शिक्षण संस्थाएं और राजनीति

सुरेश हिन्दुस्थानी

हा जाता है कि किसी भी देश के संस्कारों को समाप्त करना है तो वहां की युवा पीढ़ी को भ्रमित कर दीजिए। वह देश अपने मूल चरित्र को विस्मृत कर देगी। वर्तमान में देश के तमाम विश्वविद्यालयों में इसी प्रकार के दृश्य दिखाई दे रहे हैं, जो भारतीय संस्कारों से बहुत दूर होने का आभास करा देते हैं। इसके पीछे शिक्षा देने वाली व्यवस्था एक कारण हो सकती है। लेकिन वर्तमान में जिस प्रकार से देश की शिक्षण संस्थाओं का राजनीतिक हित के लिए उपयोग किया जाने लगा है, उससे यही लग रहा है कि छात्रों के दिल और दिमाग में देश के विरोध में जहर भरने का कार्य सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है। यही कारण है कि जेएनयू में कभी देश विरोधी नारे लगते हैं तो कभी आतंकियों के समर्थन में आवाज उठाई जाती है। यह खेल वर्तमान में भी दिखाई दे रहा है।नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय परिसर में जो हिंसा हुई, उसकी तस्वीर स्पष्ट होती जा रही है। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन करने वालों में शामिल दस ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया है, जो इस विश्वविद्यालय के छात्र नहीं हैं। इनमें तीन हिस्ट्रीशीटर हैं। सवाल यह कि हिस्ट्रीशीटर आखिर किसके कहने पर  प्रदर्शन में शामिल हुए? छात्रों के विरोध प्रदर्शन में उनका क्या काम? दूसरी ओर जामिया विश्वविद्यालय के प्रबंधन का भी कहना है कि विश्वविद्यालय के छात्रों ने किसी भी प्रकार का हिंसक प्रदर्शन नहीं किया। इससे भी यह स्पष्ट हो रहा है कि यह आंदोलन पूरी तरह से राजनीतिक है। इस बात के संकेत इससे भी मिलते हैं कि दिल्ली सरकार के एक जिम्मेदार मंत्री ने बिना किसी प्रमाण के दिल्ली पुलिस पर ही यह आरोप लगा दिया कि हिंसा पुलिस ने की है, उसी ने ही बसों में आग लगाई है। जबकि पुलिस का कहना है कि वह तो आग बुझाने गई थी। इस आंदोलन को कांग्रेस का भी साथ मिला, जिससे यही साबित होता है कि नागरिकता के मुद्दे पर पूरी तरह से राजनीति की जा रही है। गौरतलब है कि यह अधिनियम उन भारतीय मूल के विदेशी अल्पसंख्यक (हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) लोगों को भारतीय नागरिकता देने का समर्थन करने वाला है जो भारत में घुसपैठ करके आए हैं। एक सवाल यह भी है कि हमारे देश के राजनीतिक दल विश्वविद्यालयों को राजनीति का अड्डा क्यों बनाना चाह रहे हैं। हम जानते हैं कि जेएनयू में पहले भी देश विरोधी नारे लगाए जा चुके हैं। आतंकी अफजल के समर्थन में स्वर मुखरित किए जा चुके हैं। जिन्हें कांग्रेस व वामदलों सहित कई राजनीतिक दलों का समर्थन मिला था। इस बार भी जेएनयू में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में वातावरण बनाने का प्रयास किया गया। साथ ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और हैदराबाद स्थित उर्दू विश्वविद्यालय में भी हिंसा फैलाई गई। देखते ही देखते देश के 22 शिक्षण संस्थान सुलगने लगे। आईआईटी और आईआईएम भी आंदोलन की आग से अछूते नहीं रहे। सवाल यह कि देश के विश्वविद्यालयों में ऐसा माहौल बनाने के पीछे कौन-सी शक्तियां हैं? क्या यह कदम छात्रों को भ्रमित करने का प्रयास नहीं है? राजनीतिक संरक्षण में होने वाले इस आंदोलन के पीछे क्या देश को बांटने का षड्यंत्र नहीं है? अगर ऐसा है तो ऐसे विश्वविद्यालयों को बंद कर देना चाहिए।देश के युवाओं को भी इस बात का परीक्षण करना चाहिए कि नागरिकता संशोधन अधिनियम का जो राजनीतिक दल विरोध कर रहे हैं, उसकी वास्तविकता क्या है? क्योंकि इसे लेकर जो प्रचारित किया जा रहा है, वह निश्चित ही देश को भ्रमित करने जैसा ही है। नागरिकता कानून केवल उन लोगों के लिए है जो विदेश से आते हैं। खासकर उनको नागरिकता देने के लिए है, जो विदेशों से धार्मिक रुप से प्रताड़ित होकर आते हैं। इसमें किसी भी भारतीय नागरिक के बारे में कोई बात नहीं है। लेकिन इसे ऐसे प्रचारित किया जा रहा है कि जैसे यह भारत के नागरिकों के विरोध में है। जो सही नहीं है।नागरिकता कानून को लेकर देशभर में जिस प्रकार से उत्पात मचाया जा रहा है, उसे लेकर यह निश्चित रुप से कहा जा सकता है कि नागरिकता का मुद्दा अपने मूल अर्थ से भटकता जा रहा है या उसे भटकाने का प्रयास किया जा रहा है। पहले असम में एनआरसी का विरोध किया गया। बाद में हिंसात्मक विरोध को विस्तारित करने की योजना बनती रही। यह सारा प्रदर्शन देश के विरोध में वातावरण तैयार करने का काम करता हुआ दिखाई दे रहा है। सवाल यह कि जो कानून गैर हिन्दू विदेशी घुसपैठियों के विरोध में है, उससे भारत के नागरिकों का क्या हानि है? इसलिए ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि इस सारे आंदोलन के पीछे राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है। क्या विपक्षी दल भाजपा का विरोध करते-करते देश का विरोध करेंगे? देशवासियों को यह सोचना होगा और उन्हें मुंहतोड़ जवाब देना होगा। इस प्रकार के प्रदर्शनों के पीछे का भाव यही लगता है कि यह सारे प्रदर्शन भारत में घुसपैठ कराने का समर्थन करने वाले हैं। यह भी सच है कि अगर मुस्लिम  घुसपैठियों को भारत की नागरिकता मिल भी जाती है तो इससे छात्रों को कोई लाभ मिलने वाला नहीं है। खास बात यह भी है कि जिस नागरिकता कानून को कांग्रेस मुसलमानों के विरोध में बताने का खेल खेल रही है, वह वास्तव में भारत के मुसलमानों के विरोध में बिलकुल नहीं है। लेकिन ऐसा लगता है कि इसके बावजूद भारत के राजनीतिक दलों द्वारा मुसलमानों को भड़काने का काम किया जा रहा है। यह प्रश्न इसलिए भी उठ रहा है कि जहां इस प्रकार की हिंसा फैलाई जा रही है, उन क्षेत्रों में एक विशेष समुदाय बहुतायत में रहता है। भारत के मुसलमानों को चाहिए कि वह राजनीतिक दलों के बहकावे में न आएं, क्योंकि यह उनके विरोध में है नहीं है।

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