कविता

गधों पर दाँव

गधों पर दाँव लगाओगे तो रेस क्या जीतोगे,
ऐसी चोट खाओगे कि चलना भी भूल जाओगे।

झूठों के साथ रहोगे तो सच कहाँ पाओगे,
आईना जब दिखेगा, नज़रें भी चुरा जाओगे।

भीड़ के संग चलोगे तो खुद को कहाँ पाओगे,
राह अपनी न चुनी तो मंज़िल भी गंवा जाओगे।

अहंकार की आग में खुद को ही जलाओगे,
राख बनकर एक दिन, पछताते रह जाओगे।

सच्चे रिश्ते छोड़कर मतलब में उलझ जाओगे,
वक़्त जब बदलेगा तो तनहा ही रह जाओगे।

मेहनत से जो भागे, क्या मुकाम पाओगे,
ख़्वाब अधूरे रहेंगे, यूँ ही सोते रह जाओगे।

काबिलों को छोड़कर नाकाबिल अपनाओगे,
डूबती उस नाव में खुद भी उतर जाओगे।

‘मन’ की बात न सुनोगे तो सुकून कहाँ पाओगे,
ज़िंदगी के मोड़ पर बस भटकते रह जाओगे।

  • डॉ. सत्यवान सौरभ