विश्ववार्ता

क्या भारत को अब होर्मुज डॉक्ट्रिन की जरूरत है?

पंकज जायसवाल

जलडमरूमध्य वह संकीर्ण समुद्री मार्ग होता है जो दो बड़े समुद्रों या महासागरों को जोड़ता है और दो भूभागों महाद्वीप या द्वीपों के बीच स्थित होता है। यह समुद्री जहाजों के आवागमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्राकृतिक मार्ग होता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल चोकपॉइंट है जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। यह उत्तर में ईरान और दक्षिण में ओमान तथा यूएई के बीच स्थित है। यहाँ से वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत और एलएनजी का लगभग 20 प्रतिशत गुजरता है जो इसे ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत सामरिक बनाता है।

यह लगभग 104 मील लंबा है और अपने सबसे संकरे स्थान पर केवल लगभग 21–33 मील चौड़ा है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर और ईरान जैसे देशों से तेल और गैस इसी मार्ग से दुनिया भर में जाती है। इसलिए यह मार्ग वैश्विक अर्थव्यवस्था की चाबी माना जाता है। भारत अपनी गैस और तेल की जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा  इसी मार्ग से आयात करता है।

यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत आज भी अपने आयातित कच्चे तेल का लगभग 35 से 50 प्रतिशत इसी रास्ते से आयात करता है, जबकि गैस के मामले में यह प्रतिशत 50 प्रतिशत से भी ऊपर चला जाता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि हमारा तेल और गैस का कुल आयात 85 प्रतिशत से भी अधिक है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज ऊर्जा के बिना कोई भी देश लगभग पंगु हो सकता है, क्योंकि उद्योगों से लेकर परिवहन तक अधिकांश गतिविधियाँ तेल और गैस पर निर्भर हैं। कल-कारखानों से लेकर लगभग सभी तरह के वाहन तेल से चलते हैं। भारत के अधिकांश घरों और रेस्टोरेंट में खाना गैस से बनता है। हवाई जहाज से लेकर समुद्री जहाज और कारें सब तेल पर निर्भर हैं। तेल के बिना देश के विकास की कल्पना करना कठिन है।

ऐसे में यदि इतना महत्वपूर्ण संसाधन देश में उपलब्ध नहीं है और हम बाहरी स्रोतों पर निर्भर हैं तो अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ कभी भी हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं।

यदि किसी भी संसाधन या आपूर्ति पर हमारी निर्भरता 50 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, तो वह हमारे लिए अत्यंत क्रिटिकल हो जाती है। ऐसे मामलों में उसकी विस्तृत जोखिम प्रोफाइलिंग की जाती है और उसे उच्चतम जोखिम श्रेणी में रखा जाता है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि दूसरे देशों पर हमारा सीधा नियंत्रण नहीं होता।

ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत ने इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि हमारे लगभग 40 प्रतिशत तेल और 50 प्रतिशत से अधिक गैस की आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से आती है अपने विदेश मंत्रालय, आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय में “होर्मुज डिप्लोमेसी” जैसा कोई रणनीतिक अध्याय बनाया है या नहीं।

यदि हमारी निर्भरता इतनी अधिक है कि दो महीने तक यह मार्ग बाधित होने पर देश की अर्थव्यवस्था धीमी पड़ सकती है और तीन महीने तक रुकने पर आर्थिक गतिविधियाँ गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं, तो क्या हमने “होर्मुज डॉक्ट्रिन” जैसा कोई रणनीतिक ढांचा तैयार किया है?

यदि ऐसा कोई ढांचा पहले से मौजूद है, तो देश को इससे अवगत कराया जाना चाहिए, ताकि अनावश्यक चिंता या अफरातफरी न फैले। और यदि ऐसा कोई ढांचा नहीं है, तो इस विषय को संसद और देश के सामने लाकर अब कम से कम ऐसी नीति तैयार की जानी चाहिए।

तेल और गैस के मामले में होर्मुज पर हमारी निर्भरता और रक्षा क्षेत्र में इज़राइल पर हमारी निर्भरता दोनों ने भारत को एक जटिल रणनीतिक स्थिति में ला खड़ा किया है। ऊर्जा और रक्षा दोनों ही भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं और इनके बीच संतुलन बनाए रखना हमारे लिए आवश्यक है।

भारत के सामने आज एक प्रकार का धर्मसंकट है। एक ओर ईरान है, जिसके साथ भारत के संबंध प्राचीन सभ्यताओं के दौर से जुड़े रहे हैं। जब हमारी भूमि सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से जानी जाती थी और वहाँ मेसोपोटामिया सभ्यता थी, तब से दोनों क्षेत्रों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। आज भी ईरान भारत के लिए ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। कई मामलों में उसने हमें तेल के भुगतान में लचीलापन, परिवहन और बीमा में रियायतें भी दीं। कश्मीर जैसे मुद्दों पर भी कई बार उसका रुख भारत के लिए लाभकारी रहा है।

इसके अतिरिक्त चाबहार पोर्ट परियोजना भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, जो हमें पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और क्षेत्रीय भू-राजनीति में एक मजबूत स्थिति देता है।

दूसरी ओर इज़राइल भी भारत का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। रक्षा और तकनीकी सहयोग के मामले में इज़राइल ने कई अवसरों पर भारत का साथ दिया है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों से लेकर कई अन्य सुरक्षा परिस्थितियों में इज़राइल भारत के साथ खड़ा रहा है।

समस्या यह है कि हमारे दोनों महत्वपूर्ण साझेदार आज आपस में टकराव की स्थिति में हैं जबकि भारत के हित दोनों से जुड़े हुए हैं। हम इज़राइल से संबंध खराब नहीं कर सकते, क्योंकि उससे हमारी रक्षा क्षमताएँ प्रभावित हो सकती हैं। वहीं ईरान से दूरी हमारी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचा सकती है।

हालाँकि इस पूरी परिस्थिति में एक बिंदु भी दिखाई देती है। युद्ध शुरू होने से कुछ समय पहले भारत के प्रधानमंत्री की इज़राइल यात्रा की योजना बनी। जिसने भी इस यात्रा की रणनीतिक योजना बनाई, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि बदलते भू-राजनीतिक हालात में भारत की तटस्थता प्रभावित न हो। ऐसे कदमों का अंतरराष्ट्रीय संदेश भी महत्वपूर्ण होता है।

इसके बावजूद मेरा मानना है कि इस जटिल परिस्थिति में भारत ने जो संतुलित रुख अपनाया है, वह उपलब्ध विकल्पों में एक व्यावहारिक और विवेकपूर्ण निर्णय है।

ऐसे समय में भारत को तटस्थ रहते हुए दोनों पक्षों से शांति की अपील करनी चाहिए। हम वही संदेश दोहरा सकते हैं जो यूक्रेन संकट के दौरान दिया गया था कि यह युद्ध का नहीं, बल्कि बुद्ध के संदेशों का समय है। साथ ही, पर्दे के पीछे कूटनीतिक प्रयासों और मानवीय सहायता के माध्यम से संघर्ष को रोकने का प्रयास किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही विदेश मंत्रालय, आंतरिक सुरक्षा मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय को मिलकर “होर्मुज डॉक्ट्रिन” जैसे एक स्पष्ट रणनीतिक ढांचे का निर्माण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन सभी संभावित जोखिम स्थितियों के लिए भी अलग-अलग रणनीतिक सिद्धांत तैयार किए जाने चाहिए जो “मेटा-इकोनॉमिक्स प्रभाव” के कारण भारत को सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना भी प्रभावित कर सकते हैं।