उत्तर प्रदेश में बहता ”अंडर करंट” न जाने क्या गुल खिलायेगा

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सतह एकदम शांत है, न कोई लहर, न कोई हलचल, न कोई हो-हल्ला, न कोई हंगामा, लेकिन वोटों की बारिश उतनी है जितनी आज से पहले कभी किसी चुनावी मौसम में नहीं हुई,चुनाव आयोग की वाह-वाही करें,अखबारों की पीठ थपथपाएं, स्वयंसेवी संगठनों की पहलकदमी और जोश की तारीफ़ की जाए या फिर अन्ना के आन्दोलन का गुण गाएँ, कुछ समझ नहीं आ रहा है,पता नहीं चल रहा कि  ये गुप्त वोट गंगा के बहने का क्या कारण है,जो अपने ही बनाए सारे रिकार्ड तोड़ने पर अमादा है. चुनावी लोकतंत्र पर से जनहताशा के बादल छटे हैं,या फिर अन्ना आन्दोलन में तंत्र पर ऊँगली उठाने वालों के जहन ने उन्हें ऊँगली रंगाने को मजबूर  किया है.

उप्र में दो चरण के मतदान संपन हो चुका है पहले चरण में जहाँ बारिश और मौसमी खराबी के बावजूद 62 % वोट पड़े वहीँ दुसरे चरण में 59 % मतदान हुआ है, खास  बात ये है की जिन जिलों में मतदान हुए है वहाँ पिछले विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत का अर्धशतक भी नहीं लगा था, इस लिहाज से मतदान के ये आंकड़ों को गर  करिश्माई या जादूई आंकड़े कहें  तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए.ये बढ़ता मतदान किस ओर जा रहा है किसी को कोई खबर नहीं है. राजनीति के पंडितों की भविष्यवाणियाँ पुनर्विश्लेषण और पुनर्पाठ की प्रक्रिया में जा धसीं है. सारे समीकरण फिर से बनाए बिगाड़े जा रहे हैं. कुल मिला कर हर कोई इस बार मतदान में एक ”अन्दर करंट” महसूस कर रहा है और हर किसी की ओर से उसी ”अन्दर करंट” का रुख भांपने की कोशिश की जा रही है.

उप्र की  सियासत में कई पड़ाव आये हैं और कई शक्ल-ओ-सूरत उभरीं हैं पर आजादी के बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर मतदान अपने आप में एक एक सियासी करिश्मा है.भ्रष्टाचार से हताश जनता का चुनावी लोकतंत्र पर ऐसा विश्वास वाकई सलाम करने के लायक है.इतिहास के पन्ने उलटने पर पता चलता है कि उप्र के सियासी गलियारों में मुद्दों की गर्माहट,नेताओं के चेहरे और पार्टी की लहर कोई भी कभी ऐसा करिश्मा नहीं कर पाया.भगवा उन्माद, मंडल-कमंडल का उत्तेजक माहौल और राम मंदिर निर्माण के प्रति बहुसंख्य हिन्दू समाज की कटिबद्धता में भी उप्र में 57% ही मतदान हुआ था.आपातकाल के बाद इंदिरा गाँधी के तानाशाही के जवाब में भी केवल 55%  मतदाताओं ने ही ऊँगली रंगाई थी.राम रथ पर सवार हो कर उप्र की कुर्सी हथियाने वाली भजपा को सिंहासन से उतारने के लिए 1993 में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने मिल कर सामाजिक न्याय और दलित राजनीती का घोल बनाया था. कशीराम और मुलायम सिंह का साझा चेहरा व सांप्रदायिक शक्ति को रोकने की मांग भी 60 % का जादुई आंकड़ा नहीं पार करा सकी.उप्र की बेहद पेचीदा सियासी जमीन पर  1999 में अटल बिहारी बाजपेई का , कारगिल विजयी  चेहरा भी 53 % से ज्यादा वोटरों को घर से बहार नहीं निकाल सका.पर इस बार ऐसा कोई हंगामा चेहरा या मुद्दा नहीं है. अन्ना के बीमार होने और चुनाव में कैम्पेन न करने से भ्रष्ट्राचार का मुद्दा भी केंद्रीय भूमिका नहीं पा सका और न ही कांग्रेस विरोधी लहर बहती हुई दिख रही है. बस अलसाए हुए सियासी गलियारे में बढे  हुए मतदान की चर्चाएँ हो रही है.1885 के बाद बाद से कभी भी उत्तर प्रदेश में कोई दल दुबारा सरकार बनाने में कामयाब नहीं रहा है यहाँ अक्सर से बढे हुए मतदान को सत्ता विरोधी लहर के रूप में देखा जाता रहा है,शायद यही वजह है जो सपा इस बढे हुए मतदान को बसपा विरोधी लहर मान रही है, और इस पर अपना हक जाता रही है.वहीँ कांग्रेस को इसमें राहुल और प्रियंका का चमत्कार दिख रहा है और वो उप्र में खुद को 22 साल बाद फिर से प्रदेश की सियासत में लौटते हुए देख रहे हैं. उनका तर्क है की बढ़ा हुआ मतदान युवा मतदाताओं की देन है.और ये युवा राहुल गाँधी की सरपरस्ती में उप्र की तकदीर बदलने को उतावला है.लेकिन यहीं पर अन्ना आन्दोलन का दृश्य उभर आता है जब देश का युवा सड़कों पर था और उसका गुस्सा सबसे ज्यादा राहुल गाँधी पर फूट रहा था, सड़कों पर विरोध करने उतरा युवा नारे लगा रहा था ”देश का युवा यहाँ है ,राहुल गाँधी कहाँ है” साथ ही साथ राहुल की सभाओं में उछालते जूते और लहराते हुए काले बैनर और झंडे,इस  तर्क को गले से उतारने नहीं देते कि राहुल गाँधी के करिश्मे ने उप्र के मतदाताओं को मथ दिया है और वोट का सारा मख्खन कांग्रेस के करीने लगने वाला है.कांग्रेस और बसपा के निपटने के बाद नजर भजपा की ओर जाती है जो ये कह रही है कि मतदाता इस बार कांग्रेस और बसपा के भ्रष्टाचार से अजीज आ चुकी है.और सपा से उसे कोई उम्मीद नहीं है इसलिए साफ़ सुथरी सरकार और कुशल  नेतृत्व के  लिए मतदाता अबकी बार भाजपा का रुख कर रहा है .भाजपा का दावा भी रेत का महल है क्योंकि जिस तरह से बाबू सिंह कुशवाहा को अन्दर बहार किया गया और जनता को बेवकूफ समझ कर उन्हें भाजपा का चुनाव प्रचार करने के लिए उतरा गया उससे तो यही लगता है कि जनता  इस बार भाजपा को अपने बुद्धि विवेक का परिचय करा के ही दम लेगी. कर्नाटका के यद्दुराप्पा का केस अभी सियासी गलियारों से नदारद नहीं हुआ था कि विधान सभा में ”पोर्न फिल्म” देखते हुए पाए गए भाजपा के मंत्रियों ने मुश्किलें और बढ़ा दीं.खैर भाजपा इसे कोई मुद्दा नहीं मन रही है और दावा कर रही है कि इसका कोई असर चुनाव में देखने को नहीं मिलेगा.
बढे मतदाताओं पर दावेदारी के इस खेल में सपा भी पीछे नहीं है सपा का कहना है कि जनता के  दर्द को सपा ने समझ लिया है और उसके घोषणा पत्र में जनता के सब दुखों का निवारण है जो इस बार सपा के लिए एक ”अंडर करंट ” बहा रहा है. अबकी बार विधान भवन में साइकिल का ही बोल-बाला होगा. सपा का ये मानना कितना सही है ये तो वक़्त ही बताएगा पर सपा के ऊपर गुंडाराज चलाने का दाग इतनी आसानी से छुट जायेगा ऐसा होता हुआ कहीं से नजर नहीं आ रहा है. इन मुख्य पार्टियों के अलावा सभी छोटी पार्टियाँ और दागी-बागी निर्दलीय प्रत्याशी  वोट कटवा की भूमिका में नज़र आ रहे  है. इनकी अधिकतम सफलता सत्ता में भागीदारी तक ही सीमित है.
हमाम  में सब नंगे हैं. भ्रष्टाचार, अनाचार और अत्याचार से दो चार होता मतदाता किस ओर सियासी गाड़ी खींच रहा है किसी को कोई खबर नहीं है,सब शंका के शिकार हो रहे हैं.और अपने व्यक्तिगत बुद्धि-विवेक के आधार पर सिर्फ कयास लगा रहे हैं.इन बढे  मतदाताओं में सबसे ज्यादा संख्या महिलाओं और युवाओं की है. और ये ऐसे ”वोटर ग्रुप” हैं जिनके बारे में सियासी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती,ये किसी भी ओर मुड़ सकते हैं .कुल मिला कर शांत सतह  के नीचे मची हलचल को भाँपते हुए यही कहा जा सकता है कि उप्र की चुनावी जमीन के नीचे बहता हुआ वोट का  ”अंडर करंट” अबकी बार सबको चौंका सकता है और सत्ता की ऐसी तस्वीर बना सकता है जिसके बारे में पहले नहीं सोचा गया  रहा होगा.
खैर सवाल अभी भी जस का तस पड़ा हुआ है ,एक इंच भी टस से मस नहीं हुआ कि ये बढे हुए मतदाता कौन है ये अन्ना के कथित ”अजिटेशन टूरिस्ट” हैं या फिर चुनाव आयोग,अख़बारों और स्वयंसेवी संगठनों द्वारा चलाये गए ” मतदाता जागरूकता संक्रमण” अभियान से प्रभावित लोग या फिर परिवर्तनकामी उत्साही ”सच्चा वोटर” या फिर कोई और, जिसे अब तक सियासी पार्टियाँ  समझ पाईं और न नेता भाँप  पाए,न ही सियासी पंडित जान पाए और न मीडिया पढ़ पाया,खैर ये जो लोग भी हैं अपनी परिभाषा स्वयं ही परिभाषित कर देंगे अब इन्तजार तो बस 6 मार्च का है, जब उप्र की सियासी-सत्ता कि तस्वीर साफ़ होगी.

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