बेर कहाँ हैं झरबेरी के

बाल वीर या पोगो ही,
देखूंगी ,गुड़िया रोई।
चंदा मामा तुम्हें आजकल,
नहीं पूछता कोई।
आज देश के बच्चों को तो,
छोटा भीम सुहाता।
उल्टा चश्मा तारक मेहता,
का भी सबको भाता।
टॉम और जेरी की जैसे,
धूम मची है घर में।
बाल गणेशा उड़ कर आते,
अब बच्चों के मन में।
कार्टून की गंगा में अब,
बाल मंडली खोई।
टू वन जा टू का ही टेबिल,
बच्चे घर घर पढ़ते।
पौआ अद्धा पौन सवैया,
बैठे कहीं दुबक के।
क्या होते उन्नीस ,सतासी,
नहीं जानते बच्चे।
हिंदी से जो करते नफरत ,
समझे जाते अच्छे।
इंग्लिश के आंचल में दुबकी,
हिंदी छुप छुप रोई।
आम नीम के पेड़ों पर अब,
कौन झूलता झूला।
अब्बक दब्बक दाँय दीन का,
खेल जमाना भूला।
भूले ताल तलैया सर से,
कमल तोड़कर लाना।
भूले खेल खेल में इमली,
बरगद पर चढ़ जाना।
बेर कहाँ हैं झरबेरी के?
न ही पता मकोई।

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव
लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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