बाल विवाह: बचपन के सपनों पर सामाजिक पहरा 

अमरपाल सिंह वर्मा

भारत में बाल विवाह आज भी एक बड़ी सामाजिक चुनौती बनी हुई है। यह सिर्फ एक परंपरा नहीं बल्कि लैंगिक असमानता, गरीबी, सामाजिक दबाव और असुरक्षा से जुड़ी एक गहरी समस्या भी है। विभिन्न स्तरों पर किए जा रहे प्रयासों के बावजूद देश में बाल विवाहों पर पूर्णतया अंकुश नहीं लग सका है। अक्षय तृतीया जैसे अबूझ सावे पर राजस्थान समेत देश के विभिन्न राज्यों में हजारों बच्चों को विवाह के बंधन में बांध दिया जाता है, इनमें दुधमुंहे बच्चे भी होते हैं।


संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के अनुसार भारत में हर साल लगभग 15 लाख लड़कियों की 18 वर्ष से कम उम्र में शादी हो जाती है। इससे भारत दुनिया में सबसे अधिक बाल वधुओं वाला देश बन गया है, जहां वैश्विक संख्या का लगभग एक तिहाई हिस्सा है।


बाल विवाह बच्चों के बुनियादी अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। छोटी उम्र में विवाह के कारण बच्चों का बचपन असमय समाप्त  हो जाता है और वह शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के अवसरों से वंचित हो जाते हैं। विवाह के बाद कम उम्र में ही लड़कियों पर पारिवारिक जिम्मेदारियां आ जाती हैं। स्कूल छोडऩे की मजबूरी, आर्थिक आत्म निर्भरता से वंचित होना, घरेलू हिंसा और यौन शोषण का बढ़ा हुआ खतरा उनकी जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। बाल विवाह के बाद नाबालिग लड़कियों के गर्भधारण की संभावना भी बढ़ जाती है, जिससे प्रसव संबंधी जटिलताएं और मातृ मृत्यु दर में वृद्धि जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।


यह चिंता का विषय है कि बालिकाओं में कम उम्र में गर्भावस्था उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालती है। किशोरावस्था में शरीर पूरी तरह विकसित नहीं होता, जिससे गर्भावस्था और प्रसव के दौरान जटिलताएं बढ़ जाती हैं। प्रसव के दौरान रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, गर्भावस्था से संबंधित संक्रमण और शिशु मृत्यु जैसी घटनाएं सामने आती हैं।

  
बाल विवाह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। कम उम्र में विवाह के चलते लड़कियां शिक्षा अधूरी छोड़ देने पर मजबूर हो जाती हैं जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता सीमित रह जाती है। इससे पूरे समुदाय की सामाजिक और आर्थिक विकास प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे गरीबी, अशिक्षा और लैंगिक भेदभाव का दुष्चक्र बना रहता है। समाज की प्रगति में आधी आबादी की सहभागिता बाधित होने का परिणाम देश की समग्र विकास गति की धीमी पडऩे के रूप में सामने आता है।


भारत में बाल विवाह निषेध के लिए कई कानूनी प्रावधान हैं। बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 इसके विरुद्ध कानूनी आधार प्रदान करता है। सुप्रीम कोर्ट ने 18 अक्टूबर 2024 को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं जिसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जिला स्तर पर बाल विवाह निषेध अधिकारियों की नियुक्ति का आदेश दिया गया है। अदालत ने जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को भी अपने जिलों में बाल विवाह रोकने के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इन निर्देशों की पूर्णतया पालना हो पा रही है?


हमारे देश में बाल विवाहों पर पूर्णतया अंकुश की बात अभी तक एक सपना ही है मगर सकारात्मक पक्ष यह है कि देश में बाल विवाह की दर में धीरे-धीरे गिरावट आ रही है। सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं, कार्यक्रमों, माताओं की साक्षरता दर बढऩे, लड़कियों के लिए शिक्षा के अवसरों में वृद्धि, शहरीकरण और बाल विवाह के खतरों के बारे मेंं जन जागरूकता बढऩे का इसमें बड़ा योगदान है। सरकार की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी पहल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करना सबसे प्रभावी तरीका है। अगर लड़कियां शिक्षित होंगी तो वह बाल विवाह से बचने और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने में सक्षम होंगी। अनेक शिक्षित लड़कियों ने  छोटी उम्र में अपने विवाह का प्रतिरोध करके इसे साबित भी किया है। सरकार को उन लड़कियों को सम्मानित करना चाहिए जिन्होंने शिक्षा और आत्म निर्भरता के रास्ते को चुना और बाल विवाह से बच गईं। इससे अन्य बालिकाओं को  प्रेरणा मिलेगी।


विभिन्न समुदायों में बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति जागरूकता फैलानी होगी। इसमें धार्मिक नेताओं, पंचायत प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। गरीब परिवारों को आर्थिक सहायता देना और बालिकाओं के लिए अधिकाधिक छात्रवृत्तियां उपलब्ध कराना बाल विवाह रोकने में मददगार हो सकता है। बाल विवाह की सूचना मिलने पर त्वरित कार्रवाई भी बाल विवाह के चलन को हतोत्साहित कर सकती है।


बाल विवाह ऐसा सामाजिक मुद्दा है, जिसे सरकार या प्रशासन पर नहीं छोड़ा जा सकता है। इसके लिए समाज को महत्वपूर्ण  भूमिका निभानी होगी। बाल विवाहों का चलन सामाजिक कारणों से ही बढ़ा है और समाज की पहल से ही इसे खत्म किया जा सकता है। बाल विवाह की रोकथाम के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, इसके लिए बहुआयामी प्रयास करने होंगे। परंपरा के नाम पर बच्चों का विवाह उनके साथ अन्याय ही है, जिसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।


अमरपाल सिंह वर्मा

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