कमलेश पांडेय
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कथनी और करनी में वैश्विक स्तर पर कतिपय महत्वपूर्ण अंतर दिखता है जो खुद अमेरिका फर्स्ट नीति को ही प्रभावित करता है। उनकी आक्रामक बयानबाजी अक्सर प्रत्यक्ष सैन्य या आर्थिक कार्रवाइयों से मेल खाती है लेकिन यह वैश्विक स्थिरता को भी चुनौती देती है। इससे सहयोगी देशों में अनिश्चितता बढ़ती है और प्रतिद्वंद्वी शक्तियां मजबूत होती हैं। इसलिए उनकी कथनी और करनी के अंतर को समझकर ही अपने अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा विभिन्न देश कर सकते हैं, अन्यथा अमेरिकी लाभ के शिकार बनते देर नहीं लगेगी। अचरज की बात तो यह है कि दुनिया को शांति का संदेश देने वाले ट्रंफ ही अब ‘युद्ध’ की अटकलों के सबसे बड़े पर्याय बनते प्रतीत होने लगे हैं।
ट्रंप की कथनी और करनी के कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं- पहला, ट्रंप ने वेनेजुएला पर बड़े पैमाने पर हमले का दावा किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने की बात कही जो सोशल मीडिया पर साझा की गई। दूसरा, ईरान में विरोध प्रदर्शनों पर उन्होंने “लॉक एंड लोडेड” चेतावनी दी, जो आर्थिक संकट पर केंद्रित था। अब वह कम्बोडिया और ग्रीनलैंड पर कार्रवाई करेंगे।
इसके पहले वह पनामा, कनाडा और मैक्सिको को लेकर भी अपनी मनोदशा जाहिर कर चुके हैं। भारत को रूस से अलग करने के लिए भी वह हरेक प्रकार के कुचक्र चला रहे हैं। दरअसल, उनके ये बयान तत्काल कार्रवाई में बदल गए, क्योंकि यह सबकुछ डीप स्टेट की योजना है जो डॉलर की दादागिरी सुनिश्चित करने के लिए ही बनाई गई है। लिहाजा ये वैश्विक प्रतिक्रियाओं को भड़काते हैं।
दरअसल, राष्ट्रपति ट्रंप की बातों में जो नीतिगत विरोधाभास दिखाई पड़ता है, वह निम्नलिखित है- पहला, 2025 नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी में चीन के साथ आर्थिक संतुलन की बात है लेकिन वास्तविकता में टैरिफ और क्षेत्रीय हस्तक्षेप बढ़े हैं। दूसरा, रूस पर नरम रुख अपनाया गया यूक्रेन आक्रमण की अनदेखी करते हुए, जबकि पहले की रणनीति में इसे खतरा माना गया था। तीसरा, यूरोप को “सभ्यता ह्रास” का आरोप लगाकर अमेरिका के ही सहयोगियों को कमजोर किया जा रहा है।
इस प्रकार देखा जाए तो उनकी इस उधेड़बुन का गहरा वैश्विक प्रभाव पड़ा है, क्योंकि ये अंतर बहुपक्षीय व्यवस्था को कमजोर करते हैं, क्षेत्रीय गठबंधनों को बिखेरते हैं और चीन-रूस जैसे प्रतिद्वंद्वियों को एकजूट होने के अवसर देते हैं। वहीं, लैटिन अमेरिका में मॉनरो सिद्धांत का नया रूप अपनाकर प्रवासन और चीन प्रभाव पर फोकस तो किया, लेकिन हस्तक्षेपवाद बढ़ा रहा है। खासकर भारत जैसे देशों के लिए यह अमेरिकी निर्भरता पर पुनर्विचार कराता है।
देखा जाए तो डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति के दूसरे कार्यकाल में प्रमुख बदलाव “अमेरिका फर्स्ट” सिद्धांत पर केंद्रित हैं, जो बहुपक्षीय सहयोग से हटकर लेन-देन आधारित (ट्रांजेक्शनल) दृष्टिकोण अपनाते हैं। ये बदलाव सहयोगी देशों को अलग-थलग करते हुए आर्थिक दबाव और क्षेत्रीय हस्तक्षेप को बढ़ावा देते हैं। इससे सहयोगी संस्थाओं से दूरी बढ़ सकती है। क्योंकि ट्रंप ने नाटो फंडिंग में कटौती की धमकी दी, संयुक्त राष्ट्र के बजट को कम किया, और पेरिस जलवायु समझौते से दोबारा बाहर निकलने की प्रक्रिया शुरू की। उधर, यूक्रेन को सैन्य सहायता घटाकर रूस के प्रति नरम रुख अपनाया गया जो पहले की नीतियों से उलट है।
जहां तक आर्थिक हथियारों के प्रयोग की बात है तो उन्होंने अभूतपूर्व टैरिफ युद्ध शुरू किया है, जिसमें चीन, भारत, ब्राजील जैसे देशों पर व्यापार प्रतिबंध लगाए गए, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ। उधर, विदेशी सहायता में कटौती की गई और ग्रीनलैंड, पनामा नहर जैसे क्षेत्रों पर दावा जताया गया। इससे क्षेत्रीय हस्तक्षेपवाद को बढ़ावा मिला। खासकर वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई और ईरान को धमकी जैसे कदमों से लैटिन अमेरिका व मध्य पूर्व में आक्रामकता बढ़ी जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध में तटस्थता और चीन विरोधी रुख ने वैश्विक शक्ति संतुलन को बहुध्रुवीय बनाया।
