समाज

भारतीयता के विस्तार का महत्त्वपूर्ण आधार है परिवार

डॉअर्पण जैन ‘अविचल

समाज की सक्रियता और राष्ट्र के निर्माण की प्राथमिक इकाई के तौर पर सम्पूर्ण ब्रह्मांड में स्वीकार्य चेतना का नाम, सशक्तिकरण का एकाधिकार, सामंजस्य की भूमिका और समन्वय का अनूठा उदाहरण यदि सृष्टि पर कहीं है, तो वह परिवार है। देश, समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार के सशक्त होने से ही राष्ट्र की सशक्तता निर्धारित होती है। परिवार महज़ रिश्ते, नातेदारों, लोगों के रहने या समाज में स्वीकार्य की पहचान मात्र नहीं है, बल्कि यह परिवार रूपी वृक्ष सम्पूर्ण समवसरण में एकता, नेतृत्व, समन्वयता, साक्षात् जीवटता आदि का परिचायक भी है।

परिवार शब्द का प्रथम अक्षर ‘प’ प्रवाह का सूचक है, जिसमें शीर्ष नेतृत्व से अंतिम संतति तक विचारों, संवेदनाओं और भावनाओं का प्रवाह सम्मिलित है। द्वितीय अक्षर ‘र’ रक्षण का प्रतीक है यानी सदस्यों की सुरक्षा, रक्षा, छवि की रक्षा आदि शामिल है। तृतीय अक्षर ‘व’ व्यवस्था का संकेतक है, जिसमें सामंजस्य के साथ सुचारू संचलन हेतु व्यवस्था का निर्माण सम्मिलित है। इसी शब्द का चौथा अक्षर ‘र’ भी राह का संदेश देता है, मुखिया से लेकर संतान तक एक राह का अनुसरण करते हैं, जिसे अनुशासन की संज्ञा दी गई है।

किसी भी ग्राम, नगर, प्रान्त, समाज, राष्ट्र का निर्माण की जीवंतता का परिसूचक परिवार को माना जाता है। व्यक्ति यदि परिवार का संचालन, संयोजन, सम्मेलन, सहअनुगम और सांसारिक तत्व का निर्वहन बख़ूबी कर लेता है, उसमें रहना सीख लेता है, उसके अनुशासन और स्थायित्व को समझ लेता है, वही व्यक्ति देश व समाज के लिए हितकर और उद्देश्य अनुरूप लाभप्रद हो सकता है।

बिना परिवार के निर्वहन के समाज का कोई वजूद ही नहीं है। पौराणिक कथाओं के अनुसार द्रोण जब अपनी बदहाली के दौर से गुज़र रहे थे, तभी उनका पुत्र दूध हेतु नगर में तरस गया था, ऋषि संतानों ने उस अश्वत्थामा को चावल का आटा घोल कर दूध बताकर पिलाया और यह घटना द्रोण की आँखों के सामने हुई। तत्पश्चात द्रोण गाँव-गाँव गाय की भिक्षा माँगने लगे। एक राजा जो द्रोण के मित्र थे, उनसे भी इसी दौरान मदद माँगने गए। उन्होंने भी द्रोण का ख़ूब उपहास उड़ाया।

उस दौरान द्रोण का पुत्र अश्वत्थामा भी उन्हीं के साथ चल रहा था, जिसने यह दृश्य भी देखा। वो अपने अपमान का बदला भी लेना चाहते थे और कार्य पाना भी। जब द्रोण हस्तिनापुर पहुँचे तो महाराज ने उनकी व्यथा सुनी और राजपुत्रों को युद्ध, शस्त्र आदि की शिक्षा देने का काम द्रोण को सौंप दिया। कई वर्षों के बाद जब राजा ने सभी का कार्य देखा तो द्रोण को दक्षिणा में एक राज्य भेंट किया।

द्रोण ने उस राज्य के आधे हिस्से का शासक अपने पुत्र अश्वत्थामा को बना दिया। अश्वत्थामा भी राजपुत्रों के साथ शिक्षा ग्रहण करता है, तो वह भी युद्ध नीति में पारंगत होता गया और अपने राज्य का सुसंचालन करने लगा।

इस दौरान घटोत्कच ने युद्ध का आह्वान किया, राक्षक सेना को अकेले अश्वत्थामा ने ही खदेड़ दिया। सूर्य अस्त होते ही अश्वत्थामा ने युद्ध विराम करके उस क्षण घटोत्कच को युद्ध न करने की सलाह दी। जब ऋषियों ने अश्वत्थामा के शौर्य और साहस की ख़ूब बढ़ाई की, तब अश्वत्थामा ने इस बात को स्वीकार किया कि आज जो कुछ भी युद्ध कौशल सीख पाया हूँ, उसके पीछे कारण मेरा परिवार और मेरे पिता हैं। क्योंकि यदि मेरे पिता मेरे दूध पीने की चिंता न करते, तो हम उस राजा से भेंट भी नहीं करते, जिसने पिताजी का अपमान किया था, और अपमान नहीं होता तो सम्भवतः हम युद्ध क्षेत्र में प्रवेश ही नहीं करते और न ही शौर्य प्रदर्शन का अवसर प्राप्त होता।

यही कड़वा सत्य है कि परिवार में प्रत्येक सदस्य का मान-अपमान, ख़ुशी-दुःख,  सफलता-असफलता- सभी स्थितियों में परिवार एक इकाई बनकर खड़ा रहता है। इसीलिए परिवार की स्वीकार्यता भी है।

आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में जिन पंच परिवर्तन की बात कर रहा है, उनमें से एक है ‘कुटुंब प्रबोधन’। विषय स्पष्ट है कि कुटुम्ब को सशक्त बनाने के लिए संघ को भी प्रबोधित करने का दायित्व अपने कंधे पर लेना पड़ा। क्योंकि जब कुटुम्ब मज़बूत होगा, तभी तो राष्ट्रधर्म निभाने के लिए रणबांकुरे निकलेंगे। समाज मज़बूत होगा, समाज से ग्राम, नगर, प्रान्त और फिर राष्ट्र मज़बूत होगा। अखिल विश्व की समस्त जागृत शक्तियाँ इस बात से सहमति जताती हैं कि पहले सशक्तता और सुदृढ़ता परिवार में आनी चाहिए।

राष्ट्र के स्तवन में सबलता बढ़ाने के लिए राष्ट्र नायकों के साथ राष्ट्र वासियों के भी अहम योगदान हैं, और इसी योगदान को अधिक सशक्त बनाने के लिए राष्ट्र जागरण के पुनीत कार्य के लिए, समरसता स्थापित करने के लिए प्रत्येक परिवार को सुव्यवस्थित और सशक्त बनाने की भी आवश्यकता है।

प्रेम तत्व की अधिकता और सामंजस्यतावादी विचारधारा ही ये तय करती है कि परिवार अच्छा है या बुरा। वर्तमान समय में जिस तरह से परिवारों का विघटन आरंभ हुआ है, यह भविष्य के लिए अच्छे संकेत भी नहीं हैं। आपसी सौहार्द, समन्वय और एकता ही परिवारों की प्रगति के कारक तत्व हैं। जिन परिवारों में यह गुण विद्यमान है, वहाँ कभी क्लेश , पीड़ा, असफलता प्रवेश ही नहीं करते। इसलिए परिवार को मज़बूत करना है तो सकारात्मक दृष्टि से गुणों का उपयोग और विघटनकारी तत्वों से दूरी आवश्यक है। अन्यथा ढाक के तीन पात।

डॉअर्पण जैन ‘अविचल