवाएं मिटा देते उनकी निसानी उस रेत पर अपना नाम लिख ता-उम्र निशानी दे चलो है पार सागर के अपना जहां किसी को है इंतज़ार वहां इस भंवर से निकल आँखों […] Read more » Love रेत
विविधा सहारे कब तक दिया करोगी? June 17, 2009 / December 27, 2011 | 1 Comment on सहारे कब तक दिया करोगी? इतनी चाहत क्युं है मुझसे ख्वाबों में हरपल आती हो मुझे हंसाती, मुझे मनाती आस के मंजर बनाती बाहों के दरमियान रौशनी बन सिमटी जाती कब तक मेरे ख्वाहिसों की गुलामी तुम किया करोगी सहारे कब तक दिया करोगी? आखें बस तुम्हे ढुढंती हैं जुबां बस तुम्हे पुकारती जगते हुए तुम्हे हीं देखता सपने भी […] Read more » Love Life
कविता विविधा कनिष्क कश्यप : अक्श बिखरा पड़ा है आईने में June 10, 2009 / December 27, 2011 | 3 Comments on कनिष्क कश्यप : अक्श बिखरा पड़ा है आईने में अक्श बिखरा पड़ा है आईने में मैं जुड़ने कि आस लिए फिरता हूँ कदम तलाशते कुछ जमीं हाथों पर आकाश लिए फिरता हूँ कठोर हकीक़त है है मेरा आज कल खोया विस्वास लिए फिरता हूँ कदम उठते पर पूछते कुछ सवाल क़दमों का उपहास लिए फिरता हूँ कामयाबियां खुशी नहीं दे पाती ऐसी कमी का […] Read more » Mirror आईने
आर्थिकी खेत-खलिहान समाज सार्थक पहल क्या इन ८ सवालों के जवाब हैं ……….. आज के आर्थिक विशेषज्ञों के पास : कनिष्क कश्यप June 10, 2009 / December 27, 2011 | 2 Comments on क्या इन ८ सवालों के जवाब हैं ……….. आज के आर्थिक विशेषज्ञों के पास : कनिष्क कश्यप क्या इन ८ सवालों के जवाब हैं, अगर हाँ ? तो हमें बताएं ! क्यों की पश्चिम के पिचासी संस्कृति का दिन-ब-दिन हावी होते जाना, हमारी अपनी कमजोरी और मानसिक दिवालियापन का सूचक तो नहीं ? बाज़ार शब्द अपनी शाब्दिक परिधि तक तो बड़ा हीं मोहक और प्रभावी लगता है, इससे बहार निकलते हीं यह मर्यादायों को […] Read more » Economic Expert आर्थिक विशेषज्ञ
गजल तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते June 5, 2009 / December 27, 2011 | 2 Comments on तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते तेरे ग़म के पनाह में अर्से बिते Read more » Sorrows ग़म