संदीप सृजन
हाल ही में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित एक राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान हुई घटना ने पूरे साहित्य जगत को हिला दिया। 7 जनवरी 2026 को “समकालीन हिंदी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ” विषय पर सहित्य अकादमी, नई दिल्ली और विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा संयुक्त रूप से एक सेमिनार आयोजित किया गया था जिसमें कथाकार मनोज रूपड़ा और विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर आलोक कुमार चक्रवाल के बीच यह घटना हुई जिसमें कुलपति ने रूपड़ा को सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हुए मंच से बाहर कर दिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिससे साहित्य जगत में व्यापक आक्रोश फैला हुआ है। यह घटना न केवल व्यक्तिगत अपमान का मुद्दा हैं बल्कि अकादमिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और साहित्यिक मंचों की गरिमा से जुड़ा हैं।
घटना की शुरुआत सेमिनार के दौरान कुलपति के अध्यक्षीय उद्बोधन से हुई। प्रोफेसर चक्रवाल अपने भाषण में विषय से हटकर कुछ हास्यपूर्ण टिप्पणियां कर रहे थे। मंच पर बैठे मनोज रूपड़ा जो सहित्य अकादमी द्वारा आमंत्रित अतिथि थे, ने कुलपति को कहा कि वे विषय पर केंद्रित रहें। कुलपति ने पहले रूपड़ा से पूछा कि क्या वे बोर हो रहे हैं, जिस पर रूपड़ा ने हामी भरी और कहा कि भाषण विषय से भटक रहा है। इससे कुलपति भड़क गए। उन्होंने माइक्रोफोन पर रूपड़ा को अपमानजनक शब्द कहे, जैसे कि उन्हें “समझ नहीं है कि कुलपति से कैसे बात करनी चाहिए,” और उन्हें तुरंत बाहर जाने का आदेश दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने आयोजकों को निर्देश दिया कि भविष्य में रूपड़ा को कभी न बुलाया जाए। इस दौरान मंच पर हंगामा मच गया, और कई अतिथि साहित्यकारों ने विरोध में सेमिनार बीच में ही छोड़ दिया।
मनोज रूपड़ा एक प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार हैं जिनके कई कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी रचनाएं अधिकांश भारतीय भाषाओं में अनुवादित हैं, और वे वनमाली कथा सम्मान, इंदु शर्मा कथा सम्मान, पाखी सम्मान जैसे पुरस्कारों से सम्मानित हैं। रूपड़ा छत्तीसगढ़ के दुर्ग-भिलाई क्षेत्र से जुड़े हैं और वर्तमान में चित्रकला में भी सक्रिय हैं। वे सेमिनार में आमंत्रित अतिथि थे, जो सहित्य अकादमी की प्रतिष्ठा को दर्शाता है। दूसरी ओर, कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल गुजरात की सौराष्ट्र यूनिवर्सिटी से हैं जहां वे प्रोफेसर थे। घटना के बाद उन्होंने अपना बचाव किया और कहा कि मामला अधिक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि रूपड़ा उनके भाषण के दौरान फोन देख रहे थे और असम्मानजनक व्यवहार कर रहे थे। कुलपति ने कहा कि उन्होंने सिर्फ पूछा था कि क्या सब ठीक है या बोर हो रहे हैं लेकिन रूपड़ा के जवाब से उन्हें मंच का अपमान लगा।
