पुनीत उपाध्याय
बढ़ते शहर चाहे विकास का प्रतीक बनकर उभरे हों लेकिन इसका एक स्याह पहलू भी सामने आया है जो सीधे बच्चों से जुड़ा है। तेजी से शहरीकरण के कारण शहरों में बच्चों के पास खेलने और सांस लेने की सुरक्षित जगह लगातार या तो कम होती जा रही है या बची ही नहीं है। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट में इसे उजागर करते हुए कहा है कि दुनिया की करीब 44 फीसदी शहरी आबादी ही खुले सार्वजनिक स्थान के पास रह रही है। गरीब देशों में तो यह आंकड़ा महज 30 फीसदी ही है जहां लाखों बच्चों के पास खेलने और सांस लेने की सुरक्षित जगह नहीं है।
ऊंची इमारतों के बीच बच्चों की दुनिया लगातार छोटी होती जा रही है। कंक्रीट के जंगल में खेलनेए दौड़ने और खुलकर सांस लेने की जगहें खत्म हो रही हैं। डब्ल्यूएचओ, यूनिसेफ और संयुक्त राष्ट्र पर्यावास एजेंसी ने एक नई वैश्विक गाइड लाइन जारी की है जो शहरों को बच्चों के अनुकूल बनाने की जरूरत पर जोर देती है। सरकारों और नेताओं से अपील की गई है कि वे शहरी विकास से जुड़ी योजनाएं बनाते समय बच्चों को केंद्र में रखें क्योंकि सार्वजनिक स्थान बच्चों के स्वास्थ्यए विकास और बेहतर भविष्य के लिए बेहद जरूरी हैं।
अच्छी तरह डिजाइन किए गए पार्क, सड़कें और खुले मैदान बच्चों को सुरक्षित तरीके से चलने, खेलने, सीखने और प्रकृति से जुड़ने का मौका देते हैं। साथ ही ये जगहें शहरों को ज्यादा समावेशी, सुरक्षित और जलवायु.अनुकूल भी बनाती हैं।आज दुनिया की 55 फीसदी से ज्यादा आबादी शहरों में रह रही है और 2050 तक यह आंकड़ा 68 फीसदी तक पहुंच सकता है। इस दौरान सबसे तेज शहरीकरण विकासशील देशों में होगा। यानी आने वाले वर्षों में ये शहर तय करेंगे कि करोड़ों बच्चों का बचपन कैसा होगा।
बच्चों के विकास के लिए जरुरी है खुली जगह
गाइड लाइन बताती है कि सार्वजनिक स्थान बच्चों की भलाई और विकास के महत्वपूर्ण निर्धारक हैं। इस बात के सबूत मौजूद हैं कि बच्चों का सर्वोत्तम विकास खुली जगहों और सुविधाओं, हरित क्षेत्रों, सुरक्षित और साफ सड़कों, स्वच्छ हवाए बाहरी गतिविधियों और स्वतंत्र और सुरक्षित तरीके से घूमने की क्षमता तक पहुंच से मजबूत रूप से जुड़ा हुआ है। सार्वजनिक स्थान बच्चों की खेलने की जरूरतों और अधिकारों को पूरा करने में मदद करते हैं साथ ही उनके सामाजिक और शारीरिक गतिविधियों में भागीदारी का समर्थन करते हैं जो उनके रोजमर्रा के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करते हैं। उनके सीखने, प्राकृतिक दुनिया में सामाजिककरण, सक्रिय जीवनशैली और स्वस्थ व्यवहार का समर्थन करते हैं। ऐसे स्थान नागरिकता को भी बढ़ावा देते हैं क्योंकि ये समुदाय जीवन में अनौपचारिक भागीदारी की अनुमति देते हैं और बच्चों की पर्यावरणीय संवेदनशीलता और क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं।
भारत में शहरीकरण के हालात
1901 की जनगणना के अनुसार भारत में शहरी क्षेत्रों में रहने वाली जनसंख्या 11.4 प्रतिशत थी जो 2001 की जनगणना तक बढ़कर 28.53 फीसदी हो गई। विश्व बैंक के अनुसार 2017 में यह वर्तमान में 34 प्रतिशत है। संयुक्त राष्ट्र के एक सर्वेक्षण के अनुसार 2030 तक देश की 40.76 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहने की उम्मीद है।
पुनीत उपाध्याय