विश्ववार्ता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के कूटनीतिक निहितार्थ

कमलेश पांडेय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इजरायल यात्रा भारत-इजरायल संबंधों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो वैश्विक भू-राजनीति में बदलते समीकरणों को दर्शाती है। यह यात्रा पश्चिम एशिया की अस्थिरता के बीच रणनीतिक साझेदारी को नई दिशा देती है। इस बार मोदी ने इजरायल संसद केनेसेट को संबोधित किया, जहां उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 हमले के बाद भारत के इजरायल समर्थन की पुष्टि की और ईरान द्वारा शह प्राप्त हमास की मानवता द्रोही कार्रवाई की भर्त्सना की। इसके अलावा, नेतन्याहू के साथ द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा, व्यापार और आतंकवाद विरोधी सहयोग पर जोर दिया।

देखा जाए तो यह 2017 के बाद पीएम मोदी की दूसरी इजरायल यात्रा 2026 में हुई, जो द्विपक्षीय व्यापार को कई अरब डॉलर तक ले जाने में सहायक सिद्ध हुई। जहां तक इस यात्रा के रणनीतिक महत्व की बात है तो यह यात्रा बढ़ते ईरान-अमेरिका तनाव और अमेरिकी नौसेना की तैनाती के बीच हुई, जो इजरायल को मजबूती प्रदान करती है। वहीं नेतन्याहू का प्रस्तावित ‘हेक्सागन’ गठबंधन (भारत, इजरायल, ग्रीस, साइप्रस आदि) चीन-पाकिस्तान-तुर्की धुरी के विरुद्ध एक रणनीतिक संतुलन भी बनाता है। यह वैश्विक कूटनीति में नहले पर दहले की तरह समझा जा रहा है।

जिस तरह से भारत, इजरायल का सबसे बड़ा हथियार खरीदार बन चुका है, उससे दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व की सुरक्षा का समीकरण प्रभावित होना स्वाभाविक है। इससे अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय देशों को भी भारत की कूटनीतिक स्वायत्तता का एहसास हुआ है, जो भारत को एशिया की दूसरी और दुनिया की तीसरी-चौथी महत्वपूर्ण शक्ति बनाने की दिशा में सक्रिय है।

जहां तक इस यात्रा के आर्थिक आयामों की बात है तो दोनों देशों के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर सकारात्मक चर्चा हुई, जो दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। खासकर IMEC कॉरिडोर (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप) पर UAE के साथ त्रिपक्षीय सहयोग से वैश्विक व्यापार को एक नया आकार मिलने की संभावना है। वहीं कृषि, जल प्रबंधन और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में इजरायली विशेषज्ञता भारत के विकास को काफी बढ़ावा देगी।

शायद यही वजह है कि अरब जगत में खलबली मची है और इस्लामिक कट्टरता को हवा देने वाले पश्चिमी और पूर्वी देशों में बेचैनी भी। इस प्रकार की वैश्विक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। जहां मोदी की इजरायल यात्रा से इस्लामी देशों की मीडिया में खलबली मची, क्योंकि यह ‘इस्लामी उग्रवाद’ विरोधी एक्सिस का संकेत माना गया। वहीं फिलिस्तीन समर्थन बनाए रखते हुए अमेरिका को सिग्नल देते हुए भारत ने ग्लोबल साउथ में संतुलित भूमिका निभाई,। 

वहीं इस यात्रा ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की वैश्विक छवि को मजबूत किया, जो गाजा संकट के बीच चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि आए दिन बढ़ते वैश्विक इस्लामिक कट्टरता परस्त आतंकवाद, भीड़ हिंसा और लक्षित हमलों से भारत और इजरायल दोनों को खतरा है, इसलिए उनकी पारस्परिक और लाभप्रद एकजुटता भारत-इजरायल विरोधी देशों को चुभती रहती है। 

# भारत और इजरायल के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए

चूंकि भारत और इजरायल के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए, जबकि भारत ने 1950 में ही इजरायल को मान्यता दी थी। खासकर मोदी सरकार के नेतृत्व में 2014 से द्विपक्षीय संबंध तेजी से मजबूत हुए, जिसमें उच्च स्तरीय यात्राएं और रक्षा-सहयोग प्रमुख रहे। इससे द्विपक्षीय लाभ में वर्ष दर वर्ष बढ़ोतरी दृष्टिगोचर हुई। रक्षा और सुरक्षा सहयोग के मद्देनजर इजरायल भारत का प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता है, जो ड्रोन, मिसाइल और खुफिया प्रणालियां प्रदान करता है। 

दोनों देश आतंकवाद विरोधी प्रयासों में एकजुट हैं, जो सीमा-पार खतरों से निपटने में सहायक सिद्ध होता है। 

जहां तक आर्थिक और तकनीकी साझेदारी की बात है तो व्यापार में भारत इजरायल का एशिया में दूसरा सबसे बड़ा साझेदार है, जिसमें कृषि, जल प्रबंधन, एआई और क्वांटम कंप्यूटिंग शामिल हैं। I2U2 (भारत, इजरायल, यूएई, अमेरिका) और IMEC जैसे मंच आर्थिक गलियारों को बढ़ावा देते हैं।

भारत-इजरायल की दोस्ती से भू-राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ा है। यह दोस्ती जहां चीन की मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में बढ़ती प्रभाव को संतुलित करने में मदद करती है। वहीं ईरान-प्रभावित क्षेत्रों में वैकल्पिक ध्रुव बनाकर स्थिरता सुनिश्चित होती है, जबकि भारत फिलिस्तीन समर्थन बनाए रखता है। इससे वैश्विक मंचों पर भी सामंजस्य बढ़ा है। खासकर संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर दोनों आतंकवाद-विरोध और सुधारों पर सहमत हैं। 2026 में संयुक्त कार्ययोजना से कूटनीति, साइबर और संस्कृति में सहयोग बढ़ेगा। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करता है। 

