रामस्वरूप रावतसरे
भारत में निगरानी व्यवस्था यानी सर्विलांस सिस्टम को लेकर 01 अप्रैल 2026 से सरकार ने नए सख्त नियम लागू कर दिया है जिसके बाद चीन की कई सीसीटीवी कंपनियाँ जैसे टीपी लिंक, हिकवीजन और दहुआ भारतीय बाजार से लगभग बाहर हो जाएँगी। सरकार ने साफ कर दिया है कि अब इंटरनेट से जुड़ी वही कैमरा डिवाइस भारत में बिक सकेंगी, जिनके पास जरूरी सुरक्षा सर्टिफिकेट होगा। यह सर्टिफिकेट एसटीक्युसी यानी सरकारी जाँच प्रक्रिया के तहत मिलता है। जिन कंपनियों ने यह सर्टिफिकेट नहीं लिया है, वे अब अपने प्रोडक्ट भारत में नहीं बेच पाएँगी।
इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह देश की सुरक्षा मानी जा रही है। सरकार चाहती है कि भारत में इस्तेमाल होने वाले सभी निगरानी उपकरण सुरक्षित हों और उनका डेटा देश के लिए खतरा न बने। इसके साथ ही सरकार भरोसेमंद सप्लाई चेन और डेटा की सुरक्षा यानी डेटा संप्रभुता पर भी जोर दे रही है। जानकारों के अनुसार नए सर्टिफिकेशन नियमों का असर भारत के सीसीटीवी बाजार में तुरंत दिखाई देने लगा है। जो चीनी ब्रांड कुछ समय पहले तक बाजार का लगभग एक तिहाई हिस्सा रखते थे, अब वे या तो बाहर हो रहे हैं या अपने काम करने का तरीका पूरी तरह बदल रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब भारतीय कंपनियाँ जैसे सीपी प्लस, क्यूबो, प्रामा, मैट्रिक्स और स्पार्श मिलकर बाजार के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर कब्जा कर चुकी हैं। वहीं बॉश और हनीवेल जैसी विदेशी कंपनियों ने प्रीमियम सेगमेंट में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। दूसरी तरफ चीनी और छोटे खिलाड़ी नियमों का पालन न कर पाने की वजह से बाजार से गायब होते जा रहे हैं। जो कंपनियाँ ज्यादा हद तक चीनी चिपसेट और सॉफ्टवेयर पर निर्भर थीं, उन्हें नए नियमों को पूरा करने में काफी परेशानी हो रही है। हिकविजन जैसी बड़ी कंपनियों को अब भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करने और चीनी सप्लाई चेन से दूर जाने के रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं, क्योंकि भारत सरकार के नियम सख्त हो गए हैं। वहीं दहुआ की मौजूदगी बाजार में लगभग 80 प्रतिशत तक घट चुकी है।
जानकारों के अनुसार चीन से जुड़ी कंपनियाँ जैसे शाओमी और रियलमी, जो स्मार्ट होम कैमरा सेगमेंट में काफी मजबूत मानी जाती थीं, उन्होंने भी नए नियमों को पूरा करने में दिक्कत के कारण इस बाजार से दूरी बना ली है। इस बदलाव की वजह से लागत में करीब 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि अब लोकल स्तर पर चीजें तैयार करनी पड़ रही हैं और दूसरे स्रोतों से सामान लेना पड़ रहा है। हालाँकि बाजार के बड़े खिलाड़ियों ने निचले सेगमेंट में कीमतों को काफी हद तक संतुलित रखा है।
यह पूरा बदलाव अप्रैल 2024 में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा लागू किए गए नए नियमों से शुरू हुआ था। इन नियमों के तहत किसी भी प्रोडक्ट को भारत में बेचने से पहले उसकी सुरक्षा जाँच, उसमें इस्तेमाल हाने वाले पार्ट्स का स्रोत बताना और उसकी कमजोरियों की जाँच करना जरूरी कर दिया गया है।
04 फरवरी 2026 को भारत सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया, जिसमें बाजार में हो रहे बदलावों के पीछे की नीति को साफ तौर पर समझाया गया। इस सर्कुलर में बताया गया कि अब सीसीटीवी कैमरों की सुरक्षा से जुड़ी जाँच एक ही तरीके से होगी और इसके लिए एसटीक्युसी यानी मानक परीक्षण औऱ गुणवत्ता सर्टिफिकेशन की जाँच को जरूरी बनाया गया है, जो आवश्यक आवश्यकताओं के ढाँचे के तहत होगी।
सरकार ने दो अहम नियमों को आपस में जोड़ दिया है। पहला है अनिवार्य पंजीकरण आदेश और दूसरा है मेक इन इंडिया के तहत सरकारी खरीद में प्राथमिकता देने वाला नियम। अब इन दोनों के लिए अलग-अलग प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। एक ही एसटीक्युसी की सुरक्षा जाँच रिपोर्ट दोनों नियमों का पालन करने के लिए काफी होगी। इस फैसले से पहले जो भ्रम की स्थिति थी, वह अब खत्म हो जाएगी और नियमों को लागू करना भी ज्यादा सख्त और आसान हो जाएगा। जानकारों के अनुसार इस सर्कुलर में साफ कर दिया गया है कि सुरक्षा सर्टिफिकेशन का संबंध मेक इन इंडिया के तहत होनो वाली वैल्यू एडिशन यानी स्थानीय हिस्सेदारी की शर्तों से अलग है। आसान शब्दों में कहें तो अगर कोई उत्पाद लोकलाइजेशन यानी देश में बनने के मानकों को पूरा भी करता है, तब भी यह सुरक्षा जाँच से बच नहीं सकता।
यहाँ इंटरनेट से जुड़े उपकरणों के लिए बनने वाली सर्टिफिकेशन योजना यानी आइ्रओटी सिस्टम सर्टिफिकेशन स्कीम की अहम भूमिका होती है। सीसीटीवी कैमरे भी आईओटी डिवाइस माने जाते हैं, यानी ये इंटरनेट से जुड़े उपकरण हैं। इसलिए इनकी जाँच सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि साइबर सुरक्षा के लिए नजरिए से भी इनकी कड़ी जाँच होती है। इस व्यवस्था के तहत ऐसे उपकरणों को कई सख्त मानकों पर खरा उतरना होता है, जैसे संरक्षित संचार प्रणाली, डाटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन, छेड़छाड़ से बचाव और हार्डवेयर तक पहुँच को नियंत्रित रखना।
साल 2025 में सरकार ने सर्टिफिकेशन की समय सीमा बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया था और यहीं से बाजार में आ रहे मौजूदा बदलाव की नींव पड़ी। उसी समय सरकार ने सीसीटीवी कैमरों की जाँच का दायरा बढ़ाकर सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सॉफ्टवेयर और यहाँ तक कि सोर्स कोड स्तर तक की जाँच को भी इसमें शामिल कर लिया।
जैसा कि मई 2025 में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया था, निर्माताओं को अपने उपकरणों को सरकारी लैब में गहनता से सुरक्षा जाँच के लिए जमा करना अनिवार्य कर दिया गया था। इस जाँच में फर्मवेयर का विश्लेषण, एन्क्रिप्शन यानी डाटा को सुरक्षित रखने के तरीके की पड़ताल और उन संभावित कमजोरियों की पहचान शामिल थी, जिनके जरिए कोई दूर से सिस्टम तक पहुँच बना सकता है या डाटा चोरी कर सकता है।
इन नियमों के तहत अधिकारियों को यह अधिकार भी दिया गया कि वे जरूरत पड़ने पर भारत के बाहर स्थित निर्माण इकाइयों का भी निरीक्षण कर सकते हैं। साथ ही कंपनियों के लिए यह जरूरी कर दिया गया कि वे अपने उपकरणों में मजबूत सुरक्षा फीचर्स शामिल करें, जैसे डाटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन, मालवेयर यानी हानिकार सॉफ्टवेयर की पहचान और उसे रोकने की व्यवस्था और सुरक्षित संचार प्रणाली।
सबसे अहम बात डाटा की सुरक्षा से जुड़ी है। कैमरों से भेजा जाने वाला वीडियो डाटा एन्क्रिप्शन यानी सुरक्षित तरीके से भेजा जाना जरूरी है, ताकि कोई बीच में उसे देख या बदल न सके। इसके अलावा डिवाइस को इस तरह तैयार करना होगा कि वह साइबर हमलों का सामना कर सके। इसके लिए पहले से जाँच की जाती है, जिसमें सिस्टम की कमजोरियों को परखा जाता है।
सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया में कंपनियों को अपने उत्पाद से जुड़ी पूरी तकनीकी जानकारी देनी होती है। इसमें सिस्टम का ढाँचा कैसे काम करता है, फर्मवेयर की जानकारी और सुरक्षा से जुड़े नियम शामिल होते हैं। साथ ही यह भी साबित करना होता है कि डिवाइस सुरक्षित तरीके से शुरू होता है, उसके सॉफ्टवेयर के साथ छेड़छाड़ नहीं हो सकती और किसी तरह का छिपा हुआ बैकडोर एक्सेस मौजूद नहीं है।
दरअसल, सीसीटवी कैमरे सिर्फ अपराध रोकने के साधन नहीं होते। अगर इनसे समझौता हो जाए। तो यही कैमरे दुश्मन के लिए खुफिया जानकारी जुटा का जरिया बन सकते हैं। अलग-अलग एजेंसियों, ठेकेदारों और स्थानीय निकायों द्वारा बिना एक समान निगरानी व्यवस्था के लगाए गए कैमरों का बिखरा हुआ नेटवर्क कई ऐसी कमजोरियाँ पैदा करता है, जिनका फायदा दुश्मन देश, आतंकी संगठन या जासूसी करने वाले लोग उठा सकते हैं।
निगरानी से जुड़े ढाँचे में अगर सेंध लग जाए तो उसका खतरा सिर्फ कल्पना तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया में इसके खतरनाक उदाहरण सामने आ चुके हैं। ऑपइंडिया की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने कई सालों तक ईरान के ट्रैफिक कैमरा नेटवर्क और मोबाइल सिस्टम में घुसपैठ कर वहाँ के सर्वाच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनकी सुरक्षा टीम की गतिविधियों पर नजर रखी थी, उस हमले से पहले जिसमें उनकी मौत हुई बताई जाती है।
बताया जाता है कि इस निगरानी के जरिए इजरायली एजेंसियों ने सुरक्षाकर्मियों, ड्राइवरों और बडे़ अधिकारियों की हरकतों को ट्रैक किया। उन्होंने यह भी समझ लिया कि सुरक्षित परिसर के अंदर गाड़ियाँ कहाँ और कैसे खड़ी होती हैं, लोग किन रास्तों से आते जाते हैं और सुरक्षा में लगे लोगों की दिनचर्या क्या है। इन सब जानकारियों को इकट्ठा करके एक तरह से पूरा डाटा तैयार किया गया। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ट्रैफिक कैमरों से मिलने वाला डाटा सुरक्षित करके इजरायल के सर्वर तक भेजा गया, जबकि आसपास के मोबाइल नेटवर्क में भी दखल देकर किसी तरह की चेतावनी को देर से पहुँचाने या रोकने की कोशिश की गई।
यह सब दिखाता है कि अगर कैमरों में सेंध लग जाए, तो वे जंग के स्तर की खुफिया जानकारी जुटाने का साधन बन सकते हैं। इससे लोगों की आदतें, उनकी दिनचर्या, कमजोरियाँ और सही अहम बातें पता चल जाती हैं। जब इसे सिग्नल इंटरेस्पशन, डाटा एनालिसिस और मानव खुफिया जानकारी के साथ जोड़ा जाता है, तो दुश्मन के लिए निशाना तय करना और सटीक हमला करना आसान हो जाता है।
इसलिए भारत के लिए यह सिर्फ तकनीकी नियमों का पालन करने या कागजी प्रक्रिया भर का मामला नहीं है। यह देश की संप्रभुता, जासूसी के खिलाफ सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। अगर निगरानी का नेटवर्क सुरक्षित नहीं है या उसकी सही तरीके से जाँच नहीं होती, तो यह सिर्फ एक छोटी सी चूक नहीं बल्कि दुश्मन के लिए एक बड़ा मौका बन सकता है।
पिछले कुछ सालों में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों का असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है और इसी वजह से भारत के निगरानी सिस्टम में एक बड़ा ढाँचागत बदलाव आ गया है। जो शुरुआत में सिर्फ डाटा सुरक्षा की चिंता से शुरू हुआ था, वह अब पूरे नियमों के मजबूत ढाँते में बदल चुका है। यह ढाँचा सप्लाई चेन को नया रूप दे रहा है, देश में निर्माण को बढ़ावा दे रहा है और बिना जाँची परखी विदेशी तकनीक पर रोक लगा रहा है।
रामस्वरूप रावतसरे