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद, कई संगठनों ने रायपुर और बिलासपुर में विरोध प्रदर्शन किया और कुलपति को हटाने की मांग की। यह घटना साहित्य, कला और संस्कृति के प्रति सम्मान की कमी को दर्शाती है। यह घटना पूरी तरह निंदनीय है क्योंकि यह अकादमिक मंचों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है। साहित्यिक सेमिनार विचार-विमर्श के लिए होते हैं न कि पदानुक्रम की प्रदर्शनी के लिए। कुलपति का व्यवहार अहंकारपूर्ण रहा जो एक शिक्षण संस्थान के प्रमुख के लिए अनुचित है। रूपड़ा ने सिर्फ विषय पर केंद्रित रहने की सलाह दी जो कोई अपमान नहीं था बल्कि एक वैध टिप्पणी थी। कुलपति का उन्हें बाहर निकालना और अपशब्द कहना सत्ता के दुरुपयोग का उदाहरण है।
साहित्य जगत में यह घटना एक पैटर्न का हिस्सा लगती है। पिछले वर्षों में बुद्धिजीवियों पर हमले हुए हैं जैसे डॉ. नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसारे, कन्नड़ लेखक कलबुर्गी और पत्रकार गौरी लंकेश की हत्याएं जिनके पीछे कथित तौर पर कुछ संगठन थे। ऐसे में साहित्यकारों को सरकारी कार्यक्रमों में भाग लेने से पहले सोचना चाहिए। यह घटना साहित्य की स्वायत्तता पर सवाल उठाती है और युवा लेखकों को हतोत्साहित कर सकती है। इससे विश्वविद्यालय की छवि भी खराब हुई है। गुरु घासीदास विश्वविद्यालय का नाम संत गुरु घासीदास से जुड़ा है जिनका संदेश “मनखे-मनखे एक समान” था लेकिन यहां पदानुक्रम ने समानता को कुचल दिया। यह घटना साहित्य जगत में असहिष्णुता की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाती है जहां आलोचना को अपमान माना जाता है।
साहित्य जगत में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बहुआयामी कदम उठाने चाहिए। विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति प्रक्रिया में सांस्कृतिक और अकादमिक संवेदनशीलता को शामिल करें। यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय को दिशानिर्देश जारी करने चाहिए कि मंच पर असहमति को सम्मान दिया जाए। कुलपतियों के लिए अनिवार्य ट्रेनिंग कार्यक्रम शुरू करें, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर दिया जाए। सहित्य अकादमी और साहित्यिक व संस्कृति मंच जैसे संगठनों को ऐसे कार्यक्रमों का बहिष्कार करना चाहिए जहां राजनीतिक हस्तक्षेप हो। ऐसी घटनाओं पर शिकायत तंत्र मजबूत करना चाहिए, विश्वविद्यालयों में ओम्बड्समैन नियुक्त करें जो अपमान की शिकायतों की जांच करे। अगर अपमान सिद्ध हो, तो कुलपति जैसे पदों पर दंडनीय कार्रवाई हो। रूपड़ा मामले में भी जांच समिति गठित होना चाहिए।
साहित्य जगत ऐसे वर्कशॉप आयोजित करें जहां असहिष्णुता के खिलाफ चर्चा हो। युवा लेखकों को सशक्त बनाएं ताकि वे अपनी आवाज उठा सकें। मीडिया और सोशल मीडिया का उपयोग करके ऐसी घटनाओं का प्रचार करें ताकि सार्वजनिक दबाव बने। व्यक्तिगत स्तर पर लेखकों को राजनीतिक संदर्भ समझकर कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए। अगर अपमान हो, तो तुरंत विरोध करें जैसे कि इस घटना में कई अतिथियों ने किया। कुलपतियों जैसे पदाधिकारियों को आत्म-मंथन सिखाएं कि सत्ता अस्थायी है लेकिन साहित्य अमर रहता है। इन कदमों से साहित्य जगत को सुरक्षित बनाया जा सकता है, जहां विचारों का आदान-प्रदान बिना भय के हो। बिलासपुर की यह घटना एक चेतावनी है कि साहित्यिक मंचों पर सत्ता का दुरुपयोग न हो। मनोज रूपड़ा का अपमान न केवल व्यक्तिगत था, बल्कि पूरे साहित्य जगत का था। स्पष्ट है कि कुलपति का व्यवहार अनुचित था और इससे सबक लेकर भविष्य में नीतियां बनानी चाहिए। साहित्य स्वतंत्रता का प्रतीक है, इसे बनाए रखने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
संदीप सृजन