भारत-इजरायल संबंधों को I2U2 गठबंधन ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। यह समूह (भारत, इजरायल, यूएई, अमेरिका) दोनों देशों के बीच सहयोग को बहुपक्षीय रूप प्रदान करता है। I2U2 ने जल, ऊर्जा, परिवहन, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा जैसे छह क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा दिया है। भारत और इजरायल के बीच तकनीकी साझेदारी, जैसे सौर ऊर्जा परियोजनाएं और खाद्य पार्क, इसी से मजबूत हुई। 

जहां तक अब्राहम समझौते के  लाभ की बात है तो अब्राहम समझौते के बाद यूएई-इजरायल संबंध सामान्य होने से भारत बिना फिलिस्तीन संबंधों को नुकसान पहुंचाए इजरायल से गहरा जुड़ाव बना पाया।  इससे भारत की पश्चिम एशिया नीति में संतुलन आया। भू-राजनीतिक मजबूती मिली। यह गठबंधन चीन के मध्य पूर्व प्रभाव को काउंटर करता है, जबकि भारत-इजरायल रक्षा और साइबर सहयोग बढ़ा। I2U2 ने IMEC जैसे कॉरिडोर को सपोर्ट किया, जो भारत की कनेक्टिविटी रणनीति को मजबूत करता है। 

# मोदी की 2017 इजरायल यात्रा से सम्बन्धों को मिली मजबूती

अतीत की बात करें तो मोदी की 2017 इजरायल यात्रा ने भारत-इजरायल संबंधों को ऐतिहासिक मोड़ दिया। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी, जिसने द्विपक्षीय सहयोग को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा प्रदान किया। इससे रक्षा सहयोग में उछाल आया। यात्रा के दौरान रक्षा समझौतों पर जोर दिया गया, जिसमें मिसाइल प्रणाली और ड्रोन तकनीक शामिल थी। नेतन्याहू के साथ मोदी की साझा सड़क यात्रा ने आतंकवाद-विरोधी एकजुटता को मजबूत किया।

 वहीं कृषि और जल प्रौद्योगिकी क्षेत्र में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ परियोजनाओं का विस्तार हुआ, जो भारत के किसानों को ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीक प्रदान करती हैं। इनसे द्विपक्षीय व्यापार $5 बिलियन से अधिक पहुंचा।

वहीं नवाचार और स्टार्टअप सेतु’इनोवेशन ब्रिज’ पहल ने स्टार्टअप्स और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाया। यात्रा ने I2U2 जैसे बहुपक्षीय मंचों की नींव रखी, जो अब्राहम समझौते से जुड़े। यह भारत की पश्चिम एशिया नीति को संतुलित बनाती है। 

खासकर मोदी की पिछली इजरायल यात्रा के दौरान सात प्रमुख समझौते हस्ताक्षरित हुए, जिन्होंने द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत आधार प्रदान किया। ये समझौते मुख्यतः कृषि, जल प्रबंधन, अंतरिक्ष और अनुसंधान पर केंद्रित थे। जल और कृषि क्षेत्र में गंगा सफाई, जल संरक्षण तथा स्वच्छता कार्यक्रमों के लिए यूपी जल निगम और इजरायल ऊर्जा-जल विभाग के बीच करार हुआ। कृषि विकास कार्यक्रम तथा ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकों पर तीन वर्षीय कार्ययोजना बनी। 

वहीं, अंतरिक्ष एवं नवाचार सहयोग से छोटे सैटेलाइट्स, परमाणु घड़ी निर्माण तथा जियो-लियो ऑप्टिकल लिंक पर तीन समझौते हुए। अनुसंधान एवं नवोन्मेष के लिए 260 करोड़ रुपये का साझा फंड स्थापित किया गया। वहीं अतिरिक्त घोषणाएं जैसे यात्रा में प्रत्यक्ष MoU के अलावा OCI कार्ड, सांस्कृतिक केंद्र तथा तेल अवीव-दिल्ली फ्लाइट सेवाओं की घोषणा हुई। ये कदम रक्षा उत्पादन तथा आतंकवाद-विरोधी सहयोग को भी बढ़ावा देते हैं।

मोदी की 2017 इजरायल यात्रा के समझौतों से भारत को कृषि उत्पादकता, जल प्रबंधन और तकनीकी नवाचार में ठोस लाभ मिले हैं। ल्य इनसे किसानों को आधुनिक सिंचाई तकनीकें और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का प्रत्यक्ष फायदा हुआ। कृषि और जल क्षेत्र में ड्रिप इरिगेशन तथा ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ परियोजनाओं से सूखा प्रभावित क्षेत्रों में फसल उत्पादन 30-50% बढ़ा है। वहीं गंगा सफाई तथा जल संरक्षण कार्यक्रमों ने नदी पुनरुद्धार को गति दी।

इसी प्रकार अंतरिक्ष एवं अनुसंधान के क्षेत्र में भी लाभ हुए।छोटे सैटेलाइट्स तथा जियो-लियो लिंक से ISRO की क्षमता मजबूत हुई, जिससे कृषि निगरानी और आपदा प्रबंधन बेहतर हुआ। जबकि 260 करोड़ के संयुक्त फंड ने 100+ स्टार्टअप्स को सहायता प्रदान की। इनसे द्विपक्षीय व्यापार $10 बिलियन तक पहुंचा तथा आत्मनिर्भर भारत को प्रेरणा मिली। रक्षा-सहयोग में भी अप्रत्यक्ष लाभ हुआ, जो आतंकवाद-विरोधी प्रयासों को मजबूत करता है।

कमलेश पांडेय