पूर्णता के बोध का अवसर है- गुरु पूर्णिमा

डॉ.वेदप्रकाश

 गुरु और गोविंद दोनों पूर्ण हैं और ये दोनों एक दूसरे के पर्याय भी हैं। गुरु भी पूर्ण हैं और पूर्णिमा भी पूर्ण  होती है इसलिए गुरु पूर्णिमा उत्सव बन जाता है। शिष्य अपूर्ण होता है और इसी अपूर्णता की पूर्ति हेतु वह गुरु के शरणागत होता है। गुरु इस अपूर्ण शिष्य को पूर्णता का बोध करवाते हैं। इसलिए गुरु पूर्णिमा पूर्णता के बोध का अवसर है।
    एक सामान्य व्यक्ति के रूप में जीवन की संपूर्ण यात्रा जानने- समझने की यात्रा है, जिसमें व्यक्ति कभी सफल होता है तो कभी असफल। कभी वह कुछ सीख पाता है तो कभी नहीं सीख पाता। सद्गुरु की शरणागति इस सामान्य व्यक्ति को भी लौकिक जगत के साथ-साथ अलौकिक अथवा आध्यात्मिक जगत से जोड़ने की ओर बढ़ती है। इसलिए सद्गुरु के मार्गदर्शन अथवा शिक्षा से यह सामान्य व्यक्ति भी धीरे-धीरे विशेष बनता चला जाता है। वेद,पुराण, रामायण और महाभारत आदि ग्रंथों में भिन्न-भिन्न रूपों में गुरू महिमा वर्णित है। भक्तिकाल के अनेक कवियों  और भक्तों ने गुरु महिमा का अनेक प्रकार से वर्णन किया है। संत कबीर ने तो गुरु को गोविंद से भी बड़ा माना है। ध्यान रहे गुरु के सानिध्य में सत्संग मिलता है, जिससे शिष्य की असद वृत्तियाँ नष्ट होती चली जाती हैं। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरुर्ब्रह्मा  गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा… अर्थात गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहते हुए परब्रह्म की उपाधि से विभूषित किया गया है। आदि शंकराचार्य ने अपने विवेक चूड़ामणि नामक ग्रंथ में शिष्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि- अविद्या,अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश आदि जो अज्ञान के कारण हैं तू उनसे मुक्त होकर ब्रह्मभाव में स्थित होने की इच्छा कर रहा है। लेकिन इसके बाद यह भी कहा। है कि- शब्दजालं महारण्यं… अर्थात शब्द जाल तो चित्त को भटकाने वाला एक महान वन है, इसलिए किन्हीं तत्वज्ञानी महात्मा से प्रयत्नपूर्वक आत्मतत्व को जानना-समझना चाहिए। ध्यान रहे जिस आत्मतत्व को जानने समझने का आवाह्न आदि शंकराचार्य कर रहे हैं उसे केवल गुरु की कृपा से ही जाना- समझा जा सकता है। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है- मातु पिता गुर प्रभु कै बानी,
    बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी…। अर्थात माता,पिता, गुरु और स्वामी की बात को बिना ही विचारे शुभ समझकर करना चाहिए। इसी प्रकार वे आगे लिखते हैं- गुर के बचन प्रतीति न जेही,
    सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।
अर्थात जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी सुगम नहीं होती।
      भारतवर्ष की सनातन ज्ञान परंपरा में गुरु-शिष्य का संबंध अनादि काल से है। गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र, संदीपनी, द्रोणाचार्य, रामानंद एवं रामकृष्ण परमहंस आदि भारतीय गुरु परंपरा के आधार स्तंभ हैं। प्रभु श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों ही साक्षात ब्रह्म हैं किंतु दोनों ही गुरु गृह यानी गुरुकुल में गुरु के सानिध्य में जाकर ही पूर्णता प्राप्त करते हैं।
     गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर हमें भारतवर्ष की संत परंपरा का भी वंदन- अभिनंदन करना चाहिए। क्योंकि संत परमात्मा के प्रतिनिधि रूप में हम सबका मार्गदर्शन करते हैं। ये अपने तप बल से परहित के लिए जीवन लगते हैं। बद्री, केदार, ऋषिकेश, हरिद्वार, काशी, प्रयागराज एवं चित्रकूट आदि अनेक ऐसे दिव्य स्थान है जहां अनेक संत साधनारत हैं और जन कल्याण के लिए अपना जीवन लगा रहे हैं। विगत कई दशकों से ऋषिकेश  स्थित परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानंद सरस्वती जी प्रकृति- पर्यावरण, नदी एवं जल स्रोतों के संरक्षण- संवर्धन का संदेश दे रहे हैं। उनके नेतृत्व में इस दिशा में अनेकानेक बड़ी योजनाएं संपन्न हो चुकी हैं। वे गुरु रूप में प्रतिदिन मानवता, देश की एकता- अखंडता, सनातनता और जीवन के उत्थान का संदेश देते हैं। उनका महत्वपूर्ण संदेश है- मन:स्थिति बदलेगी तो शांति की संस्कृति निश्चित रूप से स्थापित होगी। विगत वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बोलते हुए श्रीराम किंकर विचार मिशन के संस्थापक अध्यक्ष और मानस मर्मज्ञ स्वामी मैथिलीशरण जी ने कहा- गुरु पूर्णिमा का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि सारे शिष्य जब अपनी भावनाओं से गुरुदेव का स्मरण, पूजन और अर्चन करते हैं तो प्रार्थना की इस सामूहिक शक्ति के द्वारा शिष्य के हृदय में गुरु का प्राकट्य हो जाता है। गुरु अपने शिष्य को पूर्ण करके ही पूर्ण होता है। गुरु स्व दृष्टि से शून्य है परंतु शिष्य की भावना शक्ति के कारण गुरु शिष्य दृष्टि से पूर्ण होता है। गुरू पूर्णिमा गुरू के पूजन के साथ-साथ उनके मार्गदर्शी संदेश को आत्मसात करने का अवसर भी है।
    आइए  गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर अंधकार से प्रकाश की ओर चलें और गुरु चरण कमल की वंदना करें। क्योंकि उनमें ऐसी संजीवनी जड़ी है जो संपूर्ण भव रोगों का नाश कर सकती है। गुरु पूर्णिमा का अर्थ भी यही है कि गुरु के उपदेश और सत्संग से अंदर के विकारों को निकालें। इसके साथ-साथ परहित और राष्ट्रहित के लिए कोई एक संकल्प लें। हमारा एक सकारात्मक कार्य दूसरों के जीवन में बदलाव ला सकता है।
डॉ.वेदप्रकाश
असिस्टेंट प्रो

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