जश्र मनाइए शिवराज के जन्मदिन का

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मनोज कुमार
साल की किसी न किसी तारीख, किसी न किसी व्यक्ति के लिए खास दिन होता है. यहदिन उसके जन्म का दिन होता है और सच पूछें तो एक तरह से बीते साल की कामयाबी के आंकलन का होता है. ऐसे में जब हम व्यक्ति नहीं, मुखिया, वह भी राज्य के मुख्यमंत्री की बात करते हैं तो ऐसी तारीख, ऐसा दिन महत्वपूर्ण ही नहीं होता है बल्कि इतिहास के पन्नों की तारीख होती है. हर साल कैलेंडर के पन्ने पर 5 मार्च एक ऐसी ही तारीख है. 5 मार्च की यह तारीख बेहद खास है और खास बस इसलिए कि इस दिन कामयाब राजनीति शख्यित शिवराजसिंह चौहान का जन्मदिन होता है. यह दिन उनकी कामयाबी, उनके आगे और आगे बढ़ते रहने का दिन होता है क्योंकि स्वयं शिवराजसिंह चौहान, उनके परिजन और उनके शुभचिंतक चाहते हैं कि उनका यह दिन यशस्वी हो, जीवन का हर वर्ष अहम दिन हो. बहुतों के लिए यह दिन मुख्यमंत्री का जन्मदिन हो सकता है लेकिन यकिन मानिए यह सौफीसदी व्यक्तिगत रूप से शिवराजसिंह चौहान का जन्मदिन है. वे शिवराजसिंह जिसके तेवर और तबीयत में सत्ता का ओज नहीं है, वे शिवराज जिनके लिए 13 साल का समय मुख्यमंत्री रूप में होना एक जवाबदारी है, वे शिवराजसिंह चौहान जिसके लिए राजनीतिक, सामाजिक एवं सत्ता से जुड़ी जवाबदारी महत्वपूर्ण है तो उनके पास अपने परिवार के लिए भी समय है. परिवार के बीच का यह समय सही मायने में शिवराजसिंह चौहान के जन्मदिन सेलिब्रेट करने का समय है.
मध्यप्रदेश की सत्ता सम्हालते वक्त शिवराजसिंह चौहान महज 46 वर्ष के थे लेकिन आज वे 59 वर्ष के हो चले हैं. इन सालों में मुख्यमंत्री के रूप में यह 13वां अवसर होगा जब पूरा मध्यप्रदेश उनका जन्मदिन सेलिब्रेट करेगा. पहले के सालों में 5 मार्च का यह दिन उत्सव का था और कहना ना होगा कि आज भी यह दिन भी उसी तरह उत्सव और जश्र का है लेकिन शिवराजसिंह स्वयं को एक आम आदमी की श्रेणी में रखते हैं. वे अपने जन्मदिन को विशेष महत्व नहीं देते हैं और यही कारण है कि इन 13 सालों में एकाध-दो बार इन्हीं दिनों मध्यप्रदेश विपत्ति में रहा. प्राकृतिक आपदाओं से किसानों के चेहरे उदास थे तब उन्होंने जन्मदिन के उत्सव को ना केवल स्थगित किया बल्कि वे विपत्ति में फंसे लोगों को ढाढ़स बंधाने निकल पड़े. अपने जन्मदिन के उत्सव से ज्यादा चिंता उनके चेहरे की उदासी दूर करने की रही है. इस तरह कई बार वे औरों से अलग होने का परिचय देते हैं. हालांकि सार्वजनिक जीवन में हैं तो उनके अपने लोगों की चाहत होती है कि वे ऐसे अवसरों को यादगार बनायें. कई बार नहीं चाहते हुए भी अपनों के प्यार में वे औपचारिकता के लिए शरीक हो जाते हैं. जन्मदिन को जश्र बनाने का उनका अपना कोई इरादा कभी नहीं रहा, शायद इसलिए ही वे आज भी पांव-पांव वाले भइया के रूप में पहचाने जाते हैं.
मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में 13 वर्ष के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह का कार्यकाल स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह के कार्यकाल की समीक्षा होगी, उनके तेवर और तासीर की चर्चा होगी तो इस मामले में भी अकेले खड़े दिखाई देंगे. अकेले का अर्थ तनहा नहीं बल्कि अपने कर्म और व्यवहार से पृथक दिखाई देंगे. 13 वर्षों के मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराजसिंह चौहान के भीतर का एक ग्रामीण, किसान और मध्यमवर्गीय व्यक्ति जिंदा है. एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के दुख और सुख, चुनौतियों और संघर्षों को वे अपना मानते हैं. वे अपने लोगों को, पुराने साथियों को विस्मृत नहीं करते हैं. फिर मॉडल स्कूल में पढऩे वाले साथी होंं या आज जिस मुकाम पर शिवराजसिंह हैं, उन तक पहुंचाने वाले शिक्षक. एक मुख्यमंत्री की यह सहजता ही तो उन्हें आम आदमी का प्रतिनिधि बनाती है. उन्हें मुख्यमंत्री बनाती है और बनाती नहीं है बल्कि लगातार तीन बार सत्ता की चाबी सौंप देती है भरोसे के साथ. यह सत्ता या राजनीति की जीत नहीं है बल्कि आम आदमी का एक व्यक्ति के प्रति विश्वास की जीत है. आम आदमी का ऐसा विश्वास अर्जित करना राजनीति में परिघटना के रूप में देखा जा सकेगा.
पतली-दुबली काया के शिवराजसिंह चौहान 13 साल की लम्बी पारी के बाद भी आम आदमी के लिए खास है, यह मिराकिल है. सत्ता को आम आदमी तक ले जाने का कोई बड़ा उपक्रम किए बिना ही वे सीधे स्वयं पहुंच कर बता देते हैं, जता देते हैं कि वही शिवराज हैं, वही मुख्यमंत्री हैं और वही सरकार हैं. वही शिकायत सुनेंगे और वही निदान भी करेंगे. ‘अभी कहां आराम’ की तर्ज पर वे आगे और आगे मध्यप्रदेश को ले जाना चाहते हैं. स्वयं को आगे ले जाने की उनकी मंशा कभी नहीं रही लेकिन मध्यप्रदेश सबल बने, सक्षम बने और तंदरूस्त दिल का प्रदेश बने, यही उनकी कोशिश रही है. कुछ कह सकते हैं कि ये सब बातें हैं, बातों का क्या? लेकिन क्या इस बात से आप इंकार करेंगे कि मध्यप्रदेश के जिन रास्तों पर आप रेंगते हुए चलते थे, आज आप सपाटे से भाग रहे हैं. सफर, सफर (कष्ट) ना होकर आरामदेह बन गया है. गति से गतिमान बनता मध्यप्रदेश बदलाव को तो चिंहित कर रहा है.
हम ऐसा भी नहीं कह रहे हैं कि सबकुछ ठीक हो गया है लेकिन बदतर से बदलने की स्थिति में तो आ गए हैं. अभी बदलने का क्रम आरंभ हुआ है. बदलाव की बयार है और बयार के बाद जब समूचे बदलाव की बारिश होगी होगी तो आप और हम भीगेंगे. 12 साल के साथ जुड़े कुछ महीने में जो तस्वीर मध्यप्रदेश की बदली है, वह सुकून देने लायक तो है ही. शिवराजसिंह का जो विरोध होता है, वह उनकी हताश नहीं करता है बल्कि ताकत देता है. उन्हें ऊर्जा देती है कि हां, अभी आगे और काम करना है.  इसके साथ ही काम करने की गति और तेज हो जाती है. वे नम्र हैं, सरल हैं और लोगों मेंं उनके अपने होने का अहसास भी है लेकिन वक्त आने पर वे कठोर भी हैं और कडक़ राजनेता भी. वह तब जब प्रदेश के विकास के साथ कोई ढिलाई हो या अनदेखी. प्रशासन को कितना ढील देना और कब उनके स्क्रू कसना, कोई शिवराजसिंह से सीखे. ऐसा करके वे नौकरशाही पर लगाम ना लगाने के आरोपों को खारिज करते हैं.
मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह के पास दूरदृष्टि और पक्का इरादा है. मध्यप्रदेश के हित में उनके कार्यकाल में बनी योजनाओं का कोई तोड़ किसी के पास नहीं रहा. योजनाएं शिवराजसिंह सरकार की लोकप्रियता की कसौटी पर कसी जा रही थीं तो दूर-दराज के लोगों की लाभ की गारंटी भी थी. यह भी सच है कि उनकी योजनाओं का लाभ सौफीसदी नहीं मिला लेकिन कोई योजना नाकामयाब होती नहीं दिखती. योजनाओं का लाभ नहीं मिलने की शिकायतों पर मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह की त्योरियां चढ़ जाती हैं. प्रशासन में हलचल मच जाती है और दूर बसे सहरिया जनजाति बच्चों के साथ ही दूसरे आदिवासी, गरीब और ग्रामीणों की की थाली में दलिया परोसा जाने लगता है.
मध्यप्रदेश की राजनीति में पक्ष-विपक्ष के नेताओं को एक-एक उपाधि से नवाजा गया लेकिन ‘पांव-पांव वाले भइया’ शिवराजसिंह मुख्यमंत्री बनने के बाद भी इसकी पहचान बने हुए हैं. हां, कभी उन्हें जननायक और विकास पुरुष की भी उपाधि दी गई लेकिन सब पर भारी ‘पांव-पांव वाले भइया’ ही हैं. उपाधियों से बेखर अपने एजेंडे को लेकर आगे बढ़ते शिवराजसिंह ने महिला और बच्चो को प्राथमिकता में रखा. इन्हें उनका हक मिले और बेफिक्र हो जिंदगी जिएं, इसकी कोशिश वे करते रहे.
बेटी बचाओ उनका ड्रीम था और वे मध्यप्रदेश को इस दाग से बरी करना चाहते थे लिंगानुपात मेें मध्यप्रदेश पिछड़ा हुआ है. इसका सकरात्मक परिणाम आप देख सकते हैं. पिछले दशक के मुकाबले इस दशक में बदलाव दिख रहा है. सत्ता में महिलाओं को पचास प्रतिशत हिस्सेदारी देकर उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया. यह भी पहली पहली बार हो रहा है कि मध्यप्रदेश के कई पंचायतों में महिलाओं का एकाधिकार है. उस दाग से भी मध्यप्रदेश का बरी किया जहां सरपंच, पंच और पार्षद पर निर्वाचन तो महिलाओं का होता था लेकिन सत्ता पति के हाथ में होती थी. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने महिलाओं के भीतर इतना आत्मविश्वास भरा कि वे स्वयं फैसला लेने लगीं और आहिस्ता आहिस्ता पुरुषों का दखल खत्म होता गया. अब महिलाएं सशक्त हैं और स्वतंत्र भी अपने और अपनों के लिए फैसला लेने के लिए.
मध्यप्रदेश बाल विवाह को लेकर भी घिरा हुआ था लेकिन बीते सालों में बाल विवाह के आंकड़ों में भी भारी गिरावट दर्ज हुई है. भारतीय परिवारों में बेटी को बोझ समझा जाता था और कच्ची उम्र में उनका ब्याह कर मुक्ति पा लेने को एक रास्ता मान लिया जाता था लेकिन उनकी सोच और दृष्टि को शिवराजसिंह सरकार की महिला केन्द्रित योजनाओं ने बदला. लाडली लक्ष्मी से लेकर स्कूल चलो और मुख्यमंत्री विवाह योजना गरीब माता-पिता को इस बात की दिलासा दिलाने में कामयाब हुआ कि उन्हें बेटी के ब्याह की चिंता छोडक़र, उनकी पढ़ाई की चिंता करनी है, उनका भविष्य बनाना है. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान की इस योजना में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बेटी बचाओ के साथ बेटी पढ़ाओ जोड़ देते हैं तो स्वयमेव बाल विवाह का बंधन टूटने लगता है. स्कूल को देखती बच्चियां अब अपने साइकिल से स्कूल जा रही हैं. उनकी आंखों में सपने हैं और सपनों को सच करने के लिए मध्यप्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह का साथ है. देहरी पार करने के लिए कभी घूंघट न उठाने वाली अधिसंख्य महिलाओं महिलाओं ने अब देहरी पार करना सीख लिया है. डिंडौरी की  रेखा खाद्यान्न सुरक्षा के लिए अपने अनुभवों को शेयर करने संयुक्त राष्ट्रसंघ के मंच पर पहुंचती हैं. बदलाव की यह ठंडी हवा सुखद अहसास कराती है.
13 साल की योजनाओं को जब आप खंगालने बैठेंगे तो मध्यप्रदेश का कोई ऐसा वर्ग नहीं बचा है, जिसके लिए योजना काम नहीं कर रही हो. दुनिया में सबसे पहले मध्यप्रदेश में लोकसेवा गारंटी योजना का आरंभ हुआ. शासकीय अधिकारियों/कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर समयबद्ध काम कराने वाले प्रदेश के रूप में हमारी अलग पहचान बनी. तकरीबन 52 से अधिक सेवाओं को इस सूची में शामिल कर लिया गया है. खसरा-खतौनी से लेकर नल जल योजना का लाभ लेने वालों को अब घर बैठे लाभ मिल रहा है. तयशुदा समय में सुविधा देना सरकार ने अपनी जवाबदारी मान ली है और अधिकारियों/कर्मचारियों को काम से लगा दिया है.
किसानों को भी मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने प्राथमिकता में रखा. खेती को लाभ का धंधा बनाने के उनके सपने सच होते दिख रहे हैं. कई मौके ऐसे आए जब प्राकृतिक आपदा से अन्नदाता संकट में दिखे लेकिन हर स्तर पर शिवराजसिंह चौहान उनके साथ खड़े रहे. उनकी आंखों के आंसू को पोंछने की कोशिश की. बेटी के ब्याह में बाधा न आए तो सरकार ने किसानों के लिए खजाने का मुंह खोल दिया. बैंक ऋण भी सहजता से मिले और फसलों के नुकसान का मुआवजा भी, इस बात के लिए मुक्कमल इंतजाम सरकार ने किया. प्रक्रियागत कारणों से कुछ शिकायतें आयीं और निवारण हुआ लेकिन जिस बड़ी संख्या में लोगों को लाभ मिला, उसके बारे में विरोधी खामोश रहे.
मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान हमेशा संयत रहे. कभी किसी को पलट कर जवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो अपने काम और उसके परिणाम से. जनता से बड़ी कोई कसौटी नहीं होती है और जनता की कसौटी पर वे खरे उतरे हैं. शिवरासिंह चौहान दिल में उतरना जानते हैं. खुद के बेटे हैं और बेटियों की कमी वे महसूस करते हैं. ऐसे में वे उन बच्चियों को अपनी बेटी मान लेते हैं और ब्याह तक कराने का इंतजाम करते हैं. यह एक मनुष्य ही कर सकता है, एक शिवराजसिंह ही कर सकते हैं, एक राजनेता नहीं. इससे सत्ता में बने रहने का कोई रास्ता नहीं खुलता है बल्कि मन को सुकून देता है. तसल्ली देता है कि बेटियों का होना जीवन में कितना जरूरी है.
वे अपने बच्चों के पिता हैं, प्रदेश के मुखिया हैं, इसीलिए पितातुल्य उनकी जवाबदारी है. शिक्षा का मुकम्मल इंतजाम हो और स्कूल से कॉलेज और कॉलेज के बाद रोजगार मिले, इसके लिए स्कीलडेवलपमेंट के अनेक अवसर उत्पन्न कर रहे हैं. हाथों में डिग्री और मन में सपने लेकर बहुत सारे युवा नौकरी की तरफ भागने के बजाय खुद के काम-धाम से दुनिया गढ़ रहे हैं. उनके इन प्रयासों की गंूज मध्यप्रदेश के लोगों के बीच नहीं है बल्कि टेलीविजन के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में सवाल किया जाता है कि किस राजनेता को मामा पुकारा जाता है? स्वाभाविक है कि इस महादेश का ह्दयप्रदेश मध्यप्रदेश है जहां के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को बच्चे-बच्चियां मामा पुकारती हैं.
एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान ने मध्यप्रदेश को बहुत कुछ दिया. उन्हें अपने बचपन की यादें थी कि कैसे वे मां नर्र्मदा की गोद में उतर कर अठखेलियां करते थे. आज जब वे बच्चे नहीं रहे तो उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि मां नर्मदा को पर्यावरणीय दृष्टि से स्वच्छ बनाना है तो वे 144 दिनों की नमामि नर्मदे सेवा यात्रा आरंभ कर लोगों को जागरूक बनाने निकल पड़े. यह दुनिया में पहली पहली बार हो रहा था जब किसी नदी को बचाने के लिए इतना बड़ा सार्थक उपक्रम किया जा रहा था. विश्व नेता दलाई लामा से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लगाकर सभी वर्गों का उन्हें समर्थन और सहयोग प्राप्त हुआ. नर्मदा सेवा यात्रा, नदी बचाने के लिए एक नजीर बन गया है जिसे आने वाले दिनों में और लोग आगे बढ़ाने का काम करेंगे. वैसे ही जैसे मध्यप्रदेश की अनेक योजनाओं को देश के दूसरे प्रदेश अपने अपने राज्यों में लागू कर चुके हैं. यथा बेटी बचाओ अभियान, लाडली लक्ष्मी योजना, लोक सेवा गारंटी योजना और मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन को तो गिना ही जा सकता है. मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना ने तो जैसे शिवराजसिंह पर बुजुर्गों की छाया डाल दी है आशीष वचनों का. कई कई कारणों से कभी तीर्थधाम ना जा सकने वाले वृद्धजन अपनी आखिरी इच्छा भी पूरी कर रहे हैं. यह अपने किस्म की अलग तरह की योजना थी जो सरकार की जनता के प्रति संवेदनशील जवाबदारी और चिंता का सबब बनती है.
मध्यप्रदेश को देश का दिल कहा जाता है और यह दिल सबके लिए धडक़ता है. आमतौर पर राज्य सरकार राज्य की बुनियादी जरूरतों पर स्वयं को केन्द्रित करती है लेकिन शिवराजसिंह चौहान ने इससे बाहर निकलकर जता दिया और बता दिया कि मध्यप्रदेश यूं ही देश का दिल नहीं है. सरहद पर अपना स्र्वस्व न्यौछावर करने वालों को लोग 15 अगस्त या 26 जनवरी को याद कर लेते हैं लेकिन मध्यप्रदेश संभवत: पहला राज्य है जहां शौर्य स्मारक का निर्माण कर प्रतिदिन उन्हें नमन करने, अभिवादन करने और उनकी वीरगाथा से प्रेरणा ले सकते हैं. यह काम अद्भुत, अकल्पनीय है और वंदनीय भी. ऐसे बहुत सारे काम है और बहुत सारी योजनाएं हैं जो शिवराजसिंह चौहान को अलग रूप से चिंहित करती हंै. एक एक काम और एक एक योजना उनके लिए जन्म दिन की तरह है. एक बच्ची जब स्कूल जाती हुई मुस्कराती है तो उनका जन्मदिन हो जाता है और एक बुर्जुग जब गले लगकर नर्मदा सेवा यात्रा के लिए अपना आशीष देती है तो शिवराजसिंह धन्य-धन्य हो जाते हैं. मध्यप्रदेश का मुस्कराना और आगे बढ़ते चले जाना ही शिवराजसिंह के लिए जन्मदिन का उपहार है और हम चाहते हैं कि वे यशस्वी बनें और मध्यप्रदेश मुस्कराता रहे.

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मनोज कुमार
सन् उन्नीस सौ पैंसठ के अक्टूबर माह की सात तारीख को छत्तीसगढ़ के रायपुर में जन्म। शिक्षा रायपुर में। वर्ष 1981 में पत्रकारिता का आरंभ देशबन्धु से जहां वर्ष 1994 तक बने रहे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समवेत शिखर मंे सहायक संपादक 1996 तक। इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य। वर्ष 2005-06 में मध्यप्रदेश शासन के वन्या प्रकाशन में बच्चों की मासिक पत्रिका समझ झरोखा में मानसेवी संपादक, यहीं देश के पहले जनजातीय समुदाय पर एकाग्र पाक्षिक आलेख सेवा वन्या संदर्भ का संयोजन। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता विवि वर्धा के साथ ही अनेक स्थानों पर लगातार अतिथि व्याख्यान। पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा पर साक्षात्कार शीर्षक से पहली किताब मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में पहला संस्करण एवं 2006 में द्वितीय संस्करण। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता शोध परियोजना के अन्तर्गत फेलोशिप और बाद मे पुस्तकाकार में प्रकाशन। हॉल ही में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा संचालित आठ सामुदायिक रेडियो के राज्य समन्यक पद से मुक्त.

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