आलोचना जाति, न्याय और लोकतंत्र : एक असहज सच्चाई February 5, 2026 / February 5, 2026 | Leave a Comment भारत का लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक नैतिक संकल्प है—समानता, न्याय और बंधुत्व का। संविधान की प्रस्तावना इसी संकल्प का उद्घोष करती है। Read more » न्याय और लोकतंत्र
आर्थिकी आलोचना संतुलन की पतली रस्सी पर बजट 2026 February 2, 2026 / February 2, 2026 | Leave a Comment बजट 2026 Read more » बजट 2026
समाज रिश्ते, शर्तें और डर से घिरी एक पीढ़ी February 2, 2026 / February 2, 2026 | Leave a Comment आज के समय में यदि कोई सबसे जोखिम भरा सामाजिक कार्य है, तो वह है—किसी को रिश्ते की बात कहना। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि हमारे बदलते सामाजिक मानस की सच्चाई है। Read more »
महिला-जगत लेख मासिक धर्म और सैनिटरी पैड: स्कूलों में गरिमा की परीक्षा February 2, 2026 / February 2, 2026 | Leave a Comment – डॉ. प्रियंका सौरभ सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्कूलों में छात्राओं को निःशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने और मासिक धर्म स्वच्छता को अनिवार्य करने संबंधी निर्देश केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय समाज की उस सामूहिक सोच को आईना दिखाते हैं, जिसमें आज भी मासिक धर्म को संकोच, चुप्पी और उपेक्षा के साथ […] Read more » मासिक धर्म और सैनिटरी पैड
लेख आशा-आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का स्वैच्छिक योगदान January 27, 2026 / January 27, 2026 | Leave a Comment -डॉ. प्रियंका सौरभ भारत के ग्रामीण समाज में महिला सशक्तिकरण, पोषण और स्वास्थ्य काफी हद तक आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर निर्भर करता है। ये वे महिलाएं हैं जो घर-घर जाकर टीकाकरण करती हैं, बच्चों में कुपोषण का पता लगाती हैं, गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव में सहायता करती हैं और मातृ एवं शिशु मृत्यु […] Read more » आशा-आंगनवाड़ी कार्यकर्ता
समाज कन्यादान नहीं, सम्मान चाहिए January 27, 2026 / January 27, 2026 | Leave a Comment – डॉ. प्रियंका सौरभ आज विश्व बालिका दिवस मनाया जा रहा है। देश और दुनिया में इस अवसर पर अनेक कार्यक्रम, संगोष्ठियाँ और प्रतीकात्मक आयोजन हो रहे हैं। मंचों से बालिकाओं के सम्मान, सुरक्षा और सशक्तीकरण की बातें कही जा रही हैं। लेकिन यह प्रश्न बार-बार सामने आता है कि क्या किसी एक दिवस का […] Read more » कन्यादान नहीं सम्मान चाहिए
समाज वाइफ स्वैपिंग’ और हमारे रिश्तों की टूटती नींव: समाज का आईना January 23, 2026 / January 23, 2026 | Leave a Comment – डॉ. प्रियंका सौरभ कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर लिखना आसान नहीं होता। वे केवल शब्दों की नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और नैतिक साहस की भी माँग करते हैं। यह विषय भी उन्हीं में से एक है, जहाँ चुनौती केवल प्रस्तुति की नहीं, बल्कि उस सच को सामने लाने की है जिसे समाज […] Read more » वाइफ स्वैपिंग
धर्म-अध्यात्म ऋतु परिवर्तन का लोकउत्सव: लोहड़ी और नई ऋतु की दस्तक January 12, 2026 / January 12, 2026 | Leave a Comment लोहड़ी का उत्सव प्रकृति के उस चक्र का उत्सव है, जिसमें हर ठहराव के बाद गति और हर कठिनाई के बाद संभावना जन्म लेती है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि जीवन केवल संघर्ष नहीं है, Read more »
लेख सड़क दुर्घटना मुआवज़ा और संविधान : आय से परे मानवीय गरिमा की तलाश January 6, 2026 / January 6, 2026 | Leave a Comment मोटर वाहन अधिनियम में अपनाई गई ‘मल्टीप्लायर पद्धति’ पीड़ित की आय, आयु और आश्रितों की संख्या के आधार पर मुआवज़ा निर्धारित करती है। इसका उद्देश्य यह माना गया कि दुर्घटना से पूर्व जिस आर्थिक स्थिति में परिवार था, उसे यथासंभव पुनर्स्थापित किया जा सके। किंतु इस पद्धति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह मनुष्य के जीवन Read more » Road Accident Compensation and the Constitution The Search for Human Dignity Beyond Income
धर्म-अध्यात्म धर्म का स्वरूप: सेवा या स्वार्थ? January 2, 2026 / January 2, 2026 | Leave a Comment आज का यथार्थ यह है कि धार्मिक परंपराओं का एक बड़ा हिस्सा अपने मूल उद्देश्य से भटक चुका है। जिन कर्मकांडों का उद्देश्य मनुष्य को आत्मिक संतुलन देना था, वे अब आर्थिक लेन-देन और दिखावे से जुड़ गए हैं। तीर्थस्थल, जो कभी तप, त्याग और साधना के केंद्र हुआ करते थे, आज कई बार बाजार का रूप धारण कर चुके हैं। श्रद्धालु की भावना से अधिक उसकी आर्थिक स्थिति को महत्व दिया जाने लगा है। Read more » धर्म का स्वरूप
कविता बेक़द्र December 22, 2025 / December 22, 2025 | Leave a Comment बेक़द्रों के हाथ अगर चाँद भी लग जाए, वो उसको भी ग्रहण लगाने का हुनर रखते हैं। Read more » बेक़द्र
राजनीति संसद का अवरुद्ध स्वर और लोकतंत्र की कसौटी December 18, 2025 / December 18, 2025 | Leave a Comment संसद में व्यवधान कोई नया विषय नहीं है। विरोध, असहमति और सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए प्रतिपक्ष की भूमिका लोकतंत्र में अनिवार्य है। किंतु जब विरोध का प्रमुख औजार निरंतर हंगामा, नारेबाजी और कार्यवाही ठप करना बन जाए, तब यह प्रश्न उठता है कि क्या संसद अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर पा रही है। Read more » लोकतंत्र की कसौटी