खान-पान धर्म-अध्यात्म

नच्च वे जट्टा लोहड़ी आई वे …

डॉघनश्याम बादल

नई फसल आने की अग्रिम खुशी में पौष महीने के अंतिम दिन, सूर्य के डूबने के बाद बाद मकर संक्रांति से पहली रात 13 जनवरी को पूरा पंजाब ही नहीं वरन् उत्तर भारत लोहड़ी की मस्ती में डूब नाचता,भंगड़ा,गिद्धा डालता है ।  अपना हरा भरा खेत देख कर पंजाबी किसान जब झूम के नाचता है तो पता चल जाता है कि लोहड़़ी आ गई है । 

 कहें तो एक लोहड़ी एक्रॉस्टिक शब्द है, जिसमें ‘ल’ (लकड़ी) ‘ओह’ (गोहा या गोसा या सूखे उपले व ‘ड़ी’ रेवड़ी को जोड़कर बना है जो लोहड़ी पर बंटने वाले प्रसाद के अभिन्न अंग व लोहड़ी के प्रतीक हैं। इस दिन पूरा उत्तर भारत कैंप फायर के मूड़ में होता है । इसमें दो राय नहीं कि गरीब वर्ग के लिए पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी से बचने के लिए आग सहारा होती है शायद यही व्यावहारिकता लोहड़ी को मनाने का सबसे बड़ा कारण देती है।

ऐसे मनती है लोहड़ी

 उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में खिचड़वार और दक्षिण भारत के पोंगल पर भी–बेटियों को भेंट जाती है। कभी लोहड़ी से कई  दिन पहले ही लोहड़ी के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे किए जाते थे । इससे चौराहे या मुहल्ले के खुले स्थान पर आग जलाकर लोग अग्नि के चारों घर के  कामकाज से निपटकर हर  परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है। तिल की रेवड़ी और मक्की के भुने दाने जिन्हे फुल्ली भी कहा जाता है  अग्नि की भेंट किए जाते हैं तथा ये ही चीजें प्रसाद के रूप में भी बाँटी जाती हैं। घर लौटते समय लोहड़ी में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है।

    जिन परिवारों में लड़के का विवाह होता है अथवा जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या गाँव भर में बच्चे  रेवड़ी बाँटते हैं। लोहड़ी के दिन बच्चे बाजारों में दुकानदारों तथा राहगीरों से ‘मोहमाया’ या ‘महामाई’ (लोहड़ी का ही दूसरा नाम) के पैसे माँगते हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में डालते हैं।

यूं तो लोहड़ी का त्यौहार मुख्यतः पंजाबियों तथा हरियाणवी लोगों का प्रमुख त्यौहार माना जाता है पर अब यह पंजाब व हरियाणा की सीमाओं से बाहर निकल उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड  दिल्ली, जम्मू कश्मीर और हिमाचल सहित हर उस राज्य में पहंच गया है जहां पंजाबी व सिख रहने लगे हैं । 

कथा लोहड़ी की 

लोहड़ी से कई  कथागाथाएँ जुडी़ हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में यह अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से सिंधारा (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि भेजे जाते हैं। यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति का प्रायश्चित्त भी इसमें शामिल है।

   लोहड़ी का नायक दुल्ला भट्टी है जो एक विद्रोही था और उसके वंशज भट्टी राजपूत थे और पिंडी भट्टियों के शासक थे जो की संदल बार पकिस्तान में स्थित था । कुछ लोग कहते हैं कि दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था! उस समय संदल बार नाम के स्थान पर लड़कियों को गुलामी के लिए बलपूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को मुक्त ही नहीं करवाया अपितु उनकी शादी हिन्दू लडको से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई ।  

लोहडी के गीत

   लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी को सराहने के लिए उसकी प्रशंसा में गीत गाए जाते हैं –

इस अवसर पर गाया जाने वाला दुल्ला भट्टी सुंदरमुंदरिए हो…., तेरा कौण विचारा हो …’ गीत सबसे लोकप्रिय  है ।   यह गीत दुल्ला भट्टी वाले का यशोगान करता है, जिसने दो अनाथ कन्याओं, सुंदरी-मुंदरी की जबरन होने वाली शादी को रुकवाकर व उनकी जान बचाकर उनकी जंगल में आग जलाकर और कन्यादान के रुप में एक सेर शक्कर देकर शादी की थी। लड़कों की टोलियां अक्सर यह गीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं और यदि कोई लोहड़ी देने में आनाकानी करता है तो फिर यें बच्चे उनकी ठिठोली भी करने से बाज नहीं आते और गा – गा कर कहते हैं: हुक्के उत्ते हुक्का  घर भुक्का!’ लड़कियां भी कम नहीं वें भी अपने गीत गाकर लोहड़ी मांगती हैं पा नी माई पाथ्थी ,तेरा पुत्त चढेगा हाथ्थी’ और ंकंडा कंडा नीइस कंडे दे नाल कलीरा,  एजुग जीवे नी भाबो तेरा वीरा…’

पर, अगर मनमाफिक  लोहड़ी नहीं मिलती या कोई लोहड़ी नहीं देता तो लड़कियां भी खिल्ली उड़ाने से नहीं चूकती देखिए कैसे –

साड़े पैरां हेठ रोड,  सानूं छेतीछेती तोर!

साड़े पैरां हेठ दहीं , असीं मिलना वी नईं!

जैसे गीत पंजाब में लोहड़ी के दिन गाए जाते हैं । रिश्तेदारों को निशाना बनाकर बोलियां भी गाई जाती हैं जैसे मां, बाप, नाना, नानी इत्यादि से लोहड़ी लेने को लोहड़ी की बोलियां गाती हैं-कोठी हेठ चाकू , गुड़ दऊ मुंडे दा बापू।

अब तो पिताजी को कुछ न कुछ देकर छुटकारा करवाना पड़ता है वरना लोहड़ी मांगने वाला गाली भी गा देता है –‘‘मेवा दित्ता सूक्खा,पयौ मुंडे दा भुक्का!’’ यदि मनवांछित लोहड़ी मिलती है तो मांगने वाले का आभार भी जताते हैं,कलमदान विच घियोजीवे मुंडे दा पियो 

लोहड़ी : बदलते रंग

पर , समय के बदलते रंग के साथ कई पुरानी रस्में और त्योहारों पीछे छूट रही हैं या उनका आधुनिकीकरण हो गया है, लोहड़ी पर भी इसका प्रभाव पड़ा है। अब परंपरागत गीतों के बजाय डी जे पर फिल्मी गीत सुनाई पड़ते हैं । प्रगति के साथ बदलाव अच्छा है लेकिन अगर हमारी परंपराएं यूं ही मरती गई तो फिर लोहड़ी जैसे पर्व की मौलिकता व मस्ती भी खत्म हो जाएगी । 

पंजाब पर लगते नशाखोरी के आरोप की छाया लोहड़ी पर भी पडी है और त्यौहार की मस्ती के नाम पर जमकर ड्रग्स व शराब के साथ ही अफीम व चरस आदि का सेवन न केवल लोगों का स्वास्थ्य खराब कर कर रहा है अपितु लोहड़ी के रंग भी फीके कर रहा है । उससे लोहड़ी को बचाने के लिए  प्रयास करने होंगे। 

डॉ. घनश्याम बादल