वीरेंद्र सिंह परिहार
विगत दिनों कांग्रेस महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने 18वीं शताब्दी के शासक टीपू सुल्तान को छत्रपति शिवाजी महाराज के समकक्ष बताया जो देश मे एक बहुत बडे वर्ग के लिये अस्वीकार्य ही नही, निंदनीय कृत्य भी है । इसकी चर्चा तब शुरु हुई जब मालेगांव के डिप्टी मेयर निहाल अहमद ने अपने कार्यालय मे टीपू सुल्तान की तस्वीर लगायी । इसपर जब मीडिया ने सपकाल से उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उनका कहना था – हमे टीपू सुल्तान को वीरता के प्रतीक के रुप मे शिवाजी के समकक्ष मानना चाहिये । वहीं असदुद्दीन ओवैसी का कहना है – “टीपू सुल्तान हिंदू-मुस्लिम एकता के मिसाल थे । टीपू के पास से जो अंगूठी निकली, उस पर राम लिखा था ।“ इसके पहले वर्ष 2015 मे कर्नाटक की कांग्रेस सरकार द्वारा टीपू सुल्तान की 266वीं जयंती मनाई गयी थी जिसके विरोध मे विश्व हिंदू परिषद् के साथ कैथोलिक ईसाइयों ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए कर्नाटक बंद तक का आयोजन किया था जिसमे कुछ लोगों की जानें तक चली गयी थी ।
यदि ओवैसी जैसे लोग यह मानते हैं कि टीपू के पास से निकली अंगूठी मे राम लिखा था तो फिर टीपू राम जैसा समदर्शी क्यों नहीं ? इससे भी बडी बात यह है कि ओवैसी जैसे नेता फिर राम को अपना आदर्श क्यों नही मानते ? राम जन्म भूमि पर राम मंदिर निर्माण का सतत् विरोध क्यों करते रहे ?
हिंदू एवं कैथोलिक संगठनों का बहुत पहले से कहना है कि टीपू एक धर्मान्ध एवं कट्टर शासक था । उसने हजारों हिंदुओं को इस्लाम में मतान्तरित किया । सिर्फ पुरूषों को ही नहीं, पता कितने बच्चों और महिलाओं की हत्या कराई । इस संबंध में इलाकुलम कुंजन पिल्लई लिखते हैं- टीपू सुल्तान ने मालाबार आक्रमण के समय दो हजार ब्राह्मणों की हत्या करा दी, हजारों ब्राह्मण जगंलों में भाग गए और एक हजार हिंदुओं को धर्मांतरण के लिए श्री रंगपट्टम के किले में कैद रखा गया जो अंग्रेजों द्वारा 1793 में टीपू सुल्तान के मारे जाने के बाद ही मुक्त हो सके । कुर्ग राज परिवार की एक कन्या को जबरिया मुसलमान बनाकर टीपू ने उससे निकाह किया ।
विदेशी लेखकों ने भी टीपू सुल्तान की धर्मान्धता पर लिखा है । फुलाटॉन ने अपने रिपोर्ट में लिखा है कि सन् 1783 में पालघाट के किले पर विजय के दौरान टीपू ने हजारों निहत्थे ब्राह्मणों की हत्या की। विलियम लोमने ने मालाबार मैन्यूयल में टीपू द्वारा तोड़े गए मंदिरों की संख्या सैकडों मे बताई है । राज वर्मा ने केरल में संस्कृत साहित्य के इतिहास मे लिखा है कि टीपू ने हिंदू देवी देवताओं की असंख्य मूर्तियों को तोड़ा व पशुओं के सिर काटकर मंदिरों को अपवित्र किया । उसने सभी प्रमुख शहरों के नाम बदल दिए थे जैसे मंगलौर को जलालाबाद, मैसूर को नजीराबाद, धारवाड़ को कुशैद-शबाद, डिंडीगुल को खालिदाबाद, कोझीकोड को इस्लामाबाद इत्यादि। टीपू की मृत्यु के बाद इन नगरों का पुनः मूल नाम रखा गया ।
टीपू की सहिष्णुता और उदारता को लेकर यह यशोगान किया जाता है कि वह श्री रंगपट्टनम मंदिर और श्रृंगेरी मठ को दान दिया करता था। श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य से उसका पत्र – व्यवहार भी होता था । तत्संबंध में डॉ० गंगाधरन का कहना है कि टीपू का विश्वास भूत पिशाचों में था और उनके दुष्प्रभाव से बचने के लिए तांत्रिक अनुष्ठानों के लिए वह पुजारियों को दान देता था । श्री रंगपटनम के पुजारियों ने टीपू को बताया था कि विशेष अनुष्ठान से वह दक्षिण भारत का सुल्तान बन जाएगा और उसी विशेष अनुष्ठान के लिए धन दिया जाता था । टीपू के हिंदू विरोध की हद यह थी कि राज्य के 65 बड़े अधिकारियों में एक भी हिंदू नहीं था। इतिहासकार एम. एस. गोपालन के अनुसार अनपढ़ और अशिक्षित मुसलमानों को महत्व के पदों पर रखा गया था ।
दूसरी तरफ जहां शिवाजी का प्रश्न है, उनका सख्त आदेश रहता था कि युद्ध के दौरान औरतों और बच्चों को कतई निशाना न बनाया जाए और उनके सम्मान की पूरी तरह रक्षा की उन्होंने जाए । कल्याण के मुस्लिम सुबेदार की बहू का प्रसंग इस इस संदर्भ में एक ज्योति स्तम्भ की भांति है । शिवाजी ने सम्पदाय व मजहब के आधार पर किसी को निशाना नही बनाया। कोई मस्जिद नहीं तोडी, उन्होंने किसी मुसलमान या अन्य मतावलंबी को धर्मान्तरित नहीं किया। वह पूरी तरह न्याय के पक्षधर थे। यहाँ तक कि पुत्र सम्भाजी को भी एक अपराध में प्रतापगढ किले में कैद करवा दिया था। छत्रपति शिवाजी का सख्त निर्देश था कि सैनिक अपने वेतन से ही जरूरत का सामान खरीदें, कही लूट-पाट यहाँ तक की बेगार की शिकायत नहीं आनी चाहिए । सेना के मार्च के दौरान किसानों की खड़ी फसल कतई नष्ट नहीं होनी चाहिए। एक बार छत्रपति को जब नौसेना की दृष्टि से जहाजों के निर्माण हेतु सागौन एवं आम के लकड़ी की आवश्यकता हुई जो उनके राज्य में पर्याप्त थी पर जब उन्हें पता चला कि इसका उपयोग किसान कृषि कार्यों में करते हैं तो उन्होंने अपने राज्य से उपरोक्त लकड़ी न कटवाकर क्रय कर राज्य के बाहर से बुलवाई।
शिवाजी का स्पष्ट आदेश था कि दुश्मनों के क्षेत्र में अमीर व ताकतवर मुसलमानों के अलावा किसी भी गरीब मुसलमान से धन न वसूलें। शिवाजी के प्रशासन में ही नहीं, सैन्य अधिकारियों के पद पर भी कई मुसलमान थे। इनमे दौलत खान, नूर खान बेग, सिददी हिलाल और मुल्ला हैदर के नाम उल्लेखनीय हैं। सूरत विजय के समय फ्रांसिस बर्नियर लिखता है- एक डच मिशनरी का प्रमुख मर गया था, इसलिए शिवाजी ने उसकी विधवा पत्नी व परिवार की अन्य महिलाओं को संरक्षण प्रदान किया, उनकी सुरक्षा में सैनिक लगाए। शिवाजी के राज्य में भ्रष्टाचार कतई अस्वीकार्य था। यहाँ तक कि सौतेले मामा मोहिते द्वारा रिश्वत लिए जाने की जानकारी मिलने पर शिवाजी ने उन्हें कारागार में डाल दिया था। औरंगजेब ने एक बार अपने एक शहजादे को संबोधित करते हुए लिखा था – “शहजादे, शिवाजी दुश्मन के मजहब, मस्जिद, औरत, मजहबी कलाम और फकीरों की इज्जत करता है। तभी तो उसकी इज्जत और शोहरत बुलंद मीनार की तरह बिना सर झुकाए आसमान को छू रही है। शहजादे, हुकूमत करनी है तो शिवाजी का चलन सीखों”। वस्तुतः शिवाजी सुशासन के आइकान थे। पचासों किलों के स्वामी होते हुए भी उन्होंने अपने परिवार से या किसी रिश्तेदार को किलेदार नही बनाया ताकि वह परिवारवाद से मुक्त होकर स्वच्छ और सख्त प्रशासन दे सकें।
पुर्तगाली वायसराय काल द सेंट व्हिंसेंट ने शिवाजी की तुलना सिकंदर और सीजर से की है। शिवाजी व मराठा इतिहास के प्रसिद्ध लेखक व नाट्यकार बाबा साहब पुरंदरे लिखते हैं – “शिवाजी महाराज की राजनीति और राज्यनीति मानों अमृत और संजीवनी दोनो ही है। उनकी शासन व्यवस्था सप्रयोग सिद्ध किया हुआ एक महाप्रकल्प ही है ।“ बड़ी बात यह कि टीपू के बारे में जैसा कहा जाता है कि उसने अपने पिता हैदर अली के विशाल राज्य को खो दिया जबकि छत्रपति शिवाजी ने एक साधारण जागीरदार के पुत्र होकर इतना सशक्त मराठा साम्राज्य कायम किया जिसका औरंगजेब जैसा सम्राट भी कुछ खास नही बिगाड़ सका और आने वाले वर्षों में मराठा साम्राज्य पूरे देश में प्रभावी हुआ । भला ऐसे छत्रपति का मुकाबला किससे हो सकता है ? टीपू जैसे असहिष्णु, कट्टर और धर्मान्ध से तो कतई नहीं । शिवाजी जैसे शासक के बारे में यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी “न भूतो न भविष्यति ।”
वीरेंद्र सिंह परिहार