इन्हीं सब वजहों से डोनाल्ड ट्रंप के नए विदेश नीति दर्शन को “ट्रंप सिद्धांत” या “अमेरिका फर्स्ट” के आक्रामक पुनर्संतुलन के रूप में जाना जाता है। यह सौदा-केंद्रित, लेन-देन आधारित विश्वदृष्टि पर टिका है, जो वैचारिक बाधाओं को नकारते हुए अमेरिकी हितों को सर्वोपरि रखता है। उनके आक्रामक पुनर्संतुलन के इस दर्शन से अमेरिका, चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ आक्रामक रणनीति अपनाता है, जिसमें व्यापार युद्ध, टैरिफ और सैन्य ताकत का प्रयोग शामिल है। कार्यकारी शक्ति का अति-संकेन्द्रण और वैचारिक सफाई इसके मूल हैं, जो पारंपरिक बहुपक्षवाद से हटकर एकतरफा कार्रवाइयों को प्राथमिकता देते हैं।
यूँ तो सौदेबाजी की कला में ट्रंप माहिर खिलाड़ी समझे जाते हैं और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हार्ड निगोशिएटर करार देते हैं। ऐसा इसलिए कि ट्रंप वैश्विक मुद्दों को आर्थिक लाभ से हल करने पर जोर देते हैं, सहयोगियों से अधिक फंडिंग की मांग करते हुए नाटो और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं से दूरी बनाते हैं। रूस-यूक्रेन या ईरान जैसे संकटों में तटस्थता या नरम रुख अपनाते हुए, “शक्ति के माध्यम से शांति” का सिद्धांत लागू होता है।
इसका वैश्विक प्रभाव यह पड़ेगा कि ट्रंप दर्शन गठबंधनों को विखंडित कर सकता है, लेकिन अल्पकालिक सौदों से अमेरिकी प्रभुत्व बहाल करने का लक्ष्य रखता है। भारत जैसे देशों को रणनीतिक हेजिंग की आवश्यकता पैदा करता है। वहीं, डोनाल्ड ट्रंप की चीन नीति में दूसरे कार्यकाल के दौरान आक्रामक टैरिफ और प्रतिबंधों के बीच नरमी के संकेत दिखते हैं, जो पहले की पूर्ण व्यापार युद्ध रणनीति से बदलाव दर्शाते हैं। एनवीडिया (Nvidia) जैसे प्रतिबंध हटाकर एआई (AI) चिप्स की बिक्री फिर शुरू की गई, जबकि रेयर अर्थ खनिजों पर चीन के नियंत्रण के जवाब में 100% अतिरिक्त टैरिफ लगाए गए।
इन सबसे प्रमुख बदलाव यह हुआ कि पहले कार्यकाल की तुलना में अब ताइवान के प्रति नरमी और चिप निर्यात प्रतिबंधों में ढील दी गई है, जो व्यापार वार्ता को प्राथमिकता देता है। मसलन 1 नवंबर 2025 से सभी चीनी आयात पर 100% टैरिफ लागू करने की घोषणा हुई, लेकिन रेयर अर्थ और सेमीकंडक्टर पर सौदेबाजी जारी है। कारण यह कि अमेरिका की रेयर अर्थ खनिजों की चीन पर निर्भरता मुख्य कारण है, जो इलेक्ट्रिक वाहन, सैन्य उपकरण और एआई (AI) विकास को प्रभावित करती है। इस प्रकार राजनीतिक दबाव और वैकल्पिक आपूर्ति की कमी से ट्रंप ने सौदेबाजी को चुना, जिससे भारत-चीन संबंध मजबूत होने का जोखिम बढ़ा।
वहीं, ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 25% से 50% तक के टैरिफ बढ़ोतरी से भारतीय निर्यात पर गंभीर असर पड़ रहा है, खासकर अमेरिका को 87 अरब डॉलर के वार्षिक निर्यात पर। यह रूस से तेल आयात और द्विपक्षीय व्यापार घाटे (45.7 अरब डॉलर) के कारण लगाया गया, जिससे श्रम-गहन क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं। इससे प्रभावित क्षेत्र टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, रत्न-आभूषण, ऑटो कंपोनेंट्स, सीफूड (विशेषकर श्रिंप, जिसका 66% हिस्सा अमेरिका जाता है), चमड़ा, रसायन और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में बिक्री घटी है।
अलबत्ता, अब अमेरिका में भारतीय सामान महंगा होने से प्रतिस्पर्धा कमजोर हुई, जिससे हजारों नौकरियां खतरे में हैं और 48 अरब डॉलर का निर्यात जोखिम में है। इसका आर्थिक परिणाम यह हुआ कि जीडीपी पर सीधा नकारात्मक प्रभाव संभव है, क्योंकि ये क्षेत्र निर्यात-निर्भर अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हैं। FIEO ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की वकालत की है, जो टैरिफ कम कर सकता है, लेकिन अल्पकालिक घाटा 3000 करोड़ रुपये से अधिक का अनुमानित है। इसलिए भारत को वैकल्पिक बाजारों (यूरोप, एशिया) और FTA पर फोकस बढ़ाना होगा।
इसके अलावा, भारत के पड़ोसी देशों के मार्फ़त भारत को घेरने तथा परेशान करके अपने प्रभुत्व में लेने की जो छिपी चालें चल रहे हैं, उनसे भी सावधान रहने की जरूरत है। रूस के दोस्त भारत को नीचा दिखाने के लिए ट्रंफ चीन से भी हाथ मिला सकते हैं। इसलिए इनकी कथनी और करनी से भारत को सावधान रहने की जरूरत है। पाकिस्तान के इस वफादार दोस्त से जितनी होशियारी पूर्वक डील हो सके, किया जाए पर भरोसा बिल्कुल नहीं क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत अमेरिका का असली रंग देख चुका है। इसलिए चीन से भी अतिशय सावधानी बरतने की जरूरत है।
कमलेश पांडेय