बहिर् ने खींचा, अंतर ने सींचा

चैतन्य प्रकाश

सर्दी में त्वचा के खिचाव का अनुभव किसे नहीं होता? यही अनुभव शायद खिंचाव के संबंध में मनुष्य का प्राथमिक अनुभव है। कहावत ही बन गई है- ‘जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई।’ खिंचाव पीड़ा की उपस्थिति का प्रमाण है।

जीवन में भी खिंचाव, तनाव के अर्थ में व्यक्त होता है जो पीड़ा का समानार्थी है। सर्दी लगातार सिकुड़न देती है, शायद यही सिकुड़न परिणामत: खिचाव बनती है। इसी तरह जीवन की केन्द्रीयता खिचाव का कारण बनती है। जब जीवन ‘मैं’ की केन्द्रीयता में आता है तो व्यक्ति तत्व लगातार सिमटता है, सिकुड़ता है, तत्क्षण खिचाव पैदा होता है। वास्तव में जीवन में जो भी बहिर् है, वह अधिकांशत: खींचने वाला बल है। मनुष्य की खोजों में गुरुत्वाकर्षण बल एक महत्वपूर्ण खोज है। न्यूटन ने पृथ्वी के जड़-चेतन को इस बल से प्रभावित पाया। न्यूटन की खोज पदार्थ वैज्ञानिक के दृष्टिकोण से हुई है। पर इसी खोज को जीवन के तात्विक प्रश्नों के संदर्भ से जोड़कर देखा जाए तो लगता है, संसार का समूचा बहिर् (बाहर) खिंचाव का कारण है। आशा, आकांक्षा, आकर्षण बहिर्जगत में समाए हैं, ये लगातार खींचते हैं। एक दूसरे अर्थ में समझा जाए तो अन्य और तन्य का बड़ा सीधा संबंध है। जो अन्य (स्वयं के अतिरिक्त) है, वह हमें तनाव देता है। अन्य के संदर्भों से जितना हम जुड़ते हैं, उतने ही तनावग्रस्त होते जाते हैं। इस तरह सारा संसार प्रतिसंवेदनात्मक (Response-oriented) होता चला जाता है। अन्य के अभाव, दबाव, प्रभाव से तन्य उत्पन्न होता है। वह अन्य ही बहिर् (बाहर) है और इसका सहज परिणाम ही खिंचाव (तन्यता) है।

फिर क्या ऐसा अंतिम रूप से मान लिया जाए कि जीवन में खिंचाव अपरिहार्य है, क्योंकि जीवन बहिर् के बिना या अन्य के बिना कैसे संभव है? जीवन का सारा विस्तार और विकास तो संबंधों के माध्यम से ही होता है, बल्कि संबधशीलता में ही जीवन की सर्वाधिक सक्षम अभिव्यक्ति होती है। अर्थ यह बनता है कि जीवन तनाव का दूसरा नाम है। इस अर्थ में सत्यांश तो है पर सत्य का संतुलित स्वरूप नहीं दिखता है, यह तस्वीर के सिर्फ एक पहलू की तरह ही प्रतीति देता है। फिर दूसरा पहलू कहां खो गया है? दरअसल दूसरा पहलू हमेशा, हर युग में खोया सा होता है। उस पहलू की खोज को इसलिए हर बार ‘सत्य की खोज’ कहकर संबोधित किया गया, क्योंकि वास्तव में उस पहलू की खोज से ही सत्य पूरा होता है। मगर उसकी शुरुआत पहले पहलू से हो जाती है। दोनों अनिवार्यत: जुडे हैं; पहला दृश्यमान है, दूसरा अदृश्य है। अदृश्य पहलू अन्तरतम में है, आंतरिक है, आभ्यंतरिक है।

त्वचा बाहर से खिंचती है तो भीतर की ग्रन्थियां इस खिंचाव को सींचने के लिए रस स्राव करती हैं। यह प्रक्रम प्राकृतिक है। चिकित्सकीय उपचार इस प्रक्रम को उद्दीप्त करते हैं। बाहर के खिंचाव को भीतर का रस स्वाभाविक रूप से भर दे तो वह उत्तम स्वास्थ्य माना जाता है। इसी तरह जगत के तनाव को अन्तर का सिंचन मिलता रहे तो जीवन का सारा असंतुलन समाप्त हो जाता है। जीवन सहज, शांत, संतुलित और समर्थ हो जाता है। बहिर् के सारे खिंचाव को सींचने की क्षमता अन्तर के सिंचन में है, बशर्ते अंतर से बहिर् का रास्ता खुला हो। आशा, आकांक्षा, आकर्षण के क्षणों में भीतर का प्रेम, समर्पण, संवेदनशीलता यदि स्रावित हो जाए तो जगत आनंदोत्सव में बदल जाता है। चित्त में शांति और चेहरे पर कांति आती है। स्रोत और सरिता का संबंध सतत रहे तो सरिता का सारा खिंचाव महासागरों को लबालब भरकर, सृजनात्मकता का पर्याय बनता है। बहिर् के खिंचाव और अन्तर के सिंचन के दोनों पहलू मिलकर जीवन सत्य बनते हैं। इन दोनों पहलुओं के योग में विकसता जीवन सरित प्रवाह की सी ऊर्जा, गरिमा, और पवित्रता लिए सागर-सम वैराटय में निरंतर मिलता जाता है। इस सहज, स्वाभाविक समर्थ जीवन का सूत्र हुआ- ‘बहिर् ने खींचा, अंतर ने सींचा’। यह जीवन सूत्र आध्यात्मिक और भौतिक के अनिवार्य योग का प्रतिपादन है।

यह एकांगी अर्थ को नहीं बल्कि समग्रता को व्यक्त करता है। बहिर् का खिंचाव और अंतर का सिंचन दोनों परस्पर पूरक हैं, पोषक हैं। इनमें से किसी एक की अनुपस्थिति जीवन की अपूर्णता, असंतुलन और अराजकता का कारण बनती है। सूत्र के दूसरे पहलू के खो जाने से सामान्य संसार की त्रासदी जन्मी है। दूसरा पहलू पा लेने पर यह त्रासद दिखने वाला जगत आश्चर्यजनक रूप से उत्सव बन जाता है।

1 COMMENT

  1. जब से होश संभाला है चैतन्य शब्द से परिचित हूँ लेकिन लगभग उनतालीस वर्षों से यह शब्द अति प्रिय लग रहा है और इस कारण कोई अचम्भा नहीं कि प्रवक्ता.कॉम में “लेखकवार पढ़ें” पर लेखकों की सूची में “चैतन्य” देखते अचेतन फरवरी १, २०११ को प्रस्तुत चैतन्य प्रकाश जी के आलेख, “बहिर् ने खींचा, अंतर ने सींचा” पर आ पहुंचा हूँ| जीवन में संतुलन लाते उनके विचारों के लिए चैतन्य प्रकाश जी को मेरा साधुवाद|

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