विश्ववार्ता

युद्ध की आड़ में नरसंहार: अफगानिस्तान पर हमले का सच।

-सुनील कुमार महला 

हाल ही में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच 16 मार्च 2026, सोमवार रात को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर हवाई हमला कर एक नया विवाद और टकराव का मोर्चा खोल दिया है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यह हमला मानवता पर एक बेहद क्रूर वार के रूप में देखा जा रहा है, जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। मीडिया में आई खबरों से पता चला है कि काबुल के एक नशामुक्ति केंद्र पर हुए इस हमले में 400 से अधिक लोगों की मौत हो गई है, जबकि 250 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह हमला एक बड़े अस्पताल पर किया गया, जिसमें लगभग 2000 बिस्तरों की सुविधा थी और उस समय 1000 से अधिक मरीज वहां इलाज करा रहे थे। हमला रात करीब 9 बजे हुआ, जब अधिकतर मरीज सो चुके थे या सोने की तैयारी में थे। इस हमले में मारे गए लोगों में ज्यादातर मरीज और नशामुक्ति केंद्र के कर्मचारी शामिल थे। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि यह इंसानियत पर सीधा हमला है। वास्तव में, अस्पताल वह स्थान होता है जहां जीवन बचाया जाता है, न कि छीन लिया जाता है। वहां मौजूद डॉक्टर, मरीज, उनके परिजन और कर्मचारी किसी युद्ध का हिस्सा नहीं थे, इसलिए यह पूरी तरह से एक अमानवीय कृत्य ही कहा जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों के अनुसार अस्पतालों और नागरिक ठिकानों पर हमला करना युद्ध अपराध माना जाता है। जिनेवा कन्वेंशन भी स्पष्ट रूप से यह कहता है कि जीवन रक्षक ढांचों(अस्पताल) और मेडिकल स्टाफ को हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए। ऐसे हमले न केवल कानूनी रूप से गलत हैं, बल्कि नैतिक रूप से भी पूरी तरह अस्वीकार्य हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2022 के बाद से यूक्रेन में ही विभिन्न स्वास्थ्य सुविधाओं पर 2881 हमले हो चुके हैं। यह स्थिति बताती है कि दुनिया में अब न तो नियमों का डर रह गया है और न ही नैतिकता की चिंता। पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट में केवल अस्पताल ही नहीं, बल्कि पानी और तेल के ठिकानों को भी लगातार निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे में पानी, तेल और गैस की कमी विश्व के विभिन्न देशों में लगातार महसूस भी की जा रही है। वास्तव में यह हमला पाकिस्तान की दोगली नीति को उजागर करता है-एक ओर वह शांति की बात करता है और दूसरी ओर हिंसा।पाठक जानते हैं कि पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है और अपनी आंतरिक समस्याओं को छिपाने के लिए सीमापार हिंसा का सहारा लेता है।

हाल फिलहाल, हमारे देश भारत ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे नरसंहार बताया है। वास्तव में पाकिस्तान का काबुल में हमला, अफगानिस्तान की संप्रभुता पर सीधा हमला ही कहा जा सकता है। पाकिस्तान के काबुल में इस हमले के बाद अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय से लगातार यह मांग की जा रही है कि पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराया जाए और उस पर कड़े आर्थिक और कूटनीतिक प्रतिबंध लगाए जाएं। लेकिन यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि संयुक्त राष्ट्र और कई शक्तिशाली देश ऐसे मामलों में अक्सर चुप रहते हैं। यहां सवाल यह उठता है कि क्या उन्हें एकजुट होकर ऐसे हमलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? सच तो यह है कि केवल निंदा से काम नहीं चलेगा, इसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ठोस व सख्त से सख्त कदम उठाने होंगे।इसी बीच, पाकिस्तान का यह दावा है कि उसने सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया था, लेकिन यह दावा संदेह के घेरे में है और इसे अपनी गलती छिपाने की कोशिश माना जा रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि यह पहली घटना नहीं है। पाठकों को बताता चलूं कि पिछले वर्ष भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष के दौरान हिंसा हुई थी। इतना ही नहीं, दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह की अनेक घटनाएं सामने आई हैं। गौरतलब है कि दक्षिण लेबनान में एक मेडिकल सेंटर पर हमले में 12 स्वास्थ्यकर्मियों की मौत हुई थी। लेबनान के अनुसार, इस संघर्ष में अब तक 37 चिकित्सा केंद्रों पर हमले हो चुके हैं और 31 स्वास्थ्यकर्मी मारे गए हैं। वास्तव में यह स्थिति मानवीय संकट की गंभीरता को दर्शाती है और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहे गहरे प्रभाव को उजागर करती है। इसी तरह ईरान पर हमले के दौरान एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से लगभग 170 लोगों की मौत हुई, जिनमें अधिकतर बच्चे थे।

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों का प्रभाव आज लगातार कम होता जा रहा है और दुनिया में ताकत ही सबसे बड़ा आधार बनती जा रही है। इसलिए यह बहुत ही जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय मिलकर निष्पक्ष जांच करे और दोषियों को सजा दिलाए। इस हमले के बाद अफगानिस्तान में गहरा आक्रोश है और तालिबान के प्रवक्ता जबिहुल्लाह मुजाहिद ने पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद करने की घोषणा कर दी है, जिससे संकेत मिलता है कि आगे और तनाव बढ़ सकता है। सैन्य दृष्टि से देखा जाए तो पाकिस्तान के पास मजबूत वायु सेना है, जबकि अफगानिस्तान अपेक्षाकृत कमजोर है। अफगानिस्तान के पास मिसाइलें तो हैं, लेकिन लड़ाकू विमान नहीं हैं। यह स्थिति दिखाती है कि किसी भी देश के लिए अपनी रक्षा व्यवस्था मजबूत रखना कितना जरूरी है, क्योंकि युद्ध केवल इरादों से नहीं, बल्कि तैयारी से लड़े जाते हैं। दोनों देशों(पाकिस्तान-अफगानिस्तान) के बीच तनाव नया नहीं है। 27 फरवरी को भी पाकिस्तानी हमलों में अफगानिस्तान के 22 ठिकानों को निशाना बनाया गया था। इन घटनाओं के बाद दोनों पक्षों में लगातार हिंसा जारी है। सीमा विवाद और आतंकियों की आवाजाही भी तनाव का बड़ा कारण है। चीन, जो दोनों देशों से संबंध रखता है, ने 12 मार्च को संयम बरतने की अपील की थी, लेकिन इसका असर दिखाई नहीं दिया। अब फिर से शांति की अपील की जा रही है, लेकिन हालात को देखते हुए तनाव कम होता नहीं दिख रहा।

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस हमले को बर्बर और अमानवीय बताया है और पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि वह नरसंहार को सैन्य कार्रवाई का रूप देने की कोशिश कर रहा है। सच यही है कि कोई भी धर्म, कानून या नैतिकता अस्पतालों और मासूम लोगों पर हमले को सही नहीं ठहरा सकती। विडंबना यह भी है कि जिस देश पर आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं, वही अब दूसरों पर आरोप लगा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि क्षेत्र में शांति चाहिए, तो आतंकवाद की जड़ों को समाप्त करना ही एकमात्र समाधान है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि यह हमला न केवल दो देशों के बीच तनाव को बढ़ाएगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की शांति और मानवता के लिए खतरा बन सकता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर ठोस और निष्पक्ष कार्रवाई की सख्त आवश्यकता है।

सुनील कुमार महला