समाज

भूतों की उछलकूद: अंधविश्वास का महा नाटक

गत दिवस सुबह एक टीवी प्रसारण में देश के एक लोकप्रिय बाबा को भूत-प्रेत और आत्माएँ भगाने का दावा करते देखा। मंच पर बैठे भयभीत लोग, तेज़ ढोल-नगाड़े, मंत्रोच्चार, चीख-पुकार और बाबा के तथाकथित चमत्कार—यह पूरा दृश्य किसी धारावाहिक या नाटक से कम नहीं लगा। कैमरे की रोशनी में डर और चमत्कार का यह प्रदर्शन शायद टीआरपी के लिए मनोरंजक हो, परंतु समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक है। भक्तों की आस्था अपनी जगह है, किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस प्रकार के अंधविश्वास को खुलेआम बढ़ावा देना भारतीय संस्कृति, विवेक और वैज्ञानिक सोच के अनुरूप है?
भारतीय सनातन परंपरा में भूत-प्रेत, ओपरी-पराई जैसी धारणाओं को कभी भी धर्म का मूल आधार नहीं माना गया। वेदों, उपनिषदों और गीता में मनुष्य को विवेक, ज्ञान, आत्मचिंतन और कर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा दी गई है। हमारे ऋषि-मुनियों ने अज्ञान और भय से मुक्ति को ही मोक्ष का मार्ग बताया। कहीं भी ऐसे डरावने और असत्य कथाओं का समर्थन नहीं मिलता, जिनसे मनुष्य कमजोर, असहाय और पराधीन महसूस करे। हमारी संस्कृति आत्मबल, आत्मविश्वास और विवेक पर आधारित है, न कि किसी अदृश्य भय पर।
इसके बावजूद आज कुछ तथाकथित तांत्रिक और बाबा लोगों की कमजोरी, अज्ञान और मानसिक समस्याओं का लाभ उठाकर भय का व्यापार कर रहे हैं। जिन लोगों को चिकित्सकीय परामर्श या मनोवैज्ञानिक सहायता की आवश्यकता होती है, उन्हें भूत-प्रेत का साया बताकर और अधिक मानसिक पीड़ा में डाल दिया जाता है। मिर्गी, अवसाद, चिंता, हिस्टीरिया या अन्य मानसिक विकारों को भूत-प्रेत का असर बताना न केवल गलत है, बल्कि अमानवीय भी है। इससे रोगी समय पर सही इलाज से वंचित रह जाते हैं और उनकी स्थिति और बिगड़ जाती है।
यह भी देखने में आता है कि इन तथाकथित चमत्कारों के पीछे एक सुनियोजित नाटक होता है। पहले डर पैदा किया जाता है, फिर बाबा अपने मंत्रों और झाड़-फूँक से ‘चमत्कार’ दिखाते हैं। टीवी चैनलों पर इस तरह के कार्यक्रमों का प्रसारण इस समस्या को और गंभीर बना देता है, क्योंकि इससे इन ढोंगियों को वैधता और लोकप्रियता मिल जाती है। जब मीडिया खुद अंधविश्वास को मनोरंजन की तरह परोसने लगे, तो समाज में विवेक और विज्ञान की बात कौन करेगा?
सबसे दुखद पहलू यह है कि पढ़े-लिखे और आधुनिक सोच वाले लोग भी कई बार ऐसे ढोंगियों के जाल में फँस जाते हैं। जब जीवन में कोई संकट आता है, बीमारी ठीक नहीं होती या व्यापार में घाटा होता है, तो कुछ लोग तर्क और विज्ञान छोड़कर तांत्रिकों की शरण में चले जाते हैं। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि हमने शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित कर दिया है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेक को जीवन का हिस्सा नहीं बनाया।
आज आवश्यकता है कि ऐसे ढोंगियों का फंडाफोड़ किया जाए और जनता को वैज्ञानिक सोच की ओर प्रेरित किया जाए। सरकार को चाहिए कि वह अंधविश्वास फैलाने वाले बाबाओं और तांत्रिकों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करे। कई राज्यों में अंधश्रद्धा विरोधी कानून बने हैं, परंतु उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी कमजोर है। पुलिस और प्रशासन को ऐसे मामलों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, ताकि निर्दोष लोगों का शोषण रोका जा सके।
मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है। टीआरपी के लालच में ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण बंद होना चाहिए। इसके बजाय वैज्ञानिक कार्यक्रम, तर्कशील बहसें और जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, जो लोगों को भय से नहीं, ज्ञान से जोड़ें। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कशक्ति को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि अगली पीढ़ी अंधविश्वास के जाल में न फँसे।
भूत-प्रेत की उछलकूद दरअसल एक महा नाटक है, जो लोगों की भावनाओं और कमजोरियों का शोषण करता है। यह न तो धर्म है, न संस्कृति और न ही आध्यात्म। यह केवल भय का व्यापार है। भारतीय समाज को डर नहीं, विवेक चाहिए; अंधविश्वास नहीं, आत्मविश्वास चाहिए। जब हम तर्क, विज्ञान और विवेक को अपनाएँगे, तभी हम इन ढोंगियों से मुक्ति पा सकेंगे।
समय आ गया है कि हम अपने ऋषि-मुनियों की उस परंपरा को फिर से जीवित करें, जो अज्ञान से नहीं, ज्ञान से लड़ने की शिक्षा देती है। भूत-प्रेत के नाम पर चल रहे इस महा नाटक को बंद करना केवल सरकार या मीडिया की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। जागरूक नागरिक ही इस अंधविश्वास के अंधकार से समाज को बाहर निकाल सकते हैं।
-सुरेश गोयल धूप